GK in Hindi

>

अध्याय 1 प्राचीन भारत

▸ भारत एक विशाल प्रायद्वीप है‚ जो तीनों ओर से समुद्र से घिरा है। देश का भारत नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन ‘भरत’ के नाम पर किया गया। इसे आर्यावर्त‚ ब्रह्मावर्त‚ हिन्दुस्तान तथा इण्डिया जैसे नामों से भी जाना जाता है।
▸ प्राचीन भूगोलवेत्ताओं ने इसकी स्थिति के लिए ‘चतु:स्थानसंस्थितम्’ शब्द का प्रयोग किया था।
▸ भारत की मूलभूत एकता के लिए भारतवर्ष नाम सर्वप्रथम पाणिनी की अष्टाध्यायी में आया है।
▸ यूनानियों ने भारतवर्ष के लिए ‘इण्डिया’ शब्द का प्रयोग किया‚ जबकि मध्यकालीन लेखकों ने इस देश को ‘हिन्द’ अथवा ‘हिन्दुस्तान’ नाम से सम्बोधित किया।

ऐतिहासिक स्रोत

▸ प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के मुख्यत: तीन स्रोत हैं
1. पुरातात्त्विक साक्ष्य‚
2. साहित्यिक साक्ष्य एवं
3. विदेशियों के वृत्तान्त

1. पुरातात्त्विक साक्ष्य

ये कालक्रम का सही ज्ञान प्रदान करने वाले साक्ष्य हैं। पुरातात्त्विक साक्ष्यों में अभिलेख‚ सिक्के‚ स्मारक/भवन‚ मूर्तियाँ तथा चित्रकला प्रमुख हैं।

अभिलेख/शिलालेख

▸ अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है।
महास्थान तथा साहगौरा के अभिलेख चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के हैं। साहगौरा अभिलेख में सूखा पीड़ित प्रजा को राहत देने की बात कही गई है।
बोगजकोई अभिलेख (एशिया माइनर) 1400 ई.पू. का है‚ जिससे आर्यों के ईरान से पूर्व की ओर आने का साक्ष्य मिलता है। इस अभिलेख में वैदिक देवताओं इन्द्र‚ मित्र‚ वरुण तथा नासत्य का उल्लेख है।
महास्थान अभिलेख से चन्द्रगुप्त मौर्य के समय के ग्रामीण प्रशासन की जानकारी मिलती है।
▸ अशोक के अभिलेखों को सबसे पहले पढ़ने का श्रेय जेम्स प्रिंसेप को है। 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता पाई।
मास्की तथा गुर्जरा में स्थापित अभिलेखों में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है। नेत्तुर तथा उड्डेगोलम के अभिलेखों में भी अशोक के नाम का उल्लेख है।
▸ अशोक के प्रयाग अभिलेख पर ही समुद्रगुप्त की प्रशस्ति भी उत्कीर्ण है। समुद्रगुप्त की यह प्रशस्ति उसके राजकवि हरिषेण ने उत्कीर्ण की।
▸ रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत का पहला अभिलेख है। इसमें सुदर्शन झील के निर्माण एवं मरम्मत का उल्लेख है।
▸ कलिंग के शासक खारवेल ने हाथीगुम्फा अभिलेख उत्कीर्ण कराया‚ जिससे उसके जैन मतावलम्बी होने का पता चलता है।
▸ महरौली स्तम्भ चन्द्रगुप्त द्वितीय से सम्बन्धित है; इसमें चन्द्र नामक शासक का उल्लेख है।
▸ स्कन्दगुप्त के भितरी अभिलेख में हूणों के आक्रमण की चर्चा है। भानुगुप्त के एरण अभिलेख (मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त) में सती-प्रथा का प्रथम साक्ष्य मिलता है। इस अभिलेख में 510 ई. का स्पष्ट उल्लेख भी है।
▸ पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख को रविकीर्ति ने वर्णन है। इसमें हर्ष एवं पुलकेशिन के संघर्ष का वर्णन है। यह संघर्ष 512 ई़ में हुआ था।
नासिक अभिलेख में सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी को ब्राह्मणों का संरक्षक मानते हुए ‘एक ब्रह्मण’ (अद्वितीय ब्राह्मण) कहा गया है।

सिक्के

▸ सिक्कों के अध्ययन को न्यूमेस्मैटिक्स या मुद्राशास्त्र कहा जाता है।
▸ भारत के प्राचीनतम सिक्कों पर केवल चिह्न उत्कीर्ण है कोई लेख नहीं है। इन्हें पंचमार्क्ड या आहत सिक्के कहा गया। आहत सिक्कों को ऐतिहासिक ग्रन्थों में कार्षापण कहा गया था‚ जो अधिकांशत: चाँदी के थे।
▸ शासकों की आकृति वाले सिक्कों का प्रचलन सर्वप्रथम हिन्द-यूनानी शासकों के समय प्रारम्भ हुआ। शक‚ पहलव तथा कुषाण शासकों ने ऐसे ही सिक्के चलाए।
▸ भारत में सबसे पहले स्वर्ण सिक्के हिन्द-यूनानी शासकों ने चलाए।
कनिष्क के सिक्कों से पता चलता है कि वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
▸ चन्द्रगुप्त II ने शकों पर जीत के उपलक्ष्य में चाँदी के सिक्के चलाए। चाँदी के सिक्के प्राय: पश्चिमी भारत में प्रचलित थे।
▸ समुद्रगुप्त के एक सिक्के में उसे वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है। कुछ गुप्तकालीन सिक्कों पर ‘अश्वमेघ पराक्रम:’ शब्द उत्कीर्ण है।
▸ सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण मुद्राएँ कुषाणों ने तथा सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तों ने जारी कीं।
▸ कई गणराज्यों−पांचाल‚ मालवा तथा यौधेय का पूरा इतिहास सिक्कों के आधार पर सामने आया है‚ जबकि हर्ष‚ चालुक्य‚ राष्ट्रकूट‚ पाल तथा प्रतिहारों के सिक्के नगण्य संख्या में प्राप्त हुए हैं।
▸ भारत के विभिन्न भागों विशेषकर अरिकामेडु में रोमन सिक्के काफी मात्रा में प्राप्त हुए हैं।

भवन

स्तूप की पहली चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। बौद्ध विहार तथा स्तूपों का निर्माण 4-5वीं शताब्दी ई.पू. के बाद ही हुआ था।
▸ पटना के कुम्हरार से चन्द्रगुप्त मौर्य के राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
▸ अशोक ने बराबर की पहाड़ी में तीन गुफाओं का निर्माण कर उन्हें आजीवक सम्प्रदाय के अनुयायियों को प्रदान किया था। ये गुफाएँ थीं सुदामा गुफा‚ कर्ण चौपड़ तथा विश्व झोंपड़ी।
▸ अशोक के उत्तराधिकारी दशरथ ने भी लोमश ऋषि तथा गोपिका नामक गुफाओं का निर्माण नागार्जुनी पहाड़ी में कराकर आजीवक साधुओं को दान में दिया था।
▸ मन्दिर निर्माण की नागर‚ वेसर तथा द्रविड़ शैलियाँ प्रचलित थीं। मन्दिरों का निर्माण गुप्त काल से प्रारम्भ हो चुका था।
कम्बोडिया के अंकोरवाट मन्दिर तथा जावा के बोरोबुदूर मन्दिर से भारतीय संस्कृति के दक्षिण एशिया में प्रसार का पता चलता है। बोरोबुदूर मन्दिर का निर्माण सम्भवत: नौवीं शताब्दी में हुआ था।

मूर्तियाँ /चित्रकला

▸ कुषाण काल में बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों का निर्माण होने लगा‚ जिन पर विदेशी प्रभाव देखा जा सकता है।
▸ बुद्ध की प्राचीनतम मूर्तियाँ गान्धार कला में बनाई गई हैं। भरहुत‚ बोधगया‚ साँची तथा अमरावती से प्राचीन बौद्ध प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं।
▸ कुषाणकाल में मूर्ति निर्माण की गांधार तथा मथुरा निर्माण कला प्रचलित थी। गांधार कला पर यूनानी प्रभाव अधिक व्याप्त था।
▸ अजन्ता की गुफाओं के चित्र प्रथम शताब्दी ई.पू. से लेकर सातवीं शताब्दी तक के पाए जाते हैं। इनमें गुप्तकालीन चित्र अत्युत्कृष्ट हैं। बाघ की गुफाओं के चित्र गुप्तकालीन हैं।

2. साहित्यिक साक्ष्य

▸ साहित्यिक साक्ष्य दो प्रकार के होते हैं— धार्मिक एवं धर्मनिरपेक्ष।
▸ धार्मिक साहित्यिक साक्ष्यों के अन्तर्गत वेद‚ वेदांग‚ उपनिषद्‚ ब्राह्मण‚ आरण्यक‚ पुराण‚ रामायण‚ महाभारत‚ स्मृति ग्रन्थ तथा बौद्ध एवं जैन साहित्य आदि को सम्मिलित किया जाता है‚ जबकि व्यक्तिगत या राजा के संरक्षण में लिखी गई पुस्तकें जैसे− अर्थशास्त्र‚ राजतरंगिनी‚ अष्टाध्यायी आदि को धर्मनिरपेक्ष साहित्यिक साक्ष्यों में रखा जाता है।
वेदों की संख्या चार हैं— ऋग्वेद‚ यजुर्वेद‚ सामवेद‚ अथर्ववेद। वेदांग के अन्तर्गत शिक्षा‚ कल्प‚ ज्योतिष‚ व्याकरण‚ निरुक्त तथा छन्द आते हैं।
▸ यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान है। सामवेद में संगीत का प्रथम साक्ष्य मिलता है।
श्रौत सूत्र में यज्ञ सम्बन्धी‚ गृह्य सूत्र में लौकिक एवं पारलौकिक कर्त्तव्यों तथा धर्म सूत्र में धार्मिक‚ सामाजिक एवं राजनीतिक कर्त्तव्यों का उल्लेख है।

वेद

ऋग्वेद यह ऋचाओं का संग्रह है। सामवेद यह गीति-रूप मन्त्रों का संग्रह है और इसके अधिकांश गीत ऋग्वेद से लिए गए हैं। यजुर्वेद इसमें यज्ञानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है। अथर्ववेद यह तन्त्र-मन्त्रों का संग्रह है।
बौद्ध ग्रन्थों में त्रिपिटक‚ निकाय तथा जातक आदि प्रमुख हैं। बौद्ध ग्रन्थ दीपवंश‚ महावंश से मौर्यकालीन पर्याप्त जानकारी मिलती है। नागसेन रचित मिलिन्दपन्हो से हिन्द यवन शासक मिनाण्डर के विषय में सूचना मिलती है।
▸ बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों से तत्कालीन सामाजिक‚ सांस्कृतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों का ज्ञान होता है।
जातक ग्रन्थों में बुद्ध तथा बोधिसत्वों के जीवन की चर्चा है। कथावस्तु में बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कथानकों का विवरण मिलता है।
▸ जैन साहित्य आगम कहलाते हैं। जैन आगमों में सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है। अंगों की संख्या बारह है। जैन आगमों को वर्तमान स्वरूप को 512 ई. में वल्लभी में आयोजित जैन संगीति में प्रदान किया गया।
जैन ग्रन्थों में परिशिष्टपर्वन‚ भद्रबाहुचरित‚ आचारांग सूत्र‚ भगवती सूत्र‚ कल्पसूत्र आदि से अनेक ऐतिहासिक सामग्रियाँ मिलती हैं।
▸ जैन-ग्रन्थ भगवती सूत्र में महावीर स्वामी के जीवन तथा सोलह महाजनपदों का वर्णन मिलता है।
▸ शुंगकाल में पतंजलि ने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखा‚ जिससे मौर्योत्तरकालीन व्यवस्था की जानकारी मिलती है। पतंजलि‚ पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे।
▸ अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का पहला ग्रन्थ है‚ जिसकी रचना पाणिनी ने की थी। इसमें पूर्व मौर्यकाल की सामाजिक दशा का चित्रण मिलता है।
▸ अर्थशास्त्र कौटिल्य द्वारा रचित है‚ जिसे चाणक्य तथा विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।
▸ अर्थशास्त्र में मौर्यकालीन राजव्यवस्था का स्पष्ट चित्रण मिलता है। यह राजकीय व्यवस्था पर लिखी गई पहली पुस्तक है।
▸ संस्कृत भाषा में ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमबद्ध लेखन कल्हण ने किया। कल्हण की राजतरंगिणी में कश्मीर के इतिहास का वर्णन मिलता है।

ऐतिहासिक ग्रन्थ/रचनाकार

ऐतिहासिक ग्रन्थ रचनाकार ऐतिहासिक ग्रन्थ रचनाकार
अर्थशास्त्र कौटिल्य पृथ्वीराज विजय जयानक
कथासरित्सागर सोमदेव रामचरित हेमचन्द्र
गा़डवाहो वाक्पति प्रबन्धचिन्ता- मणि मेरुतुंग
दशकुमारचरित दण्डी द्वयाश्रय काव्य हेमचन्द्र
बृहत्कथामंजरी क्षेमेन्द्र कुमारपालचरित जयसिंह
मृच्छकटिकम् शूद्रक नवसाहसांकच- रित पद्मगुप्त
विक्रमांकदेव- चरित बिल्हण वसंतविलास बालचन्द्र
हर्षचरित बाणभट्ट प्रबन्ध कोश राजशेखर

3. विदेशियों के वृत्तान्त

विदेशियों के यात्रा वृत्तान्तों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है—यूनान-रोम के लेखक‚ चीन के लेखक तथा अरब के लेखक।

यूनान-रोम के लेखक

हेरोडोटस तथा टीसियस सबसे पुराने यूनानी इतिहासकार थे। हेरोडोटस को ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है। इनकी रचनाओं में कल्पित कहानियों को स्थान दिया गया है। टीसियस ईरान का राजवैद्य था।
▸ नियार्कस‚ आनेसिक्रिटस तथा एरिस्टोबुलस सिकन्दर के साथ भारत आए थे।
▸ मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस का राजदूत था। उसने इण्डिका की रचना की। इसमें मौर्यकालीन समाज तथा प्रशासनिक व्यवस्था का विवरण मिलता है।
पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी एक अज्ञात यूनानी लेखक की रचना है‚ जो मिस्र में आकर बस गया था। उसने 80 ई. में भारतीय समुद्र तट की यात्रा की थी। उसके विवरण में बन्दरगाहों के उल्लेख के साथ-साथ आयात-निर्यात की वस्तुओं का वर्णन है।
टॉलेमी ने ज्योग्राफिका (140 ई.) की रचना की‚ जिसमें भारत के भौगोलिक परिदृश्य का विवरण मिलता है।
▸ प्लिनी ने नेचुरल हिस्ट्री की रचना की‚ इसमें भारत के विविध पक्षों का उपयोगी विवरण है। इसकी रचना पहली सदी ई. में हुई थी।
स्ट्रैबो एक प्रसिद्ध यूनानी रचनाकार था‚ जिसने मेगास्थनीज के विवरण को काल्पनिक माना है और ‘ज्योग्राफिका’ नामक पुस्तक लिखी।

चीन के लेखक

फाह्यान पाँचवीं शताब्दी में गुप्त शासक चन्द्रगुप्त II के शासनकाल में भारत आया था। उसने भारत में बौद्ध धर्म की स्थिति का विवरण दिया है। फाह्यान की प्रसिद्ध रचना फो-क्यो -की है।
ह्वेनसांग हर्षवर्द्धन के समय 629 ई. के लगभग भारत आया था तथा 16 वर्षों तक भारत में रहा। उसके यात्रा-वृत्तान्त में तत्कालीन राजनीति के साथ-साथ भारतीय रीति-रिवाज तथा शिक्षा-पद्धति का वर्णन है। उसका भ्रमण वृत्तान्त सी-यू-की नाम से प्रसिद्ध है।
इत्सिंग सातवीं शताब्दी के अन्त में भारत आया था। उसने विक्रमशिला तथा नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। इत्सिंग ने बौद्ध शिक्षा संस्थाओं तथा भारतीयों की वेशभूषा‚ खानपान आदि के विषय में भी वर्णन है।

अरब के लेखक

सुलेमान नौवीं शताब्दी में भारत आया था। उसने पाल तथा प्रतिहार शासकों के बारे में वर्णन है।
अल मसूदी 914 ई. से 943 ई. तक भारत में रहा। उसने राष्ट्रकूट शासकों के साम्राज्यवादी विस्तार का विवरण दिया है।
अलबरूनी का वास्तविक नाम अबू रिहान था। उसने तहकीक-ए-हिन्द (किताब-उल- हिन्द) की रचना की। वह महमूद गजनवी का समकालीन था।
▸ अलबरूनी ने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया तथा भारतीय समाज का विस्तृत विवरण अपनी रचना में किया है।

प्राचीन भारत में विदेशी यात्री

विदेशी यात्री तत्कालीन शासक सम्भावित तिथि
मेगास्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य 305 ई.पू.
हेलियोडोरस भागभद्र 78 ई.पू.
फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय 405 ई.
सुंगयुन स्कन्दगुप्त 518 ई.
कॉसमॉस ईशानवर्मन मौखरि 547 ई.
ह्वेनसांग हर्षवर्द्धन 629 ई.
इत्सिंग देवपाल 675 ई.
सुलेमान मिहिरभोज 838 ई.
अलमसूदी महिपाल 914 ई.

प्राक् इतिहास

▸ जिस समय के मनुष्यों के जीवन की जानकारी का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलता‚ उसे प्राक् इतिहास या प्रागैतिहास कहा जाता है। प्राप्त अवशेषों से ही हम उस काल के जीवन को जानते हैं। इस समय के प्रमाण उनके औजार हैं‚ जो प्राय: पत्थरों से निर्मित हैं।
होमो सैपियन्स (ज्ञानी मानव) का आविर्भाव तीस-चालीस हजार वर्ष पूर्व माना जाता है। उस समय मनुष्य जंगलों में निवास करता था।
ए. कनिंघम को प्रागैतिहासिक पुरातत्त्व का जनक कहा गया है।
▸ औजारों की प्रकृति के आधार पर प्राक् इतिहास को तीन भागों में बाँटा जाता है—पुरा पाषाणकाल‚ मध्य पाषाणकाल तथा नव पाषाण काल।
▸ पश्चिमोत्तर भारत के सोहन घाटी क्षेत्र से पुरा पाषाण संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ स्थित चौंतरा नामक स्थान से हस्तकुठार तथा शल्क मिलते हैं।
मध्य पाषाण काल में क्वाट्र्जाइट के औजार तथा हथियार बनाए जाते थे।
▸ प्रतापगढ़ (उ.प्र.) में स्थित सरायनाहर राय‚ महदहा तथा दमदमा भारत के सबसे पुराने ज्ञात मध्य पाषाणकालीन स्थल हैं।
▸ मध्य पाषाण कालीन स्थल बागौर (राजस्थान) तथा आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) से पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होता है।
▸ स्थायी निवास का प्रारम्भिक साक्ष्य सराय नाहर राय एवं महदहा से स्तम्भ गर्त के रूप में मिलता है। भीमबेटका से चित्रकारी के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
आदमगढ़ की गुफाओं से गुफा चित्रकारी का प्रमाण मिला है‚ जिनमें आखेट‚ नृत्य तथा युद्ध गतिविधियों को चित्रित किया गया है।
▸ मध्यपाषाण काल के मनुष्यों ने अनुष्ठान के साथ शवों को दफनाने की प्रथा प्रारम्भ की थी। मध्य भारत की लेखनियों से ऐसा साक्ष्य प्राप्त होता है।
▸ नवपाषाण या नियोलिथिक शब्द का प्रयोग सबसे पहले सर जॉन लुबाक ने किया था।
▸ मध्य पाषाणकाल में आग तथा नवपाषाणकाल में पहिए का आविष्कार हुआ। नवपाषाणकाल की प्रमुख विशेषता खाद्य उत्पादन‚ पशुओं के उपयोग की जानकारी तथा स्थिर ग्राम्य जीवन का विकास था।
मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित) प्रसिद्ध नव पाषाणकालीन स्थल है‚ जहाँ 7000 ई.पू. में कृषि कार्य का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से गेहूँ तथा जौ की खेती के प्रमाण मिले हैं।
▸ तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में कश्मीर में समृद्ध नव पाषाणकालीन स्थल बुर्जहोम एवं गुफ्फकराल का पता चला है।
▸ बुर्जहोम से स्तम्भ गर्त तथा गर्तगृह का साक्ष्य मिला है। मनुष्य के साथ कुत्ते‚ भेड़िये तथा जंगली बकरे के शवाधान भी प्राप्त हुए हैं।
▸ उत्तर प्रदेश के बेलन घाटी में स्थित कोल्डीहवा नामक स्थान से चावल की कृषि का साक्ष्य मिला है जो 7000-6000 ई.पू. का है।
चिरान्द (बिहार) से हड्डी के नवपाषाणकालीन अनेक उपकरण मिलते हैं‚ जो हिरण के सींगों के हैं। मनुष्य ने सर्वप्रथम कुत्तों को पालतू बनाया।
▸ मृद्भाण्ड के प्राचीनतम साक्ष्य चौपानीमाण्डो से प्राप्त हुए है।
▸ मनुष्य ने सबसे पहले जिस धातु का उपयोग आरम्भ किया वह ताँबा थी। ताँबे से जिस युग में औजार अथवा हथियार बनाए जाने‚ लगे उसे ताम्र पाषाणकाल कहा जाता है।

हड़प्पा सभ्यता/सिन्धु सभ्यता

▸ सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। यह टिगरिस और यूफ्रेटस के तट पर स्थित मेसोपोटामिया‚ नील नदी के तट पर स्थित मिदा की सभ्यता एवं ह्वांगहो के तट पर स्थित चीनी सभ्यता के समकालीन थी।
▸ सिन्धु घाटी सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप में प्रथम नगरीय क्रान्ति की अवस्था को दर्शाती है। 1921 ई. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अध्यक्ष जॉन मार्शल के निर्देशन में सर्वप्रथम हड़प्पा की खोज के कारण इसका नाम हड़प्पा सभ्यता पड़ा। दयाराम साहनी ने हड़प्पा स्थल की खुदाई कराई‚ जिसमें एक वृहद् नगरीय ढाँचे का अवशेष प्राप्त हुआ।
▸ इस सभ्यता के लिए साधारणत: तीन नामों का प्रयोग होता है— ‘सिन्धु सभ्यता’‚ ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ और हड़प्पा सभ्यता।
▸ यह आद्य ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत एक कांस्ययुगीन सभ्यता है।
▸ रेडियो कार्बन ‘C-14’ जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. को माना जाता है।
▸ 1922-23 ई. में राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो स्थल की खुदाई के दौरान हड़प्पा से मिलते-जुलते अवशेष तथा अधिसंरचना को देखा।
▸ इसके उपरान्त पश्चिमोत्तर भारत के वृहद् क्षेत्र में विभिन्न स्थलों की खुदाई से विकसित सिन्धु सभ्यता का पता चला।
▸ हड़प्पा सभ्यता का क्षेत्र लगभग 12,99,600 वर्ग किमी में फैला पाया गया है। यह सभ्यता उत्तर में कश्मीर के माण्डा से दक्षिण में महाराष्ट्र के दैमाबाद तथा पश्चिम में बलूचिस्तान के सुत्कागेंडोर से पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर तक विस्तृत पाया गया है।

हड़प्पा सभ्यता : प्रमुख स्थल‚ उत्खननकर्ता‚ वर्ष‚ नदी‚ स्थिति एवं प्राप्त साक्ष्य
▸ इसके अवशेष भारत‚ पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान तक फैले हैं। भारत के गुजरात‚ राजस्थान‚ हरियाणा‚ पंजाब में हड़प्पा सभ्यता स्थलों का पता चला है।

क्र. सं. प्रमुख स्थल उत्खननकर्ता नदी वर्ष स्थिति
1 हड़प्पा दयाराम साहनी एवं माधोस्वरूप वत्स रावी 1921 पाकिस्तान का मांटगोमरी जिला
2 मोहनजोदड़ो राखालदास बनर्जी सिन्धु 1922 पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त का लरकाना जिला
3 चान्हूदड़ो गोपाल मजुमदार सिन्धु 1931 सिन्ध प्रान्त (पाकिस्तान)
4 कालीबंगन बी.बी. लाल एवं बी.के थापर घग्घर 1953 राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला
5 कोटदीजी फजल अहमद सिन्धु 1953 सिन्ध प्रान्त का खैरपुर स्थान
6 रंगपुर रंगनाथ राव मादर 1953-54 गुजरात का काठियावाड़ जिला
7 रोपड़ यज्ञदत्त शर्मा सतलज 1953-54 पंजाब का रोपड़ जिला
8 लोथल रंगनाथ राव भोगवा 1957-58 गुजरात का अहमदाबाद जिला
9 आलमगीरपुर यज्ञदत्त शर्मा हिन्डन 1958 उत्तरप्रदेश का मेरठ जिला
10 बनवाली रवीन्द्र सिंह विष्ट रंगोई 1974 हरियाणा का हिसार जिला
11 धौलावीरा रवीन्द्र सिंह विष्ट 1990-91 गुजरात का कच्छ जिला
12 सुत कांगेडोर आरेज स्टाइल, जार्ज डेल्स दाश्क 1927-62 पाकिस्तान के मकरान में समुद्र तट के किनारे

प्राप्त साक्ष्य /अवशेष

प्रमुख स्थल उत्खनन
हड़प्पा (गेटवे शहर) ईंट के मंच के साथ छह ग्रैनरी की दो पंक्ति, पुरुषों की तिमाही, लिंगम और योनी के पत्थर का प्रतीक , कुंवारी-देवी, देवी की मिट्टी के आंकड़े, लकड़ी के मोर्टार में गेहूं और जौ, तांबे के पैमाने और दर्पण, वैनिटीबॉक्स, पासा। मूर्तिकला कुत्ता एक हिरण (कांस्य) का पीछा करते हुए, नग्न पुरुष और नग्न नृत्य करने वाली महिला (पत्थर), लाल रेत पत्थर पुरुष धड़।
मोहनजोदड़ो (मृतकों का टीला) महान स्नान, महान ग्रैनरी (सबसे बड़ी इमारत), बहु-स्तंभित विधानसभा हॉल, कॉलेज, प्रोटो-शिव सील, मातृ देवी की मिट्टी के आंकड़े, पासा। मूर्तिकला कांस्य नाचने वाली लड़की, दाढ़ी वाले व्यक्ति की उत्तेजित छवि।
अमरी गैंडे के वास्तविक अवशेष।
आलमगीरपुर एक कुंड पर कपड़े का छापा।
कालीबंगन (ब्लैक बैंगल) सजी हुई ईंटें, चूड़ी की फैक्ट्री, एक खिलौने की गाड़ी के पहिए, हर घर में कुएँ। दोनों गढ़ और निचले शहर (लोथल के निचले शहर भी गढ़वाले हैं) के चारों ओर एक विशाल ईंट की दीवार, ऊंट, टाइल वाली मंजिल की हड्डियाँ। देवी माँ की मूर्तियाँ यहाँ अनुपस्थित हैं।
चन्हुदड़ो (भारत का लंकाशायर) इंकपॉट, लिपस्टिक, बैठा ड्राइवर के साथ गाड़ियां, कांसे का इक्का , ईंट पर कुत्ते के पंजे की छाप। केवल गढ़ के बिना शहर।
दायमाबाद रथ, बैल, हाथी और गैंडे के साथ सारथी की कांस्य छवियां।
धोलावीरा केवल साइट को तीन भागों में विभाजित किया जाना है। विशाल जल भंडार, अद्वितीय जल दोहन प्रणाली, बांध और तटबंध, एक स्टेडियम, रॉक-कट वास्तुकला।
बनवाली ओवल आकार का निपटान, रेडियल सड़कों के साथ केवल शहर, व्यवस्थित जल निकासी पैटर्न की कमी। खिलौना हल, जौ अनाज की सबसे बड़ी संख्या।
रोपड़ पत्थर और मिट्टी से बनी इमारतें। कुत्ता इंसानों के साथ दफन टिपिकल सिंधु चित्रों के साथ एक उत्कीर्ण स्टीटाइट सील; अंडाकार गड्ढे दफन।
लोथल (सिंधु घाटी सभ्यता के मैनचेस्टर) चावल की भूसी, अग्नि वेदी, पीसने की मशीन, हाथी की सूँड, दाने, घोड़े और सील की टेराकोटा आकृति, मरती हुई वात, चित्रित जार (पक्षी और लोमड़ी), टेराकोटा जहाज, मुख्य सड़कों पर प्रवेश द्वार वाले घर, कुछ मुहरों पर कपड़े के छापे, आधुनिक दिन शतरंज, 180, 90 और 45 डिग्री कोण को मापने के लिए साधन।
सुतकागेंडोर टाउनशिप गढ़ और लोअर टाउन के दो गुना विभाजन।
सुरकोटदा दोनों गढ़ और निचले शहर पत्थर की दीवार के साथ गढ़ लिए। घोड़े की हड्डियों का पहला वास्तविक अवशेष। चार पॉट ब्यूरो के साथ कब्रिस्तान।

सामाजिक जीवन

▸ हड़प्पाई लोगों का जीवन सुविधापूर्ण तथा ऐश्वर्यशाली था। सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार परिवार था। यहाँ निवास करने वाले लोग मुख्यत: भूमध्य सागरीय तथा द्रविड़ मूल के थे।
▸ मातृदेवी की पूजा तथा मुहरों पर अंकित चित्रों से यह परिलक्षित होता है कि हड़प्पा समाज सम्भवत: मातृसत्तात्मक था। मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक काँस्य-आकृति प्राप्त हुई है। हड़प्पा के मिट्टी के बर्तनों पर सामान्यत: लाल रंग का प्रयोग हुआ था।
▸ समाज को व्यवसाय के आधार पर विद्वान् (पुरोहित)‚ योद्धा‚ व्यापारी तथा श्रमिक (शिल्पकार) के रूप में चार भागों में विभाजित किया गया है।
▸ लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों थे। गेहूँ‚ जौ‚ तिल‚ दालें मुख्य खाद्यान्न थे। उत्तर अवस्था में चावल के प्रमाण भी मिलने लगे थे।
▸ स्त्री तथा पुरुषों में बहुमूल्य धातुओं से बने आभूषणों के प्रति आकर्षण देखने को मिलता है। सोने‚ चाँदी‚ हाथीदाँत‚ ताम्र तथा सीपियों से निर्मित आभूषण प्रचलित थे। मनकों के हार सामान्य रूप से प्रचलित थे। मनका निर्माण की कार्यशाला (फैक्ट्री) चन्हूदड़ो में अवस्थित थी। यहाँ से सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्रियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
▸ सिन्धुकालीन स्थल चन्हूदड़ो से एक ईंट पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पंजों के निशान मिले हैं।
▸ आग में पकी मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता था।
▸ सिन्धु घाटी के नगरों में किसी भी मन्दिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
मछली पकड़ना तथा शिकार करना हड़प्पा सभ्यता के निवासियों का दैनिक क्रिया-कलाप था। शतरंज जैसा खेल यहाँ प्रचलित था। यहाँ के निवासी आमोद-प्रमोद प्रेमी थे।
▸ मिट्टी के बर्तनों के अतिरिक्त ताम्र तथा काँस्य के बर्तनों का उपयोग भी हड़प्पाई लोगों द्वारा किया जाता था।

धार्मिक जीवन

▸ धार्मिक रूढ़ियों एवं कर्मकाण्डों को महत्त्व दिया जाता था। मूर्तियों एवं ताबीजों के अतिरिक्त मुहरों पर अंकित चित्रों से पशु पूजा‚ वृक्ष पूजा इत्यादि की प्रवृत्ति सामने आती है।
▸ सिन्धु घाटी के लोग मातृशक्ति में विश्वास करते थे।
▸ मातृ देवी तथा पशुपति शिव की मूर्तियों तथा आकृतियों से इनकी आराधना की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।
▸ मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर पशुपति शिव की मूर्ति उत्कीर्ण है‚ जिसके दाईं ओर चीता और हाथी तथा बाईं ओर गैंडा और भैंसा उत्कीर्ण हैं। आसन के नीचे दो हिरण बैठे हुए हैं। सिर पर त्रिशूल जैसा आभूषण है। इससे पशुपति शिव की पूजा के प्रचलन का पता चलता है।
कूबड़वाला बैल तथा शृंगयुक्त पशु पवित्र पशु थे।
▸ हड़प्पा से पकी मिट्टी की स्त्री मूर्तिकाएँ भारी संख्या में मिली हैं। एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है।
लिंग पूजा प्रचलित थी। लोग अन्धविश्वास तथा जादू-टोना में विश्वास करते थे।
▸ अग्नि कुण्ड का साक्ष्य कालीबंगा से प्राप्त हुआ है। स्वास्तिक‚ चक्र तथा क्रॉस हड़प्पा सभ्यता की देन है।
▸ मृतकों के अन्तिम संस्कार की तीन विधियाँ प्रचलित थीं। ये हैं—पूर्ण समाधीकरण‚ आंशिक समाधीकरण तथा दाह-संस्कार।

महत्वपूर्ण तथ्य

▸ स्वातन्त्र्योत्तर भारत में सबसे अधिक संख्या में हड़प्पायुगीन स्थलों की खोज गुजरात प्रान्त में हुई।
▸ भारत में चाँदी की उपलब्धता के प्राचीनतम साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति में मिलते हैं।
▸ सिन्धु सभ्यता की मुद्रा में आद्य शिव के समतुल्य चित्रांकन मिलता है।
▸ मोहनजोदड़ो स्नानागार के पूर्व में स्थित स्तूप का निर्माण कुषाण काल में किया गया।
▸ सिन्धु सभ्यता में कुम्भकारों के भट्ठों के अवशेष मोहनजोदड़ो से मिले हैं।
पूर्ण समाधीकरण की प्रविधि ही अधिक प्रचलित थी। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से समाधीकरण के साक्ष्य मिले हैं।
▸ मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ मृतकों का टीला है। कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ काले रंग की चूड़ियाँ होता है।

आर्थिक जीवन

▸ हड़प्पा सभ्यता में उपजाए जाने वाली नौ फसलों की अब तक पहचान हुई है। गेहूँ‚ जौ के अतिरिक्त कपास‚ तरबूज तथा मटर भी उपजाए जाते थे।
▸ कपास को यूनानी लेाग सिन्डॉन कहते हैं‚ क्योंकि इसके उपज की पहली जानकारी सिन्धु सभ्यता से प्राप्त हुई है।
▸ कृषि में हल का प्रयोग खेतों की जुताई के लिए किया जाता था।
▸ सिन्धु सभ्यता में कोई फावड़ा या फाल नहीं मिला है‚ परन्तु कालीबंगा मे हड़प्पा-पूर्व अवस्था में कृड़ो (हल रेखा) से ज्ञात होता है कि हड़प्पा काल में राजस्थान के खेतों में हल जोते जाते थे जो संभवत: लकड़ी के होते थे।
▸ व्यवस्थित सिंचाई का प्रमाण नहीं मिला है‚ किन्तु जल-संग्रह के लिए बाँधों के निर्माण का साक्ष्य धौलावीरा से प्राप्त हुआ है।
▸ धातुकर्म की जानकारी हड़प्पा सभ्यता के लोगों को थी। ताँबा तथा टिन मिश्रण से काँस्य निर्माण की प्रविधि उन्हें ज्ञात थी। बन्द ढलाई तथा लुप्त मोम प्रक्रिया से धातुओं से वस्तुएँ बनाई जाती थीं।
▸ माप-तौल के मानकीकरण को स्थापित किया गया था। फुट तथा क्यूबिक की जानकारी लोगों को थी। माप के लिए दशमलव प्रणाली तथा तौल के लिए द्वि-भाजन प्रणाली के साक्ष्य विभिन्न स्थलों से प्राप्त हुए हैं। लोथल से हाथीदाँत का एक पैमाना मिला है।
▸ मुहरों पर चित्रित जहाजों के डिजाइन हैं। लोथल से गोदीबाड़ा का साक्ष्य‚ फारस की मुहरें बाह्य व्यापार का संकेत देती हैं। कालीबंगा से मेसोपोटामिया की बेलनाकार मुहरें भी प्राप्त हुई हैं। अधिकांश मुहरें सेलखड़ी की बनी थीं।
▸ हड़प्पा सभ्यता के लोग आन्तरिक तथा बाह्य व्यापार में संलग्न थे। आन्तरिक व्यापार बैलगाड़ी के माध्यम से संचालित किया जाता था।
▸ मेसोपोटामिया के साक्ष्यों में हड़प्पा स्थलों के लिए मेलूहा शब्द प्रयुक्त हुआ है। इन स्थलों का बाह्य व्यापार फारस की खाड़ी‚ मेसोपोटामिया अफगानिस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान से भी किया जाता था।
▸ हड़प्पा सभ्यता में वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। तौल की इकाई सम्भवत: 16 के अनुपात में थी।
▸ कृषि तथा वाणिज्य-व्यापार के अतिरिक्त‚ बढ़ईगिरी शिल्प कर्म‚ आभूषण निर्माण‚ चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना जैसी व्यावसायिक पद्धतियाँ भी हड़प्पा सभ्यता स्थलों में प्रचलित थीं।
▸ खुदाई में प्राप्त कताई-बुनाई के उपकरणों (तकली‚ सुई आदि) से पता चलता है कि कपड़ा बुनना एक प्रमुख उद्योग था।

आयातित वस्तुएँ

क्र. सं. कच्चा माल क्षेत्र
1. चाँदी ईरान, अफगानिस्तान
2. टिन अफगानिस्तान, ईरान
3. ताँबा खेतड़ी (राजस्थान) , बलूचिस्तान
4. नीलमणि महाराष्ट्र
5. नीलरत्न बदख्शाँ
6. लाजवर्द मेसोपोटामिया
7. शंख तथा कौड़ियाँ सौराष्ट्र, दक्षिणी भारत
8. शिलाजीत हिमालय क्षेत्र
9. सीसा ईरान, अफगानिस्तान, राजस्थान
10. सेलखड़ी बलूचिस्तान, राजस्थान, गुजरात
11. सोना अफगानिस्तान, फारस, दक्षिणी भारत
12. हरितमणि दक्षिण एशिया

नगरीय योजना

▸ हड़प्पा सभ्यता क्षेत्रों में उत्खनन के बाद प्राप्त स्थलों में नगरीकरण के अवशेष मिले हैं। भवनों के निर्माण में एकरूपता के दर्शन होते हैं।
▸ हड़प्पा सभ्यता स्थल से प्राप्त नगरीय अवशेष प्राय: दो भागों में विभाजित हैं—ऊपरी तथा निम्न भाग। ऊपरी भाग दुर्गीकृत है‚ जिसमें राजकीय इमारतें‚ खाद्य भण्डार गृह इत्यादि निर्मित हैं‚ जबकि निम्न भाग में छोटे भवनों के साक्ष्य मिले हैं।
▸ सभी भवन समान क्षेत्रफल में निर्मित हैं। ये सड़कों के किनारे एक आधार पर निर्मित हैं तथा भवनों के दरवाजे गलियों की ओर खुलते हैं।
▸ यहाँ के निवासियों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई।
▸ प्रत्येक सड़क एक-दूसरे को समकोण पर काटती थी। सड़क तथा गली के दोनों ओर पक्की नालियाँ निर्मित थी। मकानों की खिड़कियाँ मुख्य सड़क की तरफ न खुल कर पीछे गली में खुलती थी। लोथल इसका अपवाद है। मुख्य सड़क की चौड़ाई 10 मीटर होती थी। इसे राजपथ कहा जाता था।
▸ भवनों का निर्माण पक्की ईंटों से हुआ है। हड़प्पा सभ्यता में जल निकास प्रणाली इसके शहरीकरण की प्रमुख विशेषता बताती है‚ जो इसके समकालीन मिस्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता में अनुपस्थित थे।
▸ सभी भवनों में स्नानागार बनाए जाते थे तथा इनसे पानी के निकास के लिए पाइपों का निर्माण किया गया था।
मोहनजोदड़ो से एक विशाल स्नानागार का साक्ष्य मिला है‚ जिसके मध्य स्थित स्नानकुण्ड 11.88 मी लम्बा‚ 7.01 मी चौड़ा तथा 2.43 मी गहरा है। इसका उपयोग सम्भवत: आनुष्ठानिक क्रिया-कलापों के लिए किया जाता था।
▸ गुजरात में स्थित धौलावीरा हड़प्पा सभ्यता का एक वृहद् स्थल है‚ यह नगरीय स्थल अन्य स्थलों की भाँति दो भागों में नहीं बल्कि तीन भागों में विभक्त है।
▸ धौलावीरा के दो भाग दुर्गीकृत हैं। यहाँ पत्थरों से निर्मित एक प्रवेश-द्वार तथा पॉलिशदार श्वेत पाषाण खण्ड भी मिला है।
▸ लोथल एवं सुरकोटदा के दुर्ग और नगर एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।

लिपि तथा लेखन कला

▸ सैन्धवकालीन मुहरों से लिपि तथा धर्म की जानकारी मिलती है।
▸ सिन्धु लिपि (हड़प्पा सभ्यता में प्रचलित लिपि) चित्राक्षर लिपि थी‚ जिसमें चित्रों के माध्यम से सम्प्रेषण किया जाता था। इस लिपि को पढ़ने में अभी तक सफलता नहीं मिली है।
▸ इस सिन्धु लिपि में 64 मूल चिह्न तथा 250 से 400 तक चित्राक्षर (पिक्टोग्राफ) हैं। इनका अंकन सेलखड़ी की आयताकार मुहरों‚ ताम्र की गुटिकाओं इत्यादि पर हुआ है।
▸ लिखावट प्राय: दाईं से बाईं ओर है। इसे बोस्ट्रोफेडन लिपि भी कहा जाता है।
▸ लिपि में सबसे ज्यादा प्रयोग U आकार का तथा सबसे ज्यादा प्रचलित चिह्न मछली का है।
▸ हड़प्पा लिपि का सबसे पुराना नमूना 1853 में मिला था और 1923 ई. तक पूरी लिपि प्रकाश में आ गई‚ किन्तु इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

सिन्धु सभ्यता के पतन के कारण

▸ 1800 ई.पू. के आस-पास हड़प्पा सभ्यता बिखर गई। विद्वानों ने इसके पतन के कई कारण बताए हैं
आर्यों का आक्रमण—ह्वीलर‚ स्टुअर्ट पिग्गट‚ गार्डन चाइल्ड
बाढ़—मार्शल‚ मैके‚ एस.आर.राव
जलवायु परिवर्तन—आरेल स्टाईन‚ ए.एन. घोष
जलप्लावन—एम.आर. साहनी
महामारी‚ बीमारी—के.यू.आर. केनेडी
पारिस्थितिक असंतुलन—फेयर सर्विस

क्र. सं. महत्त्वपूर्ण प्रमाण सम्बद्ध स्थल
1. R-37 कब्रिस्तान हड़प्पा (3 कक्षों का कब्रिस्तान)
2. अग्नि वेदियाँ लोथल व कालीबंगा
3. आर्यों के आक्रमण का साक्ष्य मोहनजोदड़ो
4. काँसे का पैमाना मोहनजोदड़ो
5. काँसे की नर्तकी (देवदासी) की मूर्ति मोहनजोदड़ो
6. काली मिट्टी की चूड़ियाँ कालीबंगा
7. गेहूँ की खेती रंगपुर
8. घोड़े का कंकाल सुरकोटड़ा
9. चावल की खेती लोथल
10. जहाज के निशान वाली मुहर मोहनजोदड़ो
11. जुते हुए खेत का साक्ष्य कालीबंगा
12. जौ की खेती बनबाली
13. डॉक यार्ड (बन्दरगाह) का साक्ष्य लोथल (गुजरात) (भोगवा नदी के किनारे)
14. पशुपति शिव की प्रतिमा मोहनजोदड़ो
15. मनके बनाने का कारखाना चन्हूदड़ो (सिन्ध)
16. मातृ देवी प्रतिमा हड़प्पा
17. लकड़ी की नाली कालीबंगा
18. विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो
19. सूती कपड़े का साक्ष्य मोहनजोदड़ो

वैदिक काल

▸ आर्यों के द्वारा निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक व्यवस्था वैदिक संस्कृति के रूप में जानी जाती है। 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. के कालखण्ड को वैदिक काल कहा जाता है।
▸ इस सभ्यता के संस्थापक आर्य थे‚ इसलिए इसे आर्य सभ्यता भी कहा जाता है।
▸ यहाँ आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ‚ उत्तम‚ उदात्त‚ अभिजात्य‚ कुलीन‚ उत्कृष्ट एवं स्वतन्त्र आदि।
▸ ईरान की पवित्र पुस्तक जेन्दावेस्ता तथा बोगजकोई अभिलेख से स्पष्ट होता है कि आर्य ईरान से होकर भारत आए थे। भारत आकर जिस क्षेत्र में बसे उसे सप्त सैन्धव प्रदेश कहा जाता है।
▸ आर्यों के जीवन को समझने के लिए वैदिक काल को दो भागों में बाँटा जाता है। 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के. कालखण्ड को ‘ऋग्वैदिक’ या ‘पूर्व वैदिक काल’‚ जबकि 1000 ई.पू. से 600 ई.पू. तक के कालखण्ड को ‘उत्तर वैदिक काल’ कहा जाता है।

क्र. सं. आदिस्थल मत
1. उत्तरी ध्रुव प्रदेश बाल गंगाधर तिलक
2. कश्मीर एल. डी. कल्ल
3. जर्मनी पेनका, हर्ट
4. दक्षिणी रूस मेयर, पीक व गार्डन चाइल्ड्स
5. देविका प्रदेश (मुल्तान) डी. एस. त्रिदेव
6. ब्रह्मर्षि देश पं. गंगानाथ झा
7. मध्य एशिया* मैक्समूलर
8. मध्य देश डॉ. राजवली पाण्डेय
9. सप्तसैन्धव क्षेत्र डॉ. अविनाश चन्द्र, डॉ. सम्पूर्णानन्द
10. हंगरी (डेन्यूव नदी की घाटी) प्रो. गाइल्स

ऋग्वैदिक काल
▸ ऋग्वैदिक काल (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.) की जानकारी का स्रोत ऋग्वेद है। इस समय वैदिक आर्य अस्थायी जीवन व्यतीत करते थे। यह एक ग्रामीण व्यवस्था के अंग थे।
▸ ऋग्वेद आर्यों ने जिस विस्तृत क्षेत्र का निर्माण किया उसे सप्त सैन्धव प्रदेश कहा गया। इस क्षेत्र में प्रमुख सात नदियाँ प्रवाहित हैं। ये नदियाँ हैं—सिन्धु‚ सतलज‚ रावी‚ चिनाब‚ झेलम‚ व्यास तथा सरस्वती।
▸ ऋग्वेद में इस क्षेत्र को ब्रह्मावतर् भी कहा गया है। ऋग्वेद में हिमालय की चोटी को मूजवन्त कहा गया है।
▸ ऋग्वेद में शर्ध‚ व्रत तथा गण सैनिक इकाइयों का उल्लेख है। पथी-कृत का प्रयोग अग्नि देव के लिए किया गया है। इस काल में राजा की कोई नियमित सेना नहीं थी।

सामाजिक संरचना

▸ ऋग्वैदिक सामाजिक संरचना का आधार परिवार था। परिवार पितृसत्तात्मक था। परिवार के मुखिया को कुलप कहा जाता था‚ जिसे अन्य सदस्यों से अधिक महत्त्व प्राप्त किया जाता था।
▸ पितृ प्रधान समाज में महिलाओं को उचित सम्मान दिया जाता था। महिलाएँ अधिक स्वच्छन्द तथा स्वतन्त्र जीवन-यापन करती थीं। उन्हें पारिवारिक जीवन में यथोचित महत्त्व मिलता था।
▸ महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने तथा राजनीतिक संस्थाओं में शामिल होने की स्वतन्त्रता भी प्राप्त थी। ऋग्वैदिक काल में अपाला‚ सिकता‚ घोषा‚ विश्ववारा‚ लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख है।
▸ ऋग्वैदिक समाज एक कबीलाई समाज था। ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था के चिह्न दिखाई देते हैं। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में चार वर्णों—ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य तथा शूद्र की चर्चा मिलती है‚ किन्तु तब यह विभाजन जन्ममूलक न होकर कर्ममूलक था।
▸ इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण परम-पुरुष के मुख से‚ क्षत्रिय उसकी भुजाओं से‚ वैश्य उसकी जाँघों से एवं शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुआ है।
▸ ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं। ऋग्वेद के ऋषियों में प्रमुख गृत्समद‚ विश्वामित्र‚ वामदेव‚ अत्रि‚ भारद्वाज और वशिष्ठ को क्रमश: दूसरे‚ तीसरे‚ चौथे‚ पाँचवें‚ छठे और सातवें मण्डल का रचनाकार माना

जाता है। ऋग्वेद का आठवाँ मण्डल कण्व और अंगिरस वंश को समर्पित है। नवें मण्डल में सोम की चर्चा है।
▸ गाय को अघन्या (न मारने-योग्य) माना जाता था।
▸ दस्यु की चर्चा ऋग्वेद में ‘अदेवयु’ (देवताओं में श्रद्धा नहीं रखने वाले)‚ ‘अब्रह्मन’ (वेदों को न मानने वाले)‚ ‘अयज्वन’ (यज्ञ नहीं करने वाले) इत्यादि रूपों में की गई है।
▸ ऋग्वैदिक समाज में ‘संस्कारों’ को महत्त्व दिया जाता था। कन्या का विवाह मन्त्रोच्चार के साथ सम्पन्न किया जाता था। लम्बे समय तक विवाह न करने वाली कन्याओं को अमाजू कहा जाता था।
▸ बहुपत्नी प्रथा अनुपस्थित थी। विवाह के अवसर पर वर को उपहार देने की प्रथा थी‚ लेकिन इसे ‘दहेज’ नहीं कहा जा सकता।
▸ कन्या के विदाई के समय जो उपहार एवं द्रव्य दिया जाता था‚ उसे ‘वहतु’ कहा जाता था।
▸ बाल विवाह की प्रथा नहीं थी। समाज में सती-प्रथा का कोई अस्तित्व नहीं था। विधवाओं को पुनर्विवाह की स्वीकृति थी।
सोम आर्यों का मुख्य पेय था‚ जिसे मुख्य आयोजनों के दौरान परोसा जाता था। दूध तथा दूध से बने व्यंजनों की चर्चा भी मिलती है।
▸ स्त्री तथा पुरुष आभूषणों के शौकीन थे। सोने‚ चाँदी‚ ताँबे तथा बहुमूल्य धातुओं के आभूषण प्रयोग में लाए जाते थे। स्त्रियाँ साड़ी तथा पुरुष धोती तथा अंगोछे का उपयोग परिधान के रूप में किया करते थे।
▸ ऋग्वैदिक आर्यों के मनोरंजन के साधन संगीत‚ नृत्य‚ शिकार‚ घुड़दौड़ तथा चौपड़ का खेल था। कई अवसरों पर प्रतिस्पर्द्धा का आयोजन भी किया जाता था।
▸ आर्यों के परिधानों को तीन भागों —वास (शरीर के ऊपर धारण किया जाने वाला मुख्य वस्त्र)‚ अधिवास (कमर के नीचे धारण किया जाने वाला मुख्य वस्त्र) तथा उष्णीय (पगड़ी) में बाँटा जाता है। परिधान के नीचे पहने जाने वाले अधोवस्त्र को नीवी कहा जाता था।

आर्थिक जीवन

▸ आर्यों का जीवन भौतिकता से प्रेरित था। अर्थव्यवस्था में पशुओं का महत्त्व सर्वाधिक था। गाय के लिए युद्धों (गवेषणा) का विवरण ऋग्वेद में मिलता है।
▸ सम्पत्ति की गणना रयि अर्थात् मवेशियों के रूप में होती थी। गाय के अतिरिक्त बकरियाँ (अजा)‚ भेड़ (अवि) तथा घोड़े भी पाले जाते थे।
▸ पशुपालन की तुलना में कृषि का महत्त्व नगण्य था। कृषि के लिए ऊर्दर‚ धान्य तथा सम्पत्ति जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था।
▸ ऋग्वेद में उर्वरा जुते हुए खेत को कहा जाता था‚ खिल्य पशुचारण योग्य भूमि या चरागाह को; सीर हल को; सृणि फसल काटने के यन्त्र (हँसिया) को तथा करीष‚ शब्द का प्रयोग गोबर की खाद के लिए किया जाता था‚ अवट शब्द का प्रयोग कूपों के लिए किया जाता था। सीता शब्द का प्रयोग हल से बनी नालियों (निशान) के लिए किया जाता था।
▸ ऋग्वेद में यव (जौ) तथा धान्य की चर्चा है अर्थात् ऋग्वैदिक आर्य ‘जौ’ की खेती पर अधिक ध्यान देते थे। वस्तुत: इस समय की कृषि विजित लोगों का व्यवसाय मानी गई।
▸ यायावर जीवन व्यतीत करने के कारण भी ऋग्वैदिक आर्यों ने कृषि पर अधिक ध्यान नहीं दिया। निर्वाह अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ वाणिज्य-व्यापार को भी अधिक महत्त्व नहीं मिला था। वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। निष्क एवं शतमान नामक सिक्कों का उल्लेख है।

ऋग्वैदिककालीन नदियाँ

क्र. सं. प्राचीन नाम आधुनिक नाम
1. अस्किनी चिनाब
2. कुभा काबुल
3. कुभ्र कुर्रम
4. गोमती गोमल
5. दृष्द्वती घग्घर
6. परुष्णी रावी
7. मरुद्वद्धा मरुवर्मन
8. वितस्ता झेलम
9. विपाशा व्यास
10. शतुद्रि सतलज
11. सदानीरा गण्डक
12. सुवस्तु स्वात्
13. सुषोमा सोहन

▸ ऋग्वेद में कुछ व्यवसायियों के नाम भी मिलते हैं; जैसे—तक्षण (बढ़ई)‚ बेकनाट (सूदखोर)‚ कर्मकार‚ स्वर्णकार‚ चर्मकार‚ वाय (जुलाहा) आदि।
▸ ऋग्वेद में उल्लिखित समुद्र शब्द मुख्यत: जलराशि का वाचक है।
▸ विनिमय के माध्यम के रूप में निष्क का भी उल्लेख हुआ है। व्यापारियों को ‘पणि’ कहा जाता था।
बेकनाट (सूदखोर) वे ऋणदाता थे‚ जो बहुत अधिक ब्याज लेते थे।
▸ ऋग्वेद में सर्वाधिक पवित्र नदी के रूप में ‘सरस्वती’ (नदीतमा) का वर्णन हुआ है तथा ऊषा‚ अदिति‚ सूर्या जैसी देवियों का भी उल्लेख है।
सत्यमेव जयते ‘मुण्डकोपनिषद’ से तथा असतो मा सद् गमय ऋग्वेद से लिया गया है। गायत्री मन्त्र का उल्लेख भी ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में मिलता है।

राजनीतिक व्यवस्था

▸ ऋग्वैदिक राजनीतिक संरचना की सबसे छोटी इकाई कुल अथवा परिवार किया जाता था‚ जिसका प्रधान कुलप किया जाता था।
▸ परिवारों को मिलाकर ग्राम बनता था‚ जिसके प्रधान को ग्रामणी कहा जाता था। अनेक गाँव मिलकर ‘विश’ बनाते थे। विश का प्रधान विशपति किया जाता था। अनेक विशों का समूह ‘जन’ किया जाता था। जन के अधिपति को जनपति या राजा कहा जाता था। इस प्रकार एक कबीलाई संरचना का राजनीतिक ढाँचा ऊर्ध्वमुखी था‚ जिसमें सबसे नीचे परिवार किया जाता था।
▸ ऋग्वेद में दाशराज्ञ युद्ध का वर्णन है‚ जिसमें भरत जन के स्वामी सुदास ने रावी नदी के तट पर दस राजाओं के संघ को हराया था। इसमें पाँच आर्य तथा पाँच आर्येत्तर जनों के प्रधान थे। भरत जन सरस्वती तथा यमुना नदियों के बीच के प्रदेश में निवास करते थे।
▸ राजा का कर्त्तव्य कबीले की सम्पत्ति की रक्षा करना किया जाता था। राजा कोई पैतृक शासक नहीं था। सभा तथा समितियाँ उसका चयन करती थीं।
सभासमिति तथा विदथ जनप्रतिनिधि संस्थाएँ थीं। इन संस्थाओं में राजनीतिक‚ सामाजिक‚ धार्मिक तथा आर्थिक प्रश्नों पर विचार किया जाता था।
▸ राजा का राज्याभिषेक किया जाता था। इस अवसर पर ग्रामणी‚ रथकार‚ कर्मादिक‚ पुरोहित‚ सेनानी जैसे अधिकारी उपस्थित होते थे। इन अधिकारियों को सामूहिक रूप से रत्निन कहा जाता था। इन अधिकारियों के साथ ‘पुरप’ तथा ‘दूत’ भी उल्लेखनीय हैं। पुरप दुर्गों की रक्षा के प्रति उत्तरदायित्व किया जाता था।
सभा समाज के विशिष्ट जनों की संस्था थी‚ जिसमें स्त्रियाँ भी भाग लेने के लिए स्वतन्त्र थीं। इसके सदस्यों को सुजान कहा जाता था। समिति समुदाय की आम सभा थी जिसके अध्यक्ष को ‘ईशान’ कहते थे। समिति की सदस्यता आम लोगों के लिए खुली होती थी। समिति ही राजा का निर्वाचन करती थी।
विदथ‚ आर्यों की सर्वाधिक प्राचीन संस्था थी। इसे जनसभा भी कहा जाता था। इसमें लुटी वस्तुओं का बँटवारा किया जाता था।
▸ राजा को जनस्यगोपा‚ पुरमेत्ता‚ विशपति‚ गणपति‚ गोपति कहा जाता था। बलि प्रजा द्वारा राजा को स्वेच्छा से दिया जाने वाला उपहार था।

धार्मिक जीवन

▸ ऋग्वैदिक आर्यों की धार्मिक प्रवृत्तियों पर उनके भौतिक जीवन तथा सिद्धान्तों का प्रभाव अत्यधिक था।
▸ पितृसत्तात्मक समाज में देवताओं की प्रधानता तथा देवियों की नगण्यता स्पष्ट दृष्टिगत होती है। देवकुल में स्थान प्राप्त देवताओं पर प्राकृतिक शक्तियों का प्रभाव देखा जा सकता है।
▸ इन्द्र‚ वरुण‚ सूर्य‚ मित्र‚ अग्नि‚ इत्यादि ऋग्वैदिक देवताओं में प्रमुख थे। इन्द्र सर्वप्रमुख देवता थे। वरुण को ‘ऋतस्य गोपा’ कहा जाता था। उसे नैतिक व्यवस्था बनाए रखने वाला देवता माना जाता था। अग्नि को देवता तथा मुनष्य के मध्य मध्यस्थता करने वाले के रूप में जाना जाता था।

ऋग्वैदिक देवता

क्र. सं. देवता सम्बन्ध/विशेषता
1. इन्द्र युद्ध में नेतृत्वकर्ता
2. अग्नि ब्रह्मा से जा़ेडने वाला (यज्ञों का देवता)
3. वरुण ऋत का संरक्षक
4. मरुत आँधी-तूफान का देवता
5. आश्विन विपत्तियों को हरने वाला
6. (चिकित्सा का देवता)
7. पूषन चरागाहों का स्वामी (पशुओं का संरक्षक)
8. द्यौ आकाश का देवता (सबसे प्राचीन)
9. सोम वनस्पतियों का स्वामी (पेय पदार्थों का
10. देवता)
11. उषा प्रगति एवं उत्थान का देवता
12. विष्णु सृष्टि का नियामक
13. सूर्य जीवन देने वाला देवता (भुवनचक्षु)
14. आर्ष विवाह और सन्धि के देवता
15. त्वष्क्षा धातुओं के देवता
16. अरण्यानी जंगल की देवी
17. पर्जन्य वर्षा का देवता
18. मित्र शपथ एवं प्रतिज्ञा का देवता

▸ ऋग्वेद का सबसे महत्त्वपूर्ण देवता इन्द्र था‚ जिसे पुरन्दर कहा गया है। इसके बाद अग्नि एवं वरुण का स्थान था। ईश्वर की आराधना मोक्ष या मुक्ति के लिए नहीं बल्कि भौतिक सुखों के लिए की जाती थी।
▸ यज्ञ तथा बलि की प्रथा इस समय विद्यमान थी‚ किन्तु यज्ञ मन्त्रविहीन होते थे।
▸ ऋग्वैदिक आर्यों में टोटम सम्बन्धी आस्थाओं का प्रचलन मिलता है। कबीलाई जीवन के कई अन्धविश्वास इस समय प्रचलित थे।

उत्तर वैदिक काल

▸ उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू. − 600 ई.पू.) की जानकारी के स्रोत तीन अन्य वेद (ऋग्वेद के अतिरिक्त) हैं—यजुर्वेद‚ सामवेद तथा अथर्ववेद। इस समय आर्यों का विस्तार पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व की ओर होने लगा था तथा आर्य पंजाब से कुरुक्षेत्र अर्थात् गंगा-यमुना दोआब में फैल गए थे।
▸ आर्यों ने स्थायी जीवन व्यतीत करना आरम्भ कर दिया। पशुपालन की जगह कृषि को अधिक महत्त्व मिलने लगा। उत्तर वैदिक आर्यों ने जिस विस्तृत क्षेत्र पर निवास किया‚ उसे आर्यावर्त की संज्ञा दी गई। चित्रित धूसर मृद्भाण्ड तथा लोहा इस काल की विशिष्टता है।

ऐतरेय ब्राह्मण में वर्णित शासन-प्रणाली

क्षेत्र शासन उपाधि
पूर्व (प्राची) साम्राज्य सम्राट
पश्चिम (प्रतीची) स्वराज्य स्वराट
उत्तर (उदीची) वैराज्य विराट
दक्षिण भोज्य भोज मध्य प्रदेश राज्य राजा

समाज संरचना

▸ समाज में स्त्रियों की स्थिति में गिरावट उत्तर वैदिक काल में दर्ज की गई। महिलाएँ अब अधिक स्वतन्त्र नहीं थीं। उन्हें ‘सभा’ की सदस्यता से वंचित किया गया।
▸ महिलाएँ परिवार में सम्माननीय थीं तथा धार्मिक कार्यों में भाग लेती थीं‚ किन्तु उत्तर वैदिक ग्रन्थों में पुत्री जन्म को अच्छा नहीं माना गया था।
▸ समाज में अनेक धार्मिक श्रेणियों का उदय हुआ जो कठोर होकर विभिन्न जातियों में बदलने लगी। व्यवसाय आनुवांशिक होने लगे।
▸ उत्तरवैदिक ग्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् में केवल तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य‚ गृहस्थ तथा वानप्रस्थ) की जानकारी मिलती है। सर्वप्रथम जाबालोपनिषद् में चारों आश्रमों का वर्णन मिलता है अर्थात् इसमें संन्यास का भी वर्णन है।
▸ पच्चीस वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे।
▸ गृहस्थ आश्रम में मनुष्यों को तीन ऋणों−देवऋण‚ ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण से मुक्ति पाने का संस्कार करना पड़ता था।
▸ गृह निर्माण तथा वेशभूषा के तरीकों में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ था। संगीत तथा नृत्य मनोरंजन के साधन थे। नाटकों का मंचन होने लगा था‚ इसे शैलूष कहा गया है। वीणा वादकों के बारे में भी जानकारी मिलती है।
▸ तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार‚ ब्राह्मण सूत का‚ क्षत्रिय सन का और वैश्य ऊन का यज्ञोपवीत धारण करते थे। श्वेताश्वर उपनिषद् रुद्र देवता को समर्पित है‚ जिसमें उनका शिव के रूप में वर्णन मिलता है।
▸ अथर्ववेद में मवेशियों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है। सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक लौह पुंज अतरंजीखेड़ा से मिला है।
▸ पांचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और तत्त्वज्ञानी ब्राह्मणों को लेकर विख्यात था।
व्रात्य तथा निषाद नामक अनार्य जातियों की चर्चा उत्तर वैदिक ग्रन्थों में मिलती है। वे वैदिक संस्कृति का पालन नहीं करने के कारण ही अनार्य कहलाए।

आर्थिक जीवन

▸ सम्पत्ति पर एकाधिकारिता की प्रवृत्ति उभरी। लोगों ने खेती के व्यवसाय को अपनाया‚ क्योंकि लोहे के प्रसार ने खेती को सुलभ बना दिया।
▸ निष्क‚ शतमान जैसे सिक्कों की चर्चा मिलती है। वणिक संघों—गण तथा श्रेष्ठिन के अस्तित्व में आने की सूचना उत्तर वैदिक ग्रन्थों से भी मिलती है।
▸ बाट की मूलभूत इकाई सम्भवत: कृष्णल था। रत्तिका तथा गुंजा भी तौल की एक इकाई थी।
▸ रथ निर्माण‚ धनुष बनाने तथा वस्त्र निर्माण से शासकों को राजकीय करों की प्राप्ति होती थी।
▸ वाणिज्य में विस्तार के कारण वैश्यों को भी महत्त्व मिला।
शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं−जुताई‚ बुआई‚ कटाई तथा मड़ाई का उल्लेख हुआ है। हल को ‘सीर’ कहा जाता था।
▸ मिट्टी के एक विशेष प्रकार के बर्तन बनाए जाते थे‚ जिन्हें चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (Painted Grey Ware-PGW) कहा जाता है।
काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का उल्लेख है।
▸ तैत्तिरीय उपनिषद में अन्न को ब्रह्मा तथा यजुर्वेद में हल को ‘सीर’ कहा गया है।

राजनीतिक व्यवस्था

▸ राजा का पद वंशानुगत होने लगा। ऋग्वैदिककालीन कबीलों ने जनपद रूप ग्रहण किया। सभा तथा समिति जैसी संस्थाओं का नियन्त्रण कम हुआ और ‘राजा’ या ‘राजन’ अधिक शक्ति सम्पन्न होने लगे।
▸ उत्तरवैदिक काल में अनेक दार्शनिक राजा भी सतारूढ़ हुए‚ जिनमें प्रमुख थे − विदेह के जनक‚ कैकेय के अश्वपति‚ काशी के अजातशत्रु और पांचाल के प्रवाहण जाबालि।
▸ राजा मन्त्रियों तथा अधिकारियों की सहायता से शासन करता था। अधिकारी वर्ग रत्निन कहा जाता था।
▸ न्याय-व्यवस्था में राजा का निर्णय महत्त्वपूर्ण था। सामान्य मुकदमे घरेलू स्तर पर ही निपटाए जाते थे।
▸ इस काल में संग्रहित‚ भागदुध‚ सूत गोवितकर्तन जैसे अधिकारियों का अस्तित्व सामने आया। प्रान्तीय शासन तथा पुलिस व्यवस्था भी सामने आई।
▸ राष्ट्र शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इसी समय हुआ था।

धार्मिक जीवन

▸ यज्ञ तथा बलि की पद्धति उत्तर वैदिक धर्म का मूल आधार बन गया। यज्ञ के साथ-साथ कई अन्य अनुष्ठानों का प्रचलन भी आरम्भ हुआ‚ जिसमें पुरोहितों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई।
▸ इस काल में इन्द्र के स्थान पर प्रजापति सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता हो गए थे। विष्णु को मनुष्य जाति के दु:खों का अन्त करने वाला माना गया।
▸ विभिन्न कर्मकाण्डों तथा अन्धविश्वासों का विस्तार हुआ। जादू-टोने तथा भूत-पिशाचों के विश्वास ने धर्म में स्थान बनाया।
▸ उत्तर वैदिक काल में प्रजापति जो देवकुल में सृष्टि के निर्माता थे‚ को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो गया।
▸ उत्तर वैदिक काल में ही बहुदेववाद‚ वासुदेव सम्प्रदाय एवं षडदर्शनों का बीजारोपण हुआ।
पूषन शूद्रों के देवता के रूप में प्रचलित थे। ऋग्वैदिक काल में वह पशुओं के देवता थे।
▸ धार्मिक अनुष्ठान तथा यज्ञों में मन्त्रोच्चारण की प्रधानता के कारण ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ा। ब्रह्म‚ जीव‚ आत्मा के दार्शनिक मतों पर भी चर्चा की जाने लगी।

पंच महाङ्मज्ञ

ब्रह्म यज्ञ पठन-पाठन या प्राचीन ऋषि के प्रति कृतज्ञता
देव यज्ञ हवन द्वारा देवताओं की पूजा-अर्चना
पितृ यज्ञ पितरों का तर्पण (जल और भोजन) द्वारा
नृयज्ञ या मनुष्य यज्ञ अतिथि-सत्कार द्वारा
भूत यज्ञ या बलि चींटियों‚ पक्षियों आदि को भोजन देना

उत्तर वैदिक अधिकारी वर्ग

क्र. सं. कार्य अधिकारी
1. राजा का सलाहकार पुरोहित
2. आखेट में राजा का साथी गोविकर्तन
3. राजा का उत्तराधिकारी युवराज
4. दूत पालागल
5. रथवाहक (सारथी) सूत
6. ग्राम प्रशासक ग्रामणी
7. कोषाध्यक्ष संगृहित
8. सेना का प्रधान सेनानी
9. कर संग्रह करने वाला भागदुध
10. पुलिस अधिकारी जीवग्रिभ
11. जुए का निरीक्षक अक्षवाप
12. न्यायाधीश ग्राम्यवादिन

उत्तर वैदिक यज्ञ

राजसूय राजा के राज्याभिषेक के अवसर पर यह यज्ञ किया जाता था। इस यज्ञ के माध्यम से राजा में दिव्य शक्तियाँ प्रत्यारोपित करने का कार्य किया जाता था। इसमें ’सोम’ ग्रहण किया जाता था। इस यज्ञ के दौरान राजा ‘रत्निनों’ के घर जाता था।

वाजपेय राजा अपने शौर्य तथा शक्ति-प्रदर्शन के लिए इस यज्ञ का आयोजन करता था। इसमें रथ दौड़ के माध्यम से जनता का मनोरंजन भी किया जाता था।

अश्वमेघ साम्राज्य विस्तार तथा पड़ोसी शासकों को चुनौती देने के लिए यह यज्ञ आयोजित किया जाता था। इस यज्ञ में घोड़ा राजा के प्रभुत्व का प्रतीक माना जाता था। यह राजकीय यज्ञों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध था। शतपथ ब्राह्मण में भारत के दो राजाओं भरत दोषयन्ति और शतानिक सत्राजित द्वारा अश्वमेघ करने का उल्लेख है।

अग्निष्टोम पशु बलि की प्रणाली को इस यज्ञ का मूल माना जाता था। अग्नि देव को प्रसन्न करने के लिए इसका आयोजन किया जाता था।

वैदिक साहित्य

▸ आर्यों के बारे में जानकारी का मुख्य स्रोत वैदिक साहित्य हैं। इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य को दो भागों में बाँटा जाता है। ये हैं− श्रुति साहित्य तथा स्मृति साहित्य।
श्रुति साहित्य में वेदों के अतिरिक्त ब्राह्मण ग्रन्थ‚ आरण्यक ग्रन्थ तथा उपनिषद् आते हैं। यह साहित्य लम्बे समय तक मौखिक रूप से चलते रहे तथा बाद में उनका संकलन किया गया।
स्मृति साहित्य मनुष्यों द्वारा रचित है। इसमें वेदांग‚ सूत्र तथा स्मृति ग्रन्थ शामिल हैं। श्रुति साहित्य स्मृति साहित्य की तुलना में अधिक पवित्र तथा श्रेष्ठ माने जाते हैं।

श्रुति साहित्य

▸ श्रुति साहित्य में वेदों का प्रथम स्थान है। वेद शब्द ‘विद्’ धातु से बना है‚ जिसका अर्थ होता है ‘जानना’; वेदों से आर्यों के जीवन तथा दर्शन का पता चलता है।
▸ वेदों की संख्या चार है। ये हैं—ऋग्वेद‚ यजुर्वेद‚ सामवेद तथा अथर्ववेद; वेदों को संहिता भी कहा जाता है। वेदों के संकलन का श्रेय महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद-व्यास को प्राप्त है।

ॠग्वेद

▸ ऋग्वेद 10 मण्डलों में विभाजित है। इसमें देवताओं की स्तुति में 1028 श्लोक हैं‚ जिसमें 11 बालाखिल्य श्लोक हैं। ऋग्वेद में 10,462 मन्त्रों का संकलन है।
▸ ऋग्वेद का पाठ करने वाले होता या होतृ वर्ग के पुरोहित होते थे।
▸ ऋग्वेद का पहला तथा 10वाँ मण्डल क्षेपक माना जाता है। नौवें मण्डल में सोम की चर्चा है। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र ऋग्वेद के तीसरे मण्डल से लिया गया है‚ जिसमें सवितृ नामक देवता को सम्बोधित किया गया है। आठवें मण्डल की हस्तलिखित ऋचाओं को खिल कहा जाता है।
▸ ऋग्वेद की अनेक बातें ईरानी ग्रन्थ अवेस्ता से मिलती हैं। देवताओं में इन्द्र‚ वरुण‚ अग्नि‚ सोम तथा सूर्य प्रमुख माने गए हैं।
▸ ऋग्वेद में घोषा‚ लोपामुद्रा‚ विश्ववारा इत्यादि विदुषी महिलाओं का उल्लेख है। आजीवन धर्म तथा दर्शन की अध्येता महिलाओं को ऋग्वेद में ब्रह्मवादिनी कहा गया है।
▸ ऋग्वेद में आर्यों तथा अनार्यों के बीच संघर्ष का उल्लेख है। इसमें प्रसिद्ध दाशराज्ञ युद्धकी चर्चा है।
▸ आर्यों का प्रसिद्ध कबीला भरत था। भरत ने दाशराज्ञ युद्ध में आर्यों का नेतृत्व किया। भरत कबीले का शासक सुदास था‚ जिसने वशिष्ठ को अपना पुरोहित बनाया; इसी कारण विश्वामित्र ने अनार्यों का साथ दिया।
▸ जंगल की देवी के रूप में अरण्यानी का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।
ऋग्वेद की शाखाएँ शाकल‚ वाष्कल‚ आश्वलायन‚ शंखायन तथा माण्डुक्य हैं।
▸ राजा के लिए ‘पुराम्भेत्ता’‚ यायावर प्रजा के लिए ‘चर्षणि’ शब्द का प्रयोग हुआ है तथा स्थायी निवास करने वालों को ‘कृष्टि’ तथा उत्पादन में सक्षम जनता को ‘अर्य’ कहा गया है।
▸ ब्रह्मा को ऋग्वेद में विधातृ‚ हिरण्यगर्भ‚ प्रजापति‚ बृहस्पति‚ विश्वकर्मन इत्यादि नामों से सम्बोधित किया गया है। इन्द्र को पुरन्दरदस्युहनपुरोभिद जैसे नामों से पुकारा गया है। अग्नि को पथिकृत अर्थात् पथ का निर्माता कहा गया है।
▸ ऋग्वेद की रचना पंजाब के क्षेत्र में हुई थी। पंजाब तथा पश्चिमोत्तर भारत की नदियों की बार-बार चर्चा ऋग्वेद में मिलती है। इसे सप्त सैंधव कहा गया है।
सरस्वताे ऋग्वेद में एक पवित्र नदी के रूप में उल्लिखित है। सरस्वती के प्रवाह-क्षेत्र को देवकृत योनि कहा गया है।
▸ ऋग्वेद में आकाश के देवता हैं—सवितृ (सावित्री)‚ सूर्य‚ ऊषा‚ पूषन्‚ विष्णु‚ नासत्य‚ उरुक्रम।

यजुर्वेद

▸ यजुर्वेद में अनुष्ठानों तथा कर्मकाण्डों में प्रयुक्त होने वाले श्लोकों तथा मन्त्रों का संग्रह है। इसका गायन करने वाले पुरोहित अध्वर्यु कहलाते थे।
▸ यजुर्वेद गद्य तथा पद्य दोनों में रचित है। इसके दो पाठान्तर हैं
1. कृष्ण यजुर्वेद
2. शुक्ल यजुर्वेद
▸ शुक्ल यजुर्वेद को ‘वाजसनेमी संहिता’ भी कहा जाता है।
▸ कृष्ण यजुर्वेद ‘गद्य’ तथा शुक्ल यजुर्वेद ‘पद्य’ में रचित पाठान्तर हैं।
▸ कृष्ण यजुर्वेद में तैत्तिरीय‚ मैत्रायणी तथा काठक पाठान्तर हैं‚ जबकि शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेय पाठान्तर में सुरक्षित है।
▸ यजुर्वेद में कृषि तथा सिंचाई की प्रविधियों की चर्चा है। चावल का ‘व्रीही’ के रूप में उल्लेख है।
▸ यजुर्वेद में राजसूय‚ वाजपेय तथा अश्वमेघ यज्ञ की चर्चा है। रत्निनों में (वैदिक अधिकारियों) की चर्चा भी यजुर्वेद में हुई है।
▸ यजुर्वेद में 40 मण्डल तथा 2000 ऋचाएँ (मन्त्र) हैं।

सामवेद

▸ सामवेद के अधिकांश श्लोक तथा मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। इस वेद से सम्बन्धित श्लोक तथा मन्त्रों का गायन करने वाले पुरोहित उद्गातृ कहलाते थे।
▸ सामवेद का सम्बन्ध संगीत से है तथा इसमें संगीत के विविध पक्षों का उल्लेख हुआ है। इसमें कुल 1549 श्लोक हैं‚ जिनमें से 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद से लिए गए हैं। सामवेद में मन्त्रों की संख्या 1810 है।
▸ इसकी तीन शाखाएँ हैं—कौथुम‚ जैमिनीय एवं राणायनीय।

अथर्ववेद

▸ अथर्ववेद की रचना अथर्वा ऋषि ने की थी। अथर्ववेद की दो शाखाएँ हैं—शौनक एवं पिप्लाद।
▸ अथर्ववेद के अधिकांश मन्त्रों का सम्बन्ध तन्त्र-मन्त्र या जादू-टोनों से है। रोग निवारण की औषधियों की चर्चा भी इसमें मिलती है। अथर्ववेद के मन्त्रों को भारतीय विज्ञान का आधार भी माना जाता है।
▸ अथर्ववेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
▸ सर्वोच्च शासक को अथर्ववेद में एकराट् कहा गया है। ‘सम्राट’ शब्द का भी उल्लेख है।
▸ सूर्य का वर्णन एक ब्राह्मण विद्यार्थी के रूप में अथर्ववेद में हुआ है।

वेदांग

▸ वेदांगों की संख्या 6 बताई जाती है। ये हैं— शिक्षा‚ कल्प‚ व्याकरण‚ निरुक्त‚ छन्द और ज्योतिष।
शिक्षा की सबसे प्रामाणिक रचना प्रातिशाख्य सूत्र है। इसमें शुद्ध उच्चारण की पद्धति बताई गई है।
कल्प यज्ञों के सम्पादन से जुड़े नियमों की जानकारी देते हैं। श्रौत सूत्र तथा गृह्य सूत्र कल्प की रचनाएँ हैं।
व्याकरण की सबसे पहली तथा व्यापक रचना पाणिनी की अष्टाध्यायी है।
▸ निरुक्त विषय पर यास्क तथा छन्द पर पिंगल ने मानक रचनाएँ कीं।
▸ ज्योतिष में खगोल विज्ञान के अध्ययन का विवरण मिलता है।
▸ ज्योतिष का पहला ग्रन्थ‚ आचार्य लागद्य मुनि द्वारा रचित वेदांग ज्योतिष है।
▸ वेदांग ज्योतिष को ‘वेद की आँख’ भी कहा गया है।

वेदों की शरीर रचना

छन्द वेद के पाद कल्प वेद के हाथ ज्योतिष वेद की आँखें निरुक्त वेद के कान शिक्षा वेद की नासिका व्याकरण वेद के मुख

वेदांग एवं सम्बन्धित विषय

शिक्षा शुद्ध उच्चारण कल्प यज्ञों का सम्पादन व्याकरण व्याकरणिक नियम निरुक्त शब्दों की व्युत्पत्ति छन्द छन्दों का प्रयोग ज्योतिष खगोलविज्ञान

ब्राह्मण ग्रन्थ

▸ वेदों की आध्यात्मिक व्याख्या के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की गई। यह गद्य में है।
ऐतरेय ब्राह्मण में 8 मण्डल हैं। प्रत्येक मण्डल में 6 पाठ हैं। इसे ‘पंचिका’ भी कहा जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण की रचना महिदास ऐतरेय ने की थी। कौशीतकी ब्राह्मण में 30 अध्याय हैं। इसे संख्यायन ब्राह्मण भी कहा जाता है।
▸ पंचविश ब्राह्मण में 25 मण्डल हैं। इसे ताण्ड्य ब्राह्मण भी कहा जाता है।

वेद‚ उपवेद एवं प्रमुख ब्राह्मण ग्रन्थ

वेद उपवेद (रचनाकार) ब्राह्मण ग्रन्थ
ऋग्वेद आयुर्वेद (प्रजापति) ऐतरेय‚ कौषीतकी
यजुर्वेद धनुर्वेद (विश्वामित्र) तैत्तिरीय‚ शतपथ
सामवेद गन्धर्ववेद (नारद) पंचविश‚ जैमनीय‚ षडविश‚ ताण्ड्य
अथर्ववेद शिल्प वेद (विश्वकर्मा) गोपथ

आरण्यक

▸ ऋषियों द्वारा जंगलों में रचित ग्रन्थों को आरण्यक कहा गया है।
▸ सभी आरण्यक ग्रन्थ ब्राह्मण ग्रन्थों से जुड़े हैं। प्रमुख आरण्यक ग्रन्थ हैं— ऐतरेय‚ शंखायन‚ वृहदारण्यक‚ छान्दोग्य‚ जैमिनी।

उपनिषद्

▸ वेदों की दार्शनिक व्याख्या के लिए उपनिषदों की रचना की गई।
▸ उपनिषदों की संख्या 108 बताई जाती है। ‘उपनिषद्’ का शाब्दिक अर्थ एकान्त में प्राप्त ज्ञान है।
▸ उपनिषदों में आत्मा‚ जीव‚ जगत‚ ब्रह्म जैसे गूढ़ दार्शनिक मतों को समझाने का प्रयास किया गया है।
▸ उपनिषदों को वेदान्त भी कहा जाता है। ये वैदिक साहित्य (श्रुति साहित्य) की अन्तिम रचनाएँ हैं‚ जिस कारण इन्हें वेदान्त कहा जाता है।
▸ वृहदारण्यक‚ छान्दोग्य‚ कठ‚ मण्डूक इत्यादि प्रसिद्ध उपनिषद् हैं। भारत का सूत्र वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
▸ यम तथा नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद की कथा कठोपनिषद् में वर्णित है।
▸ श्वेतकेतु एवं उसके पिता का संवाद छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित है।

स्मृति साहित्य

▸ स्मृति साहित्य के अन्तर्गत स्मृति‚ पुराण तथा धर्मशास्त्र आते हैं।
मनु स्मृति सबसे प्राचीन स्मृति ग्रन्थ है। इसकी रचना दूसरी शताब्दी ई.पू. में शुंगकाल में हुई थी।
▸ पुराणों की संख्या 18 है। इनमें मत्स्य‚ वायु‚ वामन‚ मार्कण्डेय‚ विष्णु इत्यादि प्रमुख हैं।
▸ पुराण वस्तुत: ऐतिहासिक प्रवृत्तियों को सामने लाता है। पुराणों के संकलन का श्रेय महर्षि लोमहर्ष तथा उनके पुत्र उग्रश्रवा को दिया जाता है।
▸ सबसे प्राचीन पुराण मत्स्य पुराण है‚ जिसमें विष्णु के दस अवतारों की चर्चा मिलती है।
▸ रामायण तथा महाभारत धर्मशास्त्र की श्रेणी में आते हैं।
▸ रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी। यह संस्कृत भाषा में है। रामायण 7 काण्डों में विभक्त है। इसे चतुर्विंशति सहस्त्री संहिता भी कहा जाता है।
▸ महाभारत की रचना वेदव्यास ने की थी। इसमें कौरव तथा पाण्डवों के बीच युद्ध का वर्णन मिलता है। महाभारत 18 पर्वों में विभक्त है। इसे ‘जयसंहिता’ या ‘शतसाहस्त्र संहिता’ भी कहा जाता है।
श्रीमद्भागवत गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंश है।

सूत्र साहित्य

कल्प सूत्र विधि एवं नियमों का प्रतिपादन श्रोत सूत्र यज्ञ से सम्बन्धित विस्तृत विधि-विधानों की व्याख्या शुल्व सूत्र यज्ञ स्थल तथा अग्निवेदी के निर्माण तथा माप से सम्बन्धित नियम हैं। इसमें भारतीय ज्यामिति का प्रारम्भिक रूप दिखाई देता है। धर्म सूत्र सामाजिक-धार्मिक कानून तथा आचार संहिता है। गृह सूत्र मनुष्य के लौकिक एवं पारलौकिक कर्त्तव्य

षड्दर्शन

यह वैदिक साहित्य के अतिरिक्त भारतीय समाज तथा दर्शन को दिशा देने वाले ग्रन्थ भी हैं‚ जिनसे भारतीय दर्शन का निर्माण हुआ है। इनमें आत्मा‚ जीव‚ जगत‚ ब्रह्म इत्यादि को विभिन्न प्रकार से समझाने का प्रयास किया गया है।

भारतीय दर्शन

क्र. सं. दर्शन प्रवर्तक
1 सांख्य कपिल
2 योग पतंजलि (योगसूत्र)
3 न्याय गौतम (न्यायसूत्र)
4 पूर्वमीमांसा जैमिनी
5 उत्तरमीमांसा (वेदांत) बादरायण (ब्रह्मसूत्र)
6 वैशेषिक कणाद या उलूक

धार्मिक आन्दोलन

▸ छठी शताब्दी ई.पू. धार्मिक आन्दोलनों की शताब्दी मानी जाती है। इस समय यूनान में हेराक्लिज‚ ईरान में जरथ्रुष्ट‚ चीन में कन्फ्यूशियस तथा भारत में जैन तथा बौद्ध धर्म अस्तित्व में आये। भारत में वैदिक धर्म की यज्ञ-बलि तथा कर्मकाण्डों की प्रतिक्रिया में समता पर आधारित सम्प्रदायों का प्रभाव कायम हुआ।
▸ जैन तथा बौद्ध धर्म ने ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता को समाप्त कर वर्ण प्रधान सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। नवीन नागरिक जीवन का उदय इस दौरान हुआ।

जैन धर्म

जैन धार्मिक विचार के अनुसार जैनों के 24 तीर्थंकर हुए। ऋषभदेव (आदिनाथ) पहले तीर्थंकर थे। जिन्हें जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है। ऋग्वेद में ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि नामक तीर्थंकरों की चर्चा है।

जैन तीर्थंकर : 1. ऋषभदेव 2. अजितनाथ 3. सम्भवनाथ 4. अभिनन्दन स्वामी 5. सुमतिनाथ 6. पद्मप्रभु 7. सुपार्श्वनाथ 8. चन्द्रप्रभु 9. सुविधिनाथ 10. शीतलनाथ 11. श्रेयांसनाथ 12. वासुमूल्य 13. विमलनाथ 14. अनन्तनाथ 15. धर्मनाथ 16. शान्तिनाथ 17. कुन्थुनाथ 18. अर्रनाथ 19. मल्लिनाथ 20. मुनिसुब्रत 21. नेमिनाथ 22. अरिष्टनेमि 23. पार्श्वनाथ 24. महावीर स्वामी
▸ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। पार्श्वनाथ काशी नरेश अश्वसेन के पुत्र थे। उनका निर्वाण सम्मेद शिखर पर हुआ था।

महावीर स्वामी

▸ जैन धर्म के मुख्य प्रवर्तक तथा 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। इनके बचपन का नाम वर्धमान था।
▸ महावीर का जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के निकट कुण्डग्राम (ज्ञातृक कुल) में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला था। त्रिशला लिच्छवि शासक चेटक की बहन थी।
▸ महावीर का विवाह यशोदा से हुआ था तथा प्रियदर्शनी (अणोज्जा) नाम की उनकी एक पुत्री थी। तीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग दिया तथा संन्यासी हो गए।
▸ 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद ऋजुपालिका नदी के तट पर जृम्भिक ग्राम में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ‚ जिसके बाद उन्हें ‘जिन’‚ निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित)‚ महावीर‚ अर्हत (योग्य) तथा ‘केवलिन’ कहा गया।
▸ इन्होंने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में प्राकृत (अर्द्धमगधी) भाषा में दिया तथा इनकी मृत्यु पावापुरी में 72 वर्ष की आयु में 468 ई. पू. में हुई।
▸ जैन ग्रन्थ कल्पसूत्र तथा आचरांगसूत्र में महावीर की कठोर तपस्या तथा ज्ञान प्राप्ति की चर्चा मिलती है।

जैन तीर्थंकर प्रतीक चिह्न
ऋषभदेव साँड (वृषभ)
अजितनाथ हाथी (गज)
संभवनाथ घोड़ा (अश्व)
नेमिनाथ शंख (नीलोत्पल)
पार्श्वनाथ सर्प (सर्पफण)
महावीर सिंह

▸ जैन धर्म मानने वाले प्रमुख राजा उदायिन‚ चन्द्रगुप्त मौर्य‚ सम्प्रति‚ कलिंग नरेश खारवेल‚ राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष‚ गंग नरेश‚ गुजरात के सोलंकी शासक थे।
▸ मैसूर के गंग वंश के मंत्री ने गोमतेश्वर में महावीर की विशाल मूर्ति का निर्माण करवाया था।
▸ महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात जैन संघ का प्रथम अध्यक्ष सुधर्मन बना।

जैन दर्शन तथा सिद्धान्त

▸ महावीर से पहले पार्श्वनाथ ने चार जैन-सिद्धान्त दिए थे। ये हैं—सत्य‚ अहिंसा‚ अपरिग्रह तथा अस्तेय। महावीर ने इसमें पाँचवाँ सिद्धान्त ब्रह्मचर्य जोड़ा।
▸ जैन दर्शन वैदिक सांख्य-दर्शन के निकट है। जैन धर्म में कर्म सिद्धान्त को महत्त्व दिया गया है। मोक्ष को जीव का परम लक्ष्य बताया गया है।
▸ जैन धर्म में स्यादवाद का दर्शन है‚ जिसमें सात सत्य शामिल किए गए हैं। इसे अनेकान्तवाद भी कहा जाता है।
आठ कर्म तथा अठारह पापों की चर्चा जैन धर्म में की गई है। कर्म तथा पापों के त्याग से मोक्ष की प्राप्ति ही लक्ष्य माना गया है। इसके लिए त्रिरत्न (रत्नत्रैय) का विचार दिया गया है।
त्रिरत्न जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष के लिए तीन तत्त्वों का होना जरूरी है। ये हैं— सत्य-विश्वास (सम्यक् दर्शन)‚ सत्य ज्ञान (सम्यक् ज्ञान) तथा सत्य कर्म (सम्यक् कर्म)।
▸ जैन धर्म में आत्मा की सर्वोपरि स्थिति को माना गया है। जाति व्यवस्था का निषेध किया गया‚ किन्तु मूर्ति पूजा को स्वीकृति दी गई है।

जैन संघ

▸ महावीर ने समस्त अनुयायियों को 11 गणों में विभक्त किया तथा प्रत्येक गण में एक प्रधान (गणधर) नियुक्त कर धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व प्रदान किया। जैन संघ के सदस्यों को चार वर्गों में विभाजित किया गया। ये हैं—भिक्षु‚ भिक्षुणी‚ श्रावक‚ श्राविका। भिक्षु तथा भिक्षुणी संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे‚ जबकि श्रावक एवं श्राविका को गृहस्थ जीवन व्यतीत करने की स्वीकृति थी।
▸ जैन संघ दो भागों में विभाजित हुआ—दिगम्बर (भद्रबाहु के समर्थक) तथा श्वेताम्बर (स्थूलभद्र के समर्थक) इन सम्प्रदायों का विभाजन वैचारिक भिन्नता के आधार पर हुआ था। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र धारण करते थे‚ जबकि दिगम्बर बिना वस्त्रों के जीवन व्यतीत करते थे।

जैन संगीतियाँ

संगीति काल स्थान अध्यक्ष
प्रथम संगीति 322 से 298 ई.पू. पाटलिपुत्र स्थूलभद्र
द्वितीय संगीति 512 ई. वल्लभी देवर्धि

जैन धर्म ग्रन्थ

▸ जैन धर्म ग्रन्थों की रचना प्राकृत भाषा में हुई है।
▸ जैन ग्रन्थों को पूर्व या आगम कहा जाता है। इसमें 12 अंग‚ 12 उपांग‚ 10 प्रकीर्ण‚ 6 छेदसूत्र‚ 4 मूलसूत्र शामिल हैं।
▸ चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में आयोजित प्रथम जैन संगीति में आगमों का संकलन ‘अंगों’ में हुआ।
▸ आचरांग सूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियम‚ भगवती सूत्र में महावीर के जीवन‚ नायाधम्मकहा में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह तथा उदासक दशांग में उपासकों के जीवन सम्बन्धी नियम दिए गए हैं।
▸ जैन तीर्थंकरों का जीवनचरित भद्रबाहु रचित कल्पसूत्र में है।

महत्वपूर्ण तथ्य

▸ प्रथम जैन संगीति का दक्षिणी जैनों (दिगम्बरों) ने विरोध किया था।
▸ चम्पा के शासक दधिवाहन की पुत्री चन्दना महावीर की पहली महिला भिक्षुणी थी।
▸ महावीर के प्रथम अनुयायी उनके दामाद (प्रियदर्शनी के पति) जमालि बने थे।
▸ जैन मठों को बसादी कहा जाता है।

जैन तीथकर के नाम एवं क्रम प्रतीक चिह्न
ऋषभदेव (प्रथम) साँड
अजितनाथ (द्वितीय) हाथी
संभव (तृतीय) घोड़ा
संपार्श्व (सप्तम) स्वास्तिक
शांति (सोलहवाँ) हिरण
नामि (इक्किसवें) नीलकमल
अरिष्टनेमि (बाइसवें) शंख
पार्श्व (तेइसवें) सर्प
महावीर (चौबीसवें) सिंह

बौद्ध धर्म

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आन्दोलनों में बौद्ध धर्म सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं— बुद्ध‚ धम्म एवं संघ।

महात्मा बुद्ध

▸ महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनाे में हुआ था। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था।
▸ बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के शासक थे। उनकी माता का नाम महामाया था। माता की मृत्यु के बाद मौसी प्रजापति गौतमी ने उनका पालन-पोषण किया।
▸ बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा से हुआ था। यशोधरा से जन्मे उनके पुत्र का नाम राहुल था। पुत्र जन्म के कुछ समय पश्चात् ही 29 वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) कर दिया। गृह त्यागने के बाद सर्वप्रथम महात्मा बुद्ध आलार कलाम के शिष्य बनें।
फल्गु (निरंजना) नदी के तट पर उरूवेला (बोधगया) नामक स्थान पर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति (सम्बोधि) हुई‚ जिसके बाद वे ‘बुद्ध’ कहलाए।
▸ महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया‚ जो धर्मचक्रप्रवर्तन कहलाता है।
▸ 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनारा (कुशीनगर) में महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।
▸ बिम्बिसार‚ प्रसेनजित अजातशत्रु‚ जीवक‚ अनाथपिण्डक‚ क्षेमा आम्रपाली आदि समकालीन महत्त्वपूर्ण लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।

बौद्ध दर्शन तथा सिद्धान्त

▸ बौद्ध धर्म के सिद्धान्त ‘चार आर्यसत्य’ पर आधारित हैं— दुख है‚ दुख का कारण है‚ दुख का निदान है और दुख: निदान के उपाय हैं। इन उपायों को अष्टांगिक मार्ग के रूप में देखा गया‚ जो निम्न हैं
1. सम्यक् दृष्टि
2. सम्यक् संकल्प
3. सम्यक् वाणी
4. सम्यक् कर्म
5. सम्यक् आजीव
6. सम्यक् व्यायाम
7. सम्यक् स्मृति
8. सम्यक् समाधि
▸ बौद्ध धर्म में ईश्वर को नहीं माना गया है। नैतिकता पर बल दिया गया है।
▸ महात्मा बुद्ध ने कर्म के सिद्धान्त पर बल दिया तथा सत्य और अहिंसा को प्रमुखता दी। निर्वाण (मोक्ष) को अन्तिम लक्ष्य स्वीकार किया गया।
▸ बौद्ध धर्म में वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार किया गया है।
▸ बौद्ध धर्म मूलत: अनीश्वरवादी है। बुद्ध ने आत्मा की परिकल्पना को भी अस्वीकार किया।

बौद्ध संघ

▸ बौद्ध भिक्षुओं के मार्गदर्शन के लिए महात्मा बुद्ध ने बौद्ध संघ की स्थापना की।
▸ बौद्ध संघ में भिक्षुओं के प्रवेश को उपसम्पदा कहा जाता था। गृहस्थ जीवन में रहकर बौद्ध धर्म को मानने वाले ‘उपासक’ कहलाते थे।
▸ पहले बौद्ध संघ में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया गया था‚ किन्तु आनन्द के कहने पर महिलाओं के लिए अलग से बौद्ध संघ की स्थापना की गई थी।

बौद्ध संगीतियाँ

संगीति समय स्थान शासक अध्यक्ष
प्रथम बौद्ध संगीति 483 ई.पू. राजगृह अजातशत्रु महाकस्सप
द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. वैशाली कालाशोक साबकमीर (सर्वकामिनी)
तृतीय बौद्ध संगीति 250 ई.पू. पाटलिपुत्र अशोक मोग्गलिपुत्त तिस्स
चतुर्थ बौद्ध संगीति प्रथम सदी ई. कुण्डलवन (कश्मीर) कनिष्क वसुमित्र

बौद्ध ग्रन्थ

▸ अधिकांश बौद्ध ग्रन्थों की रचना पालि भाषा में हुई है। बौद्ध ग्रन्थों में सबसे महत्त्वपूर्ण त्रिपिटक हैं। सुत्त‚ विनय तथा अभिधम्म पिटक में बौद्ध धर्म की सम्पूर्ण प्रवृत्तियाँ अन्तर्निहित हैं।
दीपवंश तथा महावंश अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं‚ जिसमें बौद्ध दर्शन तथा सिद्धान्तों की चर्चा मिलती है।

त्रिपिटक

सुत्तपिटक इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का उल्लेख है।
विनयपिटक इसमें बौद्ध संघ के नियमों की व्याख्या की गई है।
अभिधम्मपिटक इसमें बौद्ध दर्शन पर प्रकाश डाला गया है।

बौद्ध सम्प्रदाय

▸ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म कई सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। इसमें प्रमुख हैं—हीनयान तथा महायान। यह विभाजन चौथी बौद्ध संगीति में हुआ।
हीनयान महात्मा बुद्ध के दर्शन तथा सिद्धान्तों में विश्वास करने वाला सम्प्रदाय था‚ जबकि महायान सम्प्रदाय को मानने वाले बुद्ध के साथ बोधिसत्वों के जीवन तथा सिद्धान्तों में भी विश्वास रखते थे।
▸ आगे बौद्ध धर्म में तान्त्रिक विचारधारा भी प्राबल्य हुई जिसके प्रभाव में ‘वज्रयान’ सम्प्रदाय अस्तित्व में आया।

बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित प्रतीक

जन्म कमल‚ सांड मृत्यु स्तूप
गृहत्याग घोड़ा ज्ञान पीपल (बोधिवृक्ष)
निर्वाण पदचिह्न

महत्वपूर्ण तथ्य

▸ बोरोबुदूर का बौद्ध स्तूप जो विश्व का सबसे विशाल तथा अपने प्रकार का एकमात्र स्तूप‚ का निर्माण शैलेन्द्र राजाओं ने मध्य जावा इण्डोनेशिया में कराया था।
▸ महात्मा बुद्ध से जुड़े आठ स्थान लुम्बिनी‚ गया‚ सारनाथ‚ कुशीनगर‚ श्रावस्ती‚ संकास्य‚ राजगृह तथा वैशाली को बौद्ध ग्रन्थों में अष्टमहास्थान नाम से जाना गया है।
▸ बुद्ध के घोड़े का नाम कंथक तथा सारथी का नाम छन्न था।
▸ बुद्ध के प्रारम्भिक गुरु आलार कलाम एवं रुद्रक रामपुत्र थे।
▸ प्रथम बौद्ध संगीति में सुतपिटक (आनन्द द्वारा) तथा विनयपिटक (उपालि) बौद्ध ग्रन्थ का संकलन हुआ।
▸ द्वितीय बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म का महासंधिक तथा स्थाविरवाद में विभाजन हुआ।
▸ चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म का हीनयान तथा महायान दो सम्प्रदायों में विभाजन हुआ।

जैन एवं बौद्ध धर्म में समानता तथा असमानता

समानता असामनता
1. दोनों धर्मों में यज्ञीय कर्मकांडों, जाति-पाँत एवं छुआ-छूत का विरोध किया गया है। 1. अहिंसा में दोनों धर्म विश्वास करते थे, पर जैन धर्म इस पर अधिक बल देता था।
2. दोनों ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। 2. जैन धर्म में मोक्ष या निर्वाण प्राप्त करना शरीर त्यागने के बाद ही सम्भव था, पर बौद्ध धर्म में निर्वाण प्राप्ति के लिए शरीर त्यागने की आवश्यकता नहीं थी।
3. दोनों ने उपेदश के लिए जनसाधारण की भाषा प्राकृत एवं पाली का प्रयोग किया। 3. जैन धर्म के उपासक ‘कायाक्लेश’ के मार्ग को अपनाकर कठोर व्रत का पालन करते थे जबकि बौद्ध ध र्म में मध्यम मार्ग अपनाने की बात कही गयी है।
4. दोनों के प्रवर्त्तक क्षत्रिय कुल के थे। 4. जैन धर्म भारत के बाहर नहीं फैल सका पर बौद्ध ध र्म का विश्व के कई देशों में प्रसार हुआ।
5. दोनों धर्मों में मूर्तिपूजा का प्रचलन था पर जैन मतावलंबी महावीर की नग्न मूर्ति की पूजा करते थे।

धार्मिक सम्प्रदाय

▸ बौद्ध तथा जैन धर्म के समानान्तर कई अक्रियावादी सम्प्रदाय भी अस्तित्व में थे‚ जिनमें आजीवक सम्प्रदाय प्रमुख था।

सम्प्रदाय संस्थापक
आजीवक मक्खलिपुत्त गोशाल
घोर अक्रियावादी पूरण कश्यप
भौतिकवादी अजित केशकम्बलिन
अनिश्चयवादी संजय वेटि्ठलपुत्त
नियतिवादी पकुध कच्चायन

▸ भागवत तथा शैव सम्प्रदाय भी इसी समय अस्तित्व में आया था। विष्णु तथा उसके अवतार भागवत सम्प्रदाय के दर्शन तथा सिद्धान्तों के केन्द्र में थे। भगवद्गीता भागवत सम्प्रदाय का श्रेष्ठ धार्मिक ग्रन्थ है।

शैव धर्म

▸ लिंग पूजा का प्रथम स्पष्ट उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी लिंगोपासना का उल्लेख है।
▸ शिव की प्राचीनतम मूर्ति गुडीमल्लम लिंग आन्ध्र प्रदेश के ‘रेनुगुंटा’ से मिली है। शैव सम्प्रदायों का प्रथम उल्लेख पतंजलि के ‘महाभाष्य’ में शिव भागवत नाम से हुआ।
▸ वामन पुराण में शैव सम्प्रदाय की संख्या चार बताई गई है‚ ये हैं
1. शैव
2. पाशुपत
3. कापालिक
4. कालामुख
पाशुपत शैव मत का सबसे पुराना सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के संस्थापक लकुलीश या नकुलीश थे।
▸ कापालिकों के इष्टदेव भैरव थे‚ जो शंकर का अवतार माने जाते थे।
▸ कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिव एवं नन्दी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।
▸ ऐलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर का निर्माण राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने कराया था।
▸ कश्मीरी शैव शुद्ध रूप से दार्शनिक तथा ज्ञानमार्गी था। इसके संस्थापक वसुगुप्त थे।
▸ दक्षिण भारत में भी शैव धर्म का विस्तार हुआ। इस धर्म के उपासक दक्षिण में लिंगायत या जंगम कहे जाते हैं।
▸ दक्षिण व उत्तर भारत में शैव धर्म का प्रचार आडियार संतों द्वारा किया गया‚ ये संख्या में 63 थे। नम्बि अण्डाल नम्बि एक प्रमुख अडयार संत थे।

वैष्णव धर्म

▸ इस धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण थे‚ जो वृष्णिवंशीय यादव कुल के नेता थे।
छान्द्ोग्य उपनिषद में श्रीकृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है। उसमें कृष्ण को देवकी-पुत्र व ऋषि घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया।
▸ भागवत धर्म का सिद्धान्त भगवद्गीता में निहित है। भागवत सम्प्रदाय के मुख्य तत्त्व भक्ति और अहिंसा हैं। भगवद्गीता में प्रतिपादित अवतार सिद्धान्त भागवत धर्म की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।
▸ मत्स्य पुराण में विष्णु के दस अवतारों का उल्लेख है।
▸ ‘नारायण’ का प्रथम उल्लेख ‘शतपथ ब्राह्मण’ में मिलता है।
▸ मेगस्थनीज ने कृष्ण को हेराक्लीज कहा।
▸ भागवत सम्प्रदाय के प्रमुख देवता संकर्षण‚ वासुदेव‚ प्रद्युम्न‚ साम्ब‚ अनिरुद्ध हैं।

भागवत सम्प्रदाय के नायक
▸ वासुदेव, साम्ब, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध

शाक्त धर्म

▸ शक्ति (शाक्त) सम्प्रदाय का शैव मत के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। शक्ति सम्प्रदाय या देवी की पूजा का उल्लेख महाभारत में प्राप्त होता है।
▸ ऋग्वेद के दशम मण्डल में एक पूरा सूक्त ही शक्ति की उपासना में विवृत है‚ जिसे ‘तान्त्रिक देवी सूक्त’ कहते हैं।
▸ शाक्तों के दो वर्ग हैं—कौलमार्गी एवं समयाचारी।
▸ कौलमार्गी पंचमकार की उपासना करते हैं‚ जिसमें मद्य‚ मांस‚ मत्स्य‚ मुद्रा और मैथुन है‚ जो ‘म’ से प्रारम्भ होते हैं।

ईसाई धर्म

▸ ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह थे‚ जिनका जन्म जेरूसलम के निकट बैथलेहम नामक स्थान पर हुआ था। इनकी माता का नाम मेरी और पिता का नाम जोसेफ था।
▸ ईसा मसीह के प्रथम दो शिष्य−एंड्रूस व पीटर थे। इन्हें 33 ई. में रोमन गवर्नर पोन्टियस ने सूली पर चढ़ाया। ईसाई धर्म का प्रमुख ग्रन्थ बाइबिल तथा सबसे पवित्र चिह्न क्रॉस है। ईसा मसीह के जन्म दिवस को क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है।

पारसी धर्म

▸ पारसी धर्म के पैगम्बर जरथ्रुस्ट (ईरानी) थे। इनकी शिक्षाओं का संकलन जेन्द अवेस्ता नामक ग्रंथ में है‚ जो पारसियों का धार्मिक ग्रन्थ है। पारसी धर्म के अनुयायी एक ईश्वर ‘अहुर’ को मानते हैं तथा इनके अनुयायियों को ‘अग्नि-पूजक’ भी कहा जाता है।

महाजनपद काल

▸ छठी शताब्दी ई.पू. में 16 महाजनपदों का उदय हुआ‚ जिसमें मगध सर्वाधिक शक्तिशाली महाजनपद था। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में पहली बार 16 महाजनपदों की चर्चा मिलती है।
▸ इन महाजनपदों में एकमात्र अश्मक (नर्मदा के दक्षिण) दक्षिण भारत में था‚ जहाँ इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने शासन किया।
▸ जैन ग्रन्थ ‘भगवती सुत्त’ में भी 16 महाजनपदों की चर्चा है। इसमें वज्जि संघ पर मगध के आक्रमण का वर्णन भी मिलता है।
▸ महाजनपद काल में 10 गणतन्त्र भी विद्यमान थे‚ जिनमें लिच्छवि (वैशाली)‚ शाक्य (कपिलवस्तु)‚ भग्ग (सुमसुमागिरि) इत्यादि प्रमुख थे।
▸ विश्व का पहला गंणतंत्र लिच्छवि (वैशाली) गणराज्य में ही स्थापित था।

महाजनपद एवं उनकी राजधानी

क्र. सं. महाजनपद राजधानी क्षेत्र (आधुनिक स्थान)
1 अंग चंपा भागलपुर, मुंगेर (बिहार)
2 मगध गिरिब्रज/राजगृह पटना, गया (बिहार)
3 काशी वाराणसी वाराणसी के आस-पास (उत्तरप्रदेश)
4 वत्स कौशम्बी इलाहाबाद के आस-पास (उत्तरप्रदेश)
5 वज्जि वैशाली/विदेह/ मिथिला मुजफ्फरपुर एवं दरभंगा के आप-पास का क्षेत्र
6 कोशल श्रावस्ती फैजाबाद (उत्तरप्रदेश)
7 अवन्ति उज्जैन/महिष्मती मालवा (मध्यप्रदेश)
8 मल्ल कुशावती देवरिया (उत्तरप्रदेश)
9 पंचाल अहिच्छत्र, काम्पिल्य बरेली, बदायूँ, फर्रूखाबाद (उत्तरप्रदेश)
10 चेदि शक्तिमती बुंदेलखण्ड (उत्तरप्रदेश)
11 कुरू इन्द्रप्रस्थ आधुनिक दिल्ली, मेरठ एवं हरियाणा के कुछ क्षेत्र
12 मत्स्य विराटनगर जयपुर (राजस्थान) के आस-पास के क्षेत्र
13 कम्बोज हाटक राजोरी एवं हजारा क्षेत्र (उत्तरापथ, पाकिस्तान)
14 शूरसेन मथुरा मथुरा (उत्तरप्रदेश)
15 अश्मक पोटली/पोतन गोदावरी नदी क्षेत्र
16 गान्धार तक्षशिला रावलपिंडी एवं पेशावर (पाकिस्तान)

मगध साम्राज्य

▸ महाजनपदों के काल में मगध ने अपनी शक्ति का विस्तार किया तथा धीरे-धीरे सम्पूर्ण उत्तर भारत को अपने आधिपत्य में ले लिया।
▸ मगध पर शासन करने वाला पहला शासकीय वंश हर्यंक वंश था। इसके बाद शिशुनाग तथा नन्द वंश ने शासन किया। नन्दों को समाप्त कर मौर्य वंश ने शासन आरम्भ किया।

हर्यंक वंश

बिम्बिसार हर्यंक वंश का पहला साम्राज्यवादी शासक था। बौद्ध ग्रन्थ ‘महावंश’ के अनुसार उनके पिता का नाम भटि्टय था। उसकी राजधानी राजगृह (गिरिव्रज) थी।
▸ बिम्बिसार का शासनकाल 544-493 ई.पू. माना गया है। उसने 52 वर्षों तक शासन किया।
▸ बिम्बिसार ने अपनी शक्ति तथा राज्य विस्तार के लिए वैवाहिक सम्बन्धों की नीति को अपनाया। मद्र‚ कोसल‚ लिच्छवि तथा गान्धार से उसने विवाह सम्बन्ध स्थापित किए। वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था। जीवक उसका राजवैद्य था।
▸ 493 ई.पू. में अजातशत्रु (कुणिक) ने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर सिंहासन प्राप्त किया।
अजातशत्रु ने राज्य विस्तार के लिए युद्ध विजय को अपनाया। वज्जि संघ पर विजय के लिए अपने मन्त्री वस्सकार की कूटनीति का प्रयोग किया।
▸ लिच्छवियों के आक्रमण से सुरक्षा हेतु अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह में सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कराया। उदायिन जैन धर्मावलम्बी था।
▸ अजातशत्रु ने रथमूसल तथा महाशिलाकण्टक जैसे हथियारों का इस्तेमाल युद्ध में किया। उसने वैशाली को मगध साम्राज्य का हिस्सा बनाया।
▸ अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र उदायिन शासक बना। उदायिन जैन धर्मावलम्बी था। उसने पाटलिपुत्र नगर (कुसुमपुरा) की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।

शिशुनाग वंश

▸ हर्यंक वंश के अन्तिम शासक नागदशक की हत्या कर 412 ई.पू. में शिशुनाग ने इस वंश की स्थापना की।
▸ शिशुनाग ने अवन्ति‚ वत्स तथा कोसल महाजनपदों को मगध में मिला लिया। शिशुनाग ने पाटलिपुत्र के अतिरिक्त वैशाली को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
▸ शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक या काकवर्ण था। उसके समय द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में हुआ था।

नन्द वंश

▸ शिशुनाग वंश के अन्तिम शासक नंदिवर्धन की हत्या कर महापद्मनन्द ने ‘नन्द वंश’ की नींव रखी। बौद्ध ग्रन्थ महाबोधिवंश में उसे उग्रसेन कहा गया है।
▸ पुराणों में महापद्मनन्द को सर्वक्षत्रान्तक‚ एकराट् कहा गया है। पुराणों में खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में उसके कलिंग विजय का उल्लेख है। उसने तत्कालीन राज्यों को जीतकर मगध को विशाल साम्राज्य में बदल दिया।
धनानन्द नन्दवंश का अन्तिम शासक था। यह सिकन्दर का समकालीन था। इसके शासनकाल में पश्चिमोत्तर भारत पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ था।
▸ धनानन्द के शासन के दौरान जनता के असन्तोष का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से मगध पर आधिपत्य कायम किया।

मगध के उत्थान के कारण

मगध 16 महाजनपदों में से एक था‚ जिसके शासकों ने सम्पूर्ण उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर साम्राज्य विस्तार कर इसे शक्ति का केन्द्र बनाया। मगध के उत्थान के निम्नलिखित कारण विद्वानों द्वारा बताए जाते हैं

भौगोलिक स्थिति
▸ गंगा तथा उसकी सहायक नदियों के मैदान में कृषि तथा वाणिज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ।
▸ गंगा‚ सोन तथा पुनपुन नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण पाटलिपुत्र एक जलदुर्ग था‚ जिसके कारण यहाँ किसी शासक का आक्रमण करना आसान नहीं था। राजगृह भी सामरिक रूप से एक सुरक्षित स्थान था।
▸ उत्तर भारत में पाटलिपुत्र व्यापार का एक केन्द्र था‚ जिससे शासकों को आर्थिक समृद्धि का मौका मिला।

सैन्य संगठन
▸ मगध साम्राज्य की राजधानी के निकट उस समय घने जंगल थे‚ जिनसे प्राप्त हाथियों का उपयोग सैन्य शक्ति को बढ़ाने में किया गया। हाथी मगध सेना की सबसे बड़ी शक्ति थी।
▸ जंगलों में अनेक लौह खदानें थीं‚ जिनसे लोहा प्राप्त किया जाता था। लोहे का उपयोग अस्त्र-शस्त्रों में किया जाता था‚ जबकि अन्य महाजनपदों में इसका अभाव था।

शासकों का योगदान
▸ साम्राज्यवादी विचार के शासकों ने राज्य विस्तार को प्रोत्साहित किया। इस समय कूटनीति तथा सैन्य शक्ति दोनों का इस्तेमाल राज्य विस्तार में किया गया।
▸ साम्राज्य विस्तार का उत्साह अन्य क्षेत्रों से अधिक था। अनार्य तत्त्वों के प्रभाव से युद्ध के लिए तैयार जनसंख्या का उपयोग शासकों ने भरपूर किया।

विदेशी आक्रमण

▸ भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण ईरान के हखामनी वंश के राजाओं ने किया था।
▸ हखामनी शासक दारा प्रथम ने ही भारत पर पहला सफल आक्रमण किया था।

सिकन्दर का आक्रमण

▸ 326 ई.पू. में सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया। वह यूनान के मकदूनिया का शासक था। सिकन्दर ने 326 ई. पू. में बल्ख (बैक्ट्रिया) को जीतने के बाद काबुल होते हुए हिन्दूकुश पर्वत को पार किया।
▸ सिकन्दर महान दार्शनिक अरस्तू का शिष्य था।
▸ सिकन्दर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर भारत में कई छोटे-छोटे राजतन्त्र तथा गणराज्य स्थित थे। इसमें पोरस सबसे अधिक शक्तिशाली था। जो आम्भी तक्षशिला का शासक था। उसने सिकन्दर से सन्धि कर ली।
▸ सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध पर नन्दवंश के शासक धनानन्द का शासन था। जनता में अलोकप्रिय होने के बावजूद उसकी सैन्य शक्ति प्रबल थी।
▸ पंजाब के शासक पोरस के साथ सिकन्दर ने हाइडेस्पीज का युद्ध (झेलम का युद्ध) लड़ा‚ जिसमें घायल होने के बाद पोरस को बन्दी बना लिया।
▸ 326 ई.पू. में व्यास नदी तक पहुँचकर सिकन्दर के सैनिकों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया।
▸ सिकन्दर को सैनिकों के निर्णय के आगे झुकना पड़ा। 323 ई.पू. में वापस यूनान जाते हुए बेबीलोन में सिकन्दर की मृत्यु हो गई।
▸ भारत के बड़े भाग पर मौर्य साम्राज्य स्थापित होने के कारण राष्ट्रीय एकता के नए युग का सूत्रपात हुआ।

सिकन्दर के आक्रमण के प्रभाव
▸ सिकन्दर के आक्रमण के बाद भारत तथा यूनान के बीच व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्ध कायम हुए।
▸ भारत में कई स्थानों पर यूनानी बस्तियाँ स्थापित हुईं तथा हिन्द-यवन राज्यों की स्थापना पश्चिमोत्तर भारत में हुई।
▸ भारतीयों को नक्षत्र शास्त्र का ज्ञान हुआ तथा भारत ने सिक्कों की ढलाई करना सीखा।
▸ भारतीय स्थापत्य तथा शिल्पकला पर यूनानी प्रभाव देखने को मिला।

मौर्य साम्राज्य

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई. पू.)

▸ चाणक्य की सहायता से अन्तिम नन्द शासक धनानन्द को अपदस्थ कर 322 ई.पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य मगध का शासक बना। उसने मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
▸ साम्राज्य विस्तार के दौरान 305 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य का संघर्ष यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर (सिकन्दर का सेनापति) से हुआ‚ जिसमें सेल्यूकस की हार हुई थी।
▸ सेल्यूकस ने 500 हाथियों के बदले एरिया (हेरात)‚ अराकोसिया (कान्धार) जेड्रोसिया एवं पेरोपनिसडाई (काबुल) के क्षेत्रों के कुछ भाग चन्द्रगुप्त को दिए। सेल्यूकस की पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ हुआ।
▸ चन्द्रगुप्त तथा सेल्यूकस के युद्ध का वर्णन एप्पियानस ने किया है।
▸ सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में अपने राजदूत मेगास्थनीज को भेजा था।
▸ मेगास्थनीज ने पाटलिपुत्र में रहते हुए इण्डिका की रचना की।
▸ स्ट्रैबो तथा जस्टिन की रचनाओं में चन्द्रगुप्त मौर्य को ‘सैण्ड्रोकोटस’ कहा गया है‚ जबकि एरियन तथा प्लूटार्क ने उसे ‘एण्ड्रोकोटस’ कहा है।
▸ विलियम जोंस ने सबसे पहले यह प्रमाणित किया कि सैण्ड्रोकोटस ही चन्द्रगुप्त मौर्य है।
▸ मुद्राराक्षस (विशाखदत्त) में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए ‘वृषल’ तथा कुलहीन शब्द का प्रयोग हुआ है।
▸ चन्दुगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र‚ मालवा‚ अवन्ति के साथ सुदूर दक्षिण भारत के कुछ हिस्से को मगध साम्राज्य में मिलाया।

चन्द्रगुप्त के सम्बन्ध में धारणा

ब्राह्मण साहित्य शूद्र बौद्ध तथा जैन साहित्य क्षत्रिय मुद्राराक्षस निम्न कुलोत्पन्न जस्टिन साधारण कुल में उत्पन्न विष्णु पुराण निम्न कुल में उत्पन्न
प्लूटार्क के अनुसार चन्द्रगुप्त ने छ: लाख सैनिक लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद डाला।
▸ तमिल ग्रन्थ अहनानूरू तथा पुरनानुरू से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया था।
▸ अपने अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त जैन संन्यासी भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) पहुँचा। उसने चन्द्रगिरि पर्वत पर ‘चन्द्रगुप्त बस्ती’ बसाई‚ जहाँ 298 ई. पू. में लम्बे उपवास के बाद उसका निधन हो गया।

चाणक्य

अर्थशास्त्र का रचनाकार कौटिल्य ही चाणक्य था। इसका अन्य नाम विष्णुगुप्त था। वह तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षक था‚ जहाँ चन्द्रगुप्त शिक्षा ग्रहण कर रहा था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को नन्द वंश की समाप्ति के लिए रणनीतिक सहायता प्रदान की तथा मौर्य वंश की स्थापना की।

बिन्दुसार (298-273 ई.पू.)

▸ चन्द्रगुप्त के पश्चात् 298 ई.पू. में बिन्दुसार शासक बना। यूनानी लेखकों ने बिन्दुसार को अमित्रोचेटस कहा। वायु पुराण में उसे भद्रसार तथा जैन ग्रन्थों में सिंहसेन कहा गया है।
▸ बिन्दुसार के शासनकाल में तक्षशिला में दो विद्रोह हुआ‚ प्रथम को अशोक ने दबाया तथा दूसरे विद्रोह को सुसीम ने दबाया।
▸ सीरिया के शासक एण्टीओकस ने डायमेकस को बिन्दुसार के दरबार में अपना राजदूत बनाया। मिस्र के शासक टालेमी II फिलाडेल्फस ने डायनिसियस को बिन्दुसार के दरबार में राजदूत नियुक्त किया था।
▸ बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय को संरक्षण देने वाला पहला मौर्य शासक था। 273 ई.पू. में उसकी मृत्यु हो गई।

अशोक (273-232 ई.पू.)

▸ सम्राट अशोक ने 273 ई. पू. में ही सिंहासन प्राप्त कर लिया था‚ परन्तु 4 साल तक गृह युद्ध में रत रहने के कारण अशोक का वास्तविक राज्याभिषेक 269 ई.पू. में हुआ।
▸ शासक बनने से पहले वह उज्जैन तथा तक्षशिला का गवर्नर था। उसने मन्त्री राधागुप्त की सहायता से गद्दी पाई थी।
▸ अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था और वह चम्पा (अंग) की राजकुमारी थी।
▸ उसने कश्मीर तथा खोतान पर अधिकार किया। कश्मीर में अशोक ने श्रीनगर की स्थापना की।
▸ राज्याभिषेक के 9वें वर्ष अर्थात् 261 ई.पू. में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण (13वें अभिलेख) किया।
▸ कलिंग के हाथीगुम्फा अभिलेख से प्रकट होता है कि सम्भवत: उस समय कलिंग पर नन्दराज नाम का कोई राजा राज्य कर रहा था।
▸ कलिंग युद्ध में व्यापक हिंसा के बाद उसने युद्ध विजय की जगह धम्म विजय को अपनाया तथा उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।
▸ बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उसने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उसने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा।
▸ अशोक ने शासन के 10वें वर्ष में बोधगया तथा 20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की। नेपाल की तराई में स्थित निगालीसागर में कनकमुनि के स्तूप को संवर्द्धित करवाया।
▸ अशोक ने ‘धम्म’ को नैतिकता से जोड़ा। इसके प्रचार-प्रसार के लिए उसने शिलालेखों को उत्कीर्ण कराया। इसकी प्रेरणा उसे ईरानी शासक दारा प्रथम से मिली।
▸ अशोक ने ‘विहार-यात्रा’ की जगह बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा अर्थात् धम्म-यात्रा को प्रेरित किया।
▸ उसने ‘धम्म’ को स्थापित करने के लिए धम्ममहामात्र (13वें वर्ष) नामक अधिकारियों की नियुक्ति की।
▸ अशोक के शिलालेख ब्राह्मी‚ ग्रीक‚ अरमाइक तथा खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं‚ जबकि सभी स्तम्भ लेख प्राकृत भाषा में हैं।
▸ शाहबाजगढ़ी तथा मानसेहरा के शिलालेख की लिपि खरोष्ठी है।
▸ तक्षशिला तथा लघमान के अभिलेख अरमाइक लिपि में उत्कीर्ण हैं। शर-ए-कुना अभिलेख द्विलिपिक है। यह अरमाइक तथा ग्रीक लिपियों में उत्कीर्ण है।
▸ सर्वप्रथम 1750 ई. में टील पैन्थर नामक विद्वान् ने अशोक की लिपि का पता लगाया था।
▸ 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के शिलालेखों (ब्राह्मी लिपि) को पढ़ने में सफलता प्राप्त की।
▸ धौली तथा जौगढ़ के शिलालेख पृथक् कलिंग लेख कहलाते हैं। इसमें सभी मनुष्यों को अपनी सन्तान बताया गया है।
▸ कौशाम्बी तथा प्रयाग के स्तम्भ लेख में अशोक की रानी कारूवाकी के दान का उल्लेख है। इसलिए इन्हें रानी का लेख भी कहते हैं (कारूवाकी तीवर की माँ थी)। अभिलेखों में केवल इसी रानी का उल्लेख है।
▸ अशोक के भाब्रू शिलालेख में धम्म का उल्लेख है।
▸ अशोक के बनाए गए स्तम्भों के मुख्य भाग हैं यष्टि यष्टि के ऊपर कमल की आकृति फलक (Abacus) पशु आकृति।
▸ बसाढ़ के स्तम्भ के ऊपर सिंह‚ संकिसा के ऊपर हाथी‚ रामपुरवा पर बैल‚ लौटिया नन्दनगढ़ पर सिंह‚ तथा साँची और सारनाथ के स्तम्भों के ऊपर एक साथ चार सिंह की आकृति मण्डित की गई है।
▸ साँची‚ सारनाथ‚ तक्षशिला स्थित धर्मराजिका स्तूप अशोक ने बनवाया। बराबर की पहाड़ियों में उसने आजीवक संन्यासियों के लिए गुफाओं-सुदामा‚ कर्ण चोपड़ व विश्व झोंपड़ी का निर्माण करवाया। अशोक ने लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया।
▸ 14 शिलालेखों के अतिरिक्त अशोक ने 13 लघु शिलालेख‚ 7 स्तम्भ अभिलेख तथा कई अन्य अभिलेखों को उत्कीर्ण करवाया।
▸ अशोक के बाद कुणाल‚ दशरथ‚ सम्प्रति शालिशूक‚ देववर्मा तथा वृहद्रथ मौर्य शासक हुए। वृहद्रथ अन्तिम मौर्य शासक था। पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की नींव रखी।

अशोक के चौदह शिलालेख

पहला शिलालेख पशुबलि की निंदा की गई है।

दूसरा शिलालेख अशोक ने मनुष्य एवं पशु दोनों की चिकित्सा-व्यवस्था का उल्लेख किया है। चोल‚ चेर‚ पाण्ड्य‚ ताम्रपर्णि‚ केरलपुत्त‚ सतियपुत्त राज्यों का उल्लेख है।

तीसरा शिलालेख राजकीय अधिकारियों को यह आदेश दिया गया है कि वे हर पाँचवें वर्ष के उपरान्त दौरे पर जाएँ। इस शिलालेख में कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख किया गया है।

चौथा शिलालेख भेरीघोष की जगह धम्मघोष की घोषणा की गई है।

पाँचवाँ शिलालेख धर्म-महामात्रों की नियुक्ति के विषय में जानकारी मिलती है।

छठा शिलालेख आत्म-नियन्त्रण की शिक्षा दी गई है। प्रजा सदैव राजा से मिल सकती है।

सातवाँ शिलालेख सभी सम्प्रदायों के लिए सहिष्णुता की बात कही गई है।

आठवाँ शिलालेख अशोक की धम्म यात्राओं का उल्लेख किया गया है।

नौवाँ शिलालेख विभिन्न प्रकार के समारोहों की निन्दा‚ किन्तु सच्चे शिष्टाचार का उल्लेख है।

दसवाँ शिलालेख ख्याति एवं गौरव की निन्दा

ग्यारहवाँ शिलालेख धम्म की व्याख्या की गई है।

बारहवाँ शिलालेख स्त्री महामात्रों की नियुक्ति एवं सभी प्रकार के विचारों के सम्मान की बात कही गई है।

तेरहवाँ शिलालेख कलिंग युद्ध का वर्णन एवं अशोक के हृदय-परिवर्तन की बात कही गई है। इसी में पड़ोसी राजाओं का वर्णन मिलता है।

चौदहवाँ शिलालेख अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया।

मौर्य प्रशासन

▸ कौटिल्य ने राज्य के सप्तांग सिद्धान्त के सात अंग निर्दिष्ट किए हैं—राज्य‚ राजा‚ मन्त्री‚ मित्र‚ कर/कोष‚ सेना तथा दुर्ग।
▸ कौटिल्य के अनुसार शासक को परामर्श देने के लिए दो सभाएँ थीं—मन्त्रिसभा तथा मन्त्रिपरिषद्।
▸ मन्त्रिसभा में सदस्यों की संख्या 3 से 12 तक होती थी‚ जबकि मन्त्रिपरिषद् में सदस्यों की संख्या 12, 16 या 20 होती थी।
▸ मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों के चुनाव में उनके चरित्र की भलीभाँति जाँच की जाती थी‚ जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।
▸ मौर्य प्रशासन के शीर्षस्थ अधिकारियों को तीर्थ कहा जाता था। तीर्थों की संख्या 18 थी।
▸ विभिन्न विभागों के प्रमुख को ‘अध्यक्ष’ कहा जाता था। अर्थशास्त्र में 26 अध्यक्षों की चर्चा मिलती है।
▸ अध्यक्षों के अधीन युक्त तथा उपयुक्त नामक कर्मचारी होते थे। अशोक के समय मौर्य प्रान्तों की संख्या 5 थी। प्रान्तों का प्रशासक कुमारामात्य अथवा आर्यपुत्र कहलाता था।

मौर्य प्रान्त

▸ कुमारामात्य की सहायता के लिए युक्त‚ राजुक‚ प्रादेशिक इत्यादि अधिकारी नियुक्त होते थे।

प्रान्त राजधानी प्रान्त राजधानी
उत्तरापथ तक्षशिला दक्षिणापथ सुवर्णगिरि
अवन्ती उज्जयिनी प्राची (पूर्वी) पाटलिपुत्र
कलिंग तोसलि

मौर्य प्रशासन का स्तरीय खण्ड

▸ साम्राज्य
▸ प्रान्त
▸ आहार या विषय
▸ स्थानीय- 800 ग्रामों का समूह
▸ द्रोणमुख- 400 ग्रामों का समूह
▸ ख्रार्वटिक- 200 ग्रामों का समूह
▸ संग्रहण- 100 ग्रामों का समूह
▸ ग्राम- प्रशासन की सबसे छोटी इकाई
प्रादेशिक मण्डल का अधिकारी था।
युक्त राजस्व अधिकारी था।
स्थानिक जिलों का अधिकारी तथा गोप एवं ग्रामिक ग्रामीण प्रशासन से जुड़े थे।

नगरीय समिति एवं कार्य

प्रथम उद्योग शिल्पों का निरीक्षण
द्वितीय विदेशियों की देख-रेख
तृतीय जन्म-मरण का लेखा-जोखा
चतुर्थ व्यापार/वाणिज्य
पंचम निर्मित वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण
छठी ब्रिकीकर वसूल करना

▸ मेगास्थनीज ने नगर प्रशासन का वर्णन इण्डिका में किया है। इसके अनुसार नगर का प्रशासन तीस सदस्यों का एक मण्डल करता था‚ जो 6 समितियों में विभक्त था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
▸ नगरों में दो प्रकार की समितियाँ थीं—सैन्य तथा सामान्य प्रशासन।
▸ एग्रोनोमई मार्ग निर्माण का अधिकारी था।
▸ ‘संस्था’ तथा ‘संचरा’ (संचार) गुप्तचर-व्यवस्था के अंग थे।
▸ संस्था संगठित होकर कार्य करते थे‚ जबकि संचरा
स्ट्रैबो ने गुप्तचरों को निरीक्षक तथा ओवरसियर्स कहा है। अर्थशास्त्र में इन्हें गूढ़ पुरुष कहा गया है।
▸ ‘कण्टकशोधन’ (फौजदारी) तथा ‘धर्मस्थीय’ (दीवानी) न्यायालय थे। कण्टकशोधन का अधिकारी प्रदेष्टा कहलाता था। नगर व्यावहारिक न्यायाधीश होते थे। राजुक जनपदीय न्यायालय के न्यायाधीश था। जमीन की पैमाइश भी देखते थे।
▸ राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। यह कुल उपज का 1/6 भाग (हिस्सा) किया जाता था। भूमिकर को भाग कहा जाता था। विष्टि एक प्रकार का बेगार कर था। बिना वर्षा के अच्छी खेती वाली भूमि अदेवमातृक थी‚ जबकि बलि एक धार्मिक कर था।
▸ व्यापार की देख-रेख करने वाला अधिकारी पण्याध्यक्ष कहलाता था। राजकीय भूमि की देखभाल करने वाला सीताध्यक्ष कहलाता था।
▸ उदकभाग मौर्यकाल में वसूल किया जाने वाला सिंचाई कर था।
एरियन हमें बताता है कि भारतीय व्यापारी मुक्ता बेचने के लिए यूनान के बाजारों में जाते थे।
अशोक ने तोसली‚ उज्जैन और तक्षशिला के अधिकारियों के चक्रवत स्थानान्तरण की परिपाटी चलाई।
वस्त्र उद्योग मौर्य काल का महत्त्वपूर्ण उद्योग था‚ किन्तु वह राज्य द्वारा संचालित किया जाता था।
▸ राजकीय टकसाल के अधिकारी को ‘लक्षणाध्यक्ष’ कहा जाता था। मुद्राओं के परीक्षण का अधिकारी रूपदर्शक था।
▸ मौर्य सेना छ: भाग में विभाजित थी— नौसेना‚ यातायात‚ पैदल सेना‚ घुड़सवार सेना‚ रथ सेना तथा गज सेना।
▸ युद्धक्षेत्र में सेना का संचालन करने वाला नायक किया जाता था। नवाध्यक्ष युद्धपोतों के अतिरिक्त व्यापारिक पोतों का अध्यक्ष किया जाता था। अन्तपाल दुर्गों के अध्यक्ष होते थे।
▸ मौर्य काल में सर्वोच्च अधिकारियों को 48 हजार पण वार्षिक तथा सबसे निचले दर्जे के अधिकारियों को कुल मिलाकर 60 पण मिलते थे।
▸ समाज में वेश्यावृत्ति की प्रथा प्रचलित थी तथा इसे राजकीय संरक्षण प्राप्त था। स्वतन्त्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियाँ रूपाजीवा कहलाती थीं।
▸ मौर्य काल में प्रवहण एक प्रकार के सामूहिक समारोह थे‚ जिनमें भोज्य और पेय पदार्थों का प्रचुरता से उपयोग किया जाता था।
▸ नगर में अनुशासन रखने तथा अपराधी मनोवृत्ति के दमन करने हेतु पुलिस व्यवस्था थी। इन्हें रक्षिण कहा जाता था।
▸ मौर्य राजप्रासाद के चारों ओर लकड़ी की दीवार थी‚ जिसमें 64 द्वार तथा 570 बुर्ज थे।
▸ बुलन्दीबाग से नगर के परकोटे तथा कुम्राहार से राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

1 मन्त्री प्रधानमन्त्री
2 पुरोहित धर्म एवं दान-विभाग का प्रधान
3 सेनापति सैन्य विभाग का प्रधान
4 युवराज राजपुत्र
5 दौवारिक राजकीय द्वार-रक्षक
6 अन्तर्वेदिक अन्त:पुर का अध्यक्ष
7 समाहर्ता आय का संग्रहकर्ता
8 सन्निधाता राजकीय कोष का अध्यक्ष
9 प्रशास्ता कारागार का अध्यक्ष
10 प्रदेष्ट्रि कमिश्नर
11 पौर नगर का कोतवाल
12 व्यावहारिक प्रमुख न्यायाधीश
13 नायक नगर-रक्ष का अध्यक्ष
14 कर्मान्तिक उद्योगों एवं कारखानों का अध्यक्ष
15 मन्त्रिपरिषद् अध्यक्ष
16 दण्डपाल सेना का सामान एकत्र करने वाला
17 दुर्गपाल दुर्ग-रक्षक
18 अंतपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक

मौर्य साम्राज्य: पतन के कारण

▸ अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी
▸ प्रशासन का अतिशय केन्द्रीकरण
▸ राष्ट्रीय चेतना का अभाव
▸ आर्थिक तथा सांस्कृतिक असमानताएँ
▸ प्रान्तीय शासकों का अत्याचार
▸ करों की अधिकता
▸ अशोक की अहिंसा की नीति

मौर्यकालीन महत्त्वपूर्ण शब्दावली

जेट्ठक शिल्पी संघ का मुखिया
भोगागम जेट्ठकों के निर्वाह के लिए राजा की ओर से मिलने वाला गाँव का राजस्व
गहपति भूस्वामी
कार्षापण चाँदी एवं ताँबे का एक टुकड़ा/एक सिक्का
अदेवमातृक बिना वर्षा के ही अच्छी खेती वाली भूमि
सीता सरकारी जमीन
विष्टि नि:शुल्क श्रम, बेगार
बलि एक प्रकार का धार्मिक कर या चढ़ावा
भाग भूमि कर में राजा का हिस्सा
क्षेत्रक भूमि का मालिक
उपवास जमीन पर खेती करने वाला काश्तकार
हिरण्य नकद लिया जाने वाला कर
वार्ता कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य के लिए संयुक्त रूप से प्रयुक्त शब्द

मौर्योत्तर काल

▸ मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ राजनीतिक एकता नष्ट होने लगी। इस दौर में कई शासक वर्गों का उदय हुआ तथा देश के उत्तर-पश्चिमी सीमा पर फिर से विदेशी शासक वर्ग-यूनानी‚ शक‚ कुषाण इत्यादि का आक्रमण आरम्भ हो गया।
▸ मौर्योत्तर काल में कई विशिष्ट शासकों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर शासन किया‚ जिसमें पुष्यमित्र शुंग‚ खारवेल‚ गौतमीपुत्र शातकर्णी तथा कनिष्क प्रमुख थे।
▸ मौर्योत्तर काल में कला तथा संस्कृति का भी अत्यधिक विकास हुआ। मूर्तिकला की गान्धार‚ मथुरा तथा अमरावती शैली पनपी। संस्कृत साहित्यों की रचना भी हुई। स्मृति तथा पुराणों की रचनाएँ भी प्रारम्भ हुईं।

शुंग वंश (185-75 ई. पू.)

▸ पुष्यमित्र शुंग एक मौर्य सेनापति था‚ जिसने अन्तिम मौर्य शासक वृहद्रथ की हत्या कर 185 ई. पू. में शुंग वंश की स्थापना की। पुष्यमित्र शुंग ने पाटलिपुत्र के स्थान पर उज्जयिनी (विदिशा) को अपनी राजधानी बनाया।
▸ पुष्यमित्र ब्राह्मण धर्म का समर्थक था। उसने अपने पुरोहित पतंजलि की सहायता से दो बार अश्वमेघ यज्ञ किया।
▸ मंजूश्रीमूलकल्प तथा दिव्यावदान जैसे बौद्ध ग्रन्थों में उसे पाटलिपुत्र के कुक्कटाराम विहार‚ स्तूपों को नष्ट करने वाला बताया गया है।
▸ पुष्यमित्र शुंग का उत्तराधिकारी अग्निमित्र था। कालिदास की रचना मालविकाग्निमित्रम् अग्निमित्र शुंग के जीवन पर आधारित नाट्य रचना है। अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने इण्डो यूनानी शासक मिनाण्डर को पराजित किया।
▸ शुंग वंश का अन्तिम शासक देवभूति था‚ जिसकी हत्या कर उसके सेनापति वसुदेव ने कण्व वंश की स्थापना की।
▸ शुंग वंश के शासन काल में मनुस्मृति‚ विष्णु स्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति ग्रन्थों की रचना हुई। इसी समय पतंजलि ने अष्टाध्यायी पर टीका महाभाष्यम लिखी।
▸ भरहुत में बौद्ध स्तूप‚ साँची स्तूप का प्रवेश द्वार तथा बोधगया का स्तूप के चारों ओर पत्थर की वेदिका शुंग वंश के शासनकाल में बनाया गया था। इसी समय तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने बेसनगर में गरुड़ स्तम्भ का निर्माण करवाया था।
▸ मथुरा के मोर स्थान से संकर्षण‚ वासुदेव‚ प्रद्युम्न‚ शाम्ब तथा अनिरुद्ध की प्रतिमा स्थापित करने का उल्लेख है।

कण्व वंश (75-30 ई. पू.)

▸ 75 ई. पू. में वसुदेव ने कण्व वंश के प्रथम शासक के रूप में शासन प्रारम्भ किया। इस वंश के चार शासक-वसुदेव‚ भूमिमित्र‚ नारायण तथा सुसर्मन हुए। कण्व वंश के अन्तिम शासक सुसर्मन को सातवाहन शासक सिमुक ने पराजित किया।
▸ अन्तिम कण्व शासक सुसर्मन की हत्या 30 ई. पू. में सिमूक ने कर दी और आन्ध्र सातवाहन वंश की नींव रखी।

हिन्द-यवन

▸ सेल्युकस द्वारा स्थापित पश्चिमी तथा मध्य एशिया के विशाल साम्राज्य को ऐण्टिओकस I ने अक्षुण्ण रखा किन्तु ऐण्टिओकस II के समय में अनेक प्रान्त स्वतन्त्र हो गए।
▸ इन्हीं में से बैक्ट्रिया के शासक डेमेट्रियस ने भारत पर 190 ई.पू. में आक्रमण कर अफगानिस्तान‚ पंजाब‚ सिंध के बड़े भूभाग पर अधिकार कर शाकल को अपनी राजधानी बनाया। इसे ही हिन्द-यूनानी राज्य कहा जाने लगा।
▸ इन्हीं हिन्द-यूनानी शासकों में मिनाण्डर का नाम उल्लेखनीय है‚ जिसने नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली‚ जो मिलिन्दपन्हो ग्रंथ में संकलित है।
▸ भारत में सबसे पहले हिन्द-यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए।

गार्गी संहिता

गार्गी संहिता एक ज्योतिष ग्रन्थ है‚ जिसकी रचना कात्यायन ने की थी। इस रचना में यवन आक्रमण का उल्लेख है। इसमें बताया गया है कि यवन आक्रान्ता साकेत‚ पंचाल तथा मथुरा को जीतते हुए कुसुम ध्वज (पाटलिपुत्र) तक पहुँच गए।

शक/पहलव

शक मूलत: सीरदरया (Jaxartes) के उत्तर में निवास करने वाली एक खानाबदोश तथा बर्बर जाति थी। 140 ई.पू. में शकों ने बैक्ट्रिया तथा पार्थिया पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे पश्चिमी प्रदेशों से यवनों को समाप्त कर तक्षशिला‚ मथुरा‚ महाराष्ट्र उज्जयिनी में शकों की भिन्न-भिन्न शाखाएँ स्थापित की गई।
▸ तक्षशिला का पहला शक शासक मेउस था। गान्धार तथा पंजाब का पश्चिमी हिस्सा उसके अधिकार में था।
▸ मेउस का उत्तराधिकारी एजेज था‚ जिसने सम्पूर्ण पंजाब पर शासन किया। शक शासन क्षत्रपों में विभाजित था। इसका एक क्षत्रप गुजरात में स्थित था।
▸ शकों की एक शाखा गुजरात में शासन कर रही थी‚ जिसमें रुद्रदामन एक प्रमुख शासक था। जूनागढ़ से प्राप्त 150 ई. का उसका अभिलेख संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण पहला अभिलेख है‚ जिसमें सुदर्शन झील के पुनरुद्धार का वर्णन मिलता है।
▸ पह्लवों का प्रसिद्ध शासक गोन्दोफर्निस था। पहलवों ने तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया था।
▸ गोन्दोफर्निस के शासन काल में सेंट थॉमस ईसाई धर्म का प्रचार करने भारत आया था।
▸ पह्लवों की शक्ति को समाप्त कर कुषाण वंश ने पश्चिमोत्तर भारत पर शासन आरम्भ किया।

कुषाण वंश

▸ पहलव के बाद कुषाण भारत आये जो यू-ची कबीले से सम्बन्धित थे।
कुजुल कडफिसेस ने 15 ई. में कुषाण वंश की स्थापना की। उसका उत्तराधिकारी विम कडफिसेस था।
▸ विम कडफिसेस उत्तर भारत के वृहद् क्षेत्र को कुषाणों के अन्तर्गत लाया। वह शैव था। उसने महेश्वर उपाधि धारण की। भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के विम कडफिसेस ने चलाए।
▸ कनिष्क 78 ई. में भारत का शासक बना। वह बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का अनुयायी था। उसने पुरुषपुर को अपनी राजधानी बनाया तथा राज्यारोहण के वर्ष से शक संवत् का आरम्भ किया।
▸ कनिष्क की प्रथम राजधानी पेशावर (पुरुषपुर) एवं दूसरी राजधानी मथुरा थी। कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर वहाँ कनिष्कपुर नामक नगर बसाया।
▸ कनिष्क ने बौद्ध धर्म‚ संस्कृत भाषा तथा भारतीय कला संस्कृति को अत्यधिक प्रोत्साहित किया। उसके दरबार में नागार्जुन‚ चरक‚ अश्वघोष‚ वसुमित्र जैसे विद्वान् रहते थे। अन्य विद्वानों में पार्श्व‚ संघरक्ष‚ मातृचेट प्रमुख थे।
▸ कनिष्क के शासनकाल में चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर के कुण्डलवन में आयोजित की गई‚ जिसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की तथा उपाध्यक्ष अश्वघोष थे।
▸ कनिष्क ने महाराज‚ राजाधिराज तथा देवपुत्र की उपाधियाँ धारण की थीं।
▸ कनिष्क के बाद वशिष्क‚ हुविष्क‚ कनिष्क II तथा वासुदेव शासक हुए।
▸ कनिष्क के उत्तराधिकारी हुविष्क (106-138 ई.) के समय में कुषाण शक्ति का प्रमुख केन्द्र पेशावर से हटकर मथुरा बन गया था। वह वैष्णव था।
▸ कनिष्क के कुल का अन्तिम महान् शासक वासुदेव था। उसके सिक्कों पर शिव की आकृति मिली है‚ जिससे उसके यूनानी सम्पर्क से दूर होने की पुष्टि होती है।
▸ इस समय भारत से रोमन साम्राज्य को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में कालीमिर्च‚ रेशम‚ मलमल‚ सूती वस्त्र‚ रत्न आदि का उल्लेख है। बदले में रोम से भारत आने वाले सोने की मात्रा पर ग्रीक इतिहासकार प्लिनी ने दु:ख व्यक्त किया है।
▸ पश्चिमी तट पर बैरीगाजा (भड़ौच) अथवा मरुकच्छ प्रमुख बन्दरगाह था।
▸ इसी काल में पक्की ईंटों का प्रयोग आरम्भ हुआ।
▸ कुषाण साम्राज्य में गान्धार तथा मथुरा कला को अत्यधिक संरक्षण मिला।
▸ मथुरा शैली में कनिष्क की सिररहित मूर्ति मिली है।
▸ कनिष्क के शासन काल में बौद्ध तथा बोधिसत्वों की प्रतिमाओं को पूजा जाने लगा। यह महायान सम्प्रदाय की विचारधारा के अनुसार हुआ।
▸ प्रसिद्ध पुस्तक कामसूत्र की रचना वात्स्यायन द्वारा इसी समय की गई।
▸ कुषाण वंश का अन्तिक शासक वासुदेव था।

कनिष्क द्वारा संरक्षित विद्वान्

अश्वघोष वह उच्च कोटि का साहित्यकार था‚ जिसकी तुलना मिल्टन‚ गेटे‚ काण्ट तथा वाल्टेयर से की जाती है। वह उच्च कोटि का नाटककार तथा संगीतज्ञ भी था। वह बौद्ध दार्शनिक था‚ जिसने बुद्धचरित सौन्दरानन्द‚ सारिपुत्रप्रकरण‚ सूत्रालंकार जैसी प्रसिद्ध रचनाएँ कीं।
नागार्जुन वह दार्शनिक तथा वैज्ञानिक था। उसने अपने ग्रन्थ माध्यमिक सूत्र में सापेक्षता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उसे भारतीय आइंस्टीन भी कहा गया है। नागार्जुन ने शून्यवाद का विचार दिया।
वसुमित्र इसने चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी। उसका प्रसिद्ध ग्रन्थ महाविभाषाशास्त्र है‚ जो बौद्ध जातकों की टीका है। इसे बौद्ध धर्म का विश्व कोश कहते हैं।
चरक ‘चरक संहिता’ के रचनाकार चरक को चिकित्साशास्त्र का जनक कहा जाता है। इस ग्रन्थ में रोग निवारण की औषधियों का वर्णन है।

सातवाहन वंश

▸ पहली शताब्दी ई. पू. में सातवाहनों ने दक्षिण भारत में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।
▸ सातवाहनों की राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन थी। इन्हें ‘आन्ध्रभृत्य’ भी कहा जाता था। वायु पुराण में 19 सातवाहन शासकों के शासन की चर्चा है।
▸ सातवाहन वंश का संस्थापक सिमुक था। शातकर्णी इस वंश का पहला शक्तिशाली शासक था। उसने राजसूय तथा अश्वमेघ यज्ञ किए। शातकर्णी ने दक्षिणपथपति की उपाधि भी ग्रहण की।
▸ हाल तथा गौतमीपुत्र शातकर्णी सातवाहन वंश के प्रमुख शासक थे। हाल प्राकृत भाषा का प्रसिद्ध कवि भी था। उसने गाथासप्तशती की रचना की।
▸ गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शक तथा पार्थियनों को पराजित किया। उसने सातवाहन शक्ति को गुजरात तथा राजपूताना तक पहुँचाया। 130 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
▸ वासिष्ठीपुत्र पुलमावि तथा यज्ञ श्री शातकर्णी अन्तिम दो महान सातवाहन शासक थे। वासिष्ठीपुत्र पुलमावि ने अमरावती के बौद्ध स्तूप का पुनरुद्धार करवाया। यज्ञ श्रीशातकर्णी के सिक्कों पर जलपोत उत्कीर्ण है।

मौर्योत्तरकालीन साहित्य

पुस्तक रचनाकार
गाथा सप्तशती हाल
महाभाष्य पतंजलि
चरक संहिता चरक
नाट्यशास्त्र भरतमुनि
कामसूत्र वात्स्यायन
बुद्धचरित‚ सौन्दरानन्द अश्वघोष

कलिंग (चेदि)

▸ कलिंग का प्रसिद्ध शासक खारवेल चेदि वंश का शासक था। उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया तथा वहाँ से महापद्मनन्द द्वारा लूटी गई जैन मूर्ति को वापस लाने में सफलता प्राप्त की।
▸ खारवेल ने खण्डगिरि पर्वत पर जैन सन्तों के निवास के लिए गुफाओं का निर्माण किया।
▸ वह जैन धर्म का अनुयायी था‚ किन्तु अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णु था।

संगम काल

▸ संगम तमिल कवियों का संघ या मण्डल था। इन संघ या परिषदों का आयोजन पाण्ड्य शासकों के संरक्षण में किया गया था।
▸ संगम कवियों को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ‚ जिस कारण विशाल साहित्य की रचना हुई।
▸ संगम काल में 473 कवियों द्वारा 2289 रचनाएँ की गईं थी।
▸ संगम काल की प्रसिद्ध रचना तमिल व्याकरण तोलकाप्पियम् है‚ जिसकी रचना तोलकाप्प्यिर ने की थी।
▸ संगम साहित्यों की रचना 300 ई. पू. से 300 ई. के बीच की गई। इसमें तीन संगमों का वर्णन है‚ जिन्हें पांड्य शासकों ने संरक्षण दिया था।
▸ कौटिल्य ने संगम काल के दक्षिण भारतीय राज्यों को कुलसंघ कहा था।
▸ तिरुक्काम्पुलियर चेर‚ चोल‚ पाण्ड्य तीनों राज्यों का संगम स्थल था।
▸ आदिग इमान नामक चेर शासक को दक्षिण में गन्ने की खेती प्रारम्भ करने का श्रेय प्राप्त है।

तमिल संगम आयोजन

प्रथम संगम मदुरै अगस्त्य ऋषि
द्वितीय संगम कपाटपुरम तोलकाप्पियर (संस्थापक
(अलवै) अध्यक्ष अगस्त्य ऋषि)
तृतीय संगम मदुरै नक्कीरर

संगम काल की क्षेत्रीय विशिष्टताएँ

तिनई (क्षेत्र अगम (प्रेम) पुरम (युद्ध) निवासी देवतागण
1. कुरिंजी (पहाड़िया) विवाह-पूर्व प्रेम पशुओं की लूट कुरुवर (पहाड़िया) मुरुगन, सुब्रह्मण्य, स्कंद, कार्तिमेय, सेयन
2. पलाई (शुष्कभूमि) प्रेमियों का लंबा विरह अग्निहन, विध्वंस मरवर (योद्धा) कोर्रवै, दुर्गा ।
3. मुल्लै (वन प्रदेश) संक्षिप्त विरह काल छापामार अभियान कुरुम्बर (गडरिए) कृष्ण, तिरुमल मेयन
4. मरुदम (मैदानी इलाके) विवाहेत्तर प्रेम घेराबंदी उलवर (कृषक) सेनन, इंद्र
5. नेडल (तटीय इलाके) मछुआरों की पत्नियों का अलग होना स्थायी पारंपरिक युद्ध पटदावर (मधुवारे) वरुण, काडलर

संगम आयु (प्रथम-तृतीय शताब्दी)

कृष्णा नदी की भूमि को तीन राज्यों में विभाजित किया गया था

राज्य स्थान राजधानी प्रतीक प्रसिद्ध बंदरगाह प्रसिद्ध शासक अन्य सुविधाओं
चोल (चोलमा ndalam) उत्तर- पूर्व का पेननेर और वेल्लार नदियों के बीच पंड्या। उरियुर (कपास व्यापार और पुहार के लिए प्रसिद्ध) बाघ पुहार एलारा सबसे पहला ज्ञात चोल राजा था। उसने श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और 50 वर्षों तक उस पर शासन किया। कारिकाला ने राजधानी पुहार / कावेरीपट्टनम की स्थापना की और कावेरी नदी के किनारे तटबंध का निर्माण किया । (कल्लन) चोलों ने एक कुशल नौसेना को बनाए रखा। उनकी अर्थव्यवस्था सूती कपड़े के व्यापार पर आधारित थी। चोल राज्य उत्तर से पल्लवों के हमले से नष्ट हो गया था।
चेरा केरल का हिस्सा और तमिलनाडु वनजी या करूर धनुष मुजरिस तोदी, बंदर उड़ियांगरा सबसे पहले ज्ञात चेरा शासकों में से एक है। उड़ियांगरे का यह खिताब उन्हें इसलिए दिया गया था क्योंकि कहा जाता है कि उन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध की दोनों सेनाओं की सेवा की थी। सेनगुत्तुवन / लाल चेरा , सबसे बड़ा चेरा राजा था। उसने उत्तर पर आक्रमण किया और गंगा को पार किया। उन्हें ‘कण्णगी’ का मंदिर बनाने के लिए याद किया जाता है, जो पवित्रता की देवी हैं और उन्होंने प्रसिद्ध पैटीनी पंथ की स्थापना की है। इसने रोमनों के साथ अच्छी तरह से स्थापित व्यापार किया है और अपने हितों की रक्षा के लिए मुजरिस में दो रेजिमेंट भी स्थापित किए हैं। उन्होंने मुग्रेस में ऑगस्टस का मंदिर बनवाया।
पंड्या भारत का सबसे दक्षिणी भाग मदुरै कार्प (मुट्ठी) कोरकाई, सलियूर मुदुकुदमी जल्द से जल्द पांडियन शासक था। नेदुनजेलियन पांड्या का सबसे महत्वपूर्ण राजा था। उन्होंने कोवलन पर चोरी का आरोप लगाया। नतीजतन, मदुरई शहर कन्नगी (कोवलन की पत्नी) द्वारा एक अभिशाप के तहत रखा गया था। इस राज्य का पहली बार मेगास्थनीज ने उल्लेख किया था, जो कहता है कि उनका राज्य मोती के लिए प्रसिद्ध था और एक महिला द्वारा शासित था। रामायण और महाभारत में भी उल्लेख मिलता है ।

चोल वंश

▸ चोलों (पूर्वी तमिलनाडु क्षेत्र) का प्राचीनतम उल्लेख कात्यायन ने किया है‚ इनका प्रतीक चिह्न बाघ था।
▸ संगमकालीन चोल वंश में सबसे प्रसिद्ध शासक करिकाल था। वह संगीत (सात स्वरों) का ज्ञाता एवं वैदिक धर्म का अनुयायी था। वह 190 ई. के आस-पास गद्दी पर बैठा। उसके पास शक्तिशाली नौसेना थी।
▸ चोल वंश की राजधानी कावेरीपट्टनम थी। पत्तुपात्तु एक लम्बी कविता है‚ जिसमें कावेरीपट्टनम की चर्चा है।
▸ करिकाल ने वेण्णि का युद्ध जीता था। उसने उद्योग-धन्धों तथा कृषि को प्रोत्साहित किया।
▸ शिलप्पादिकारम् तथा पटि्टनपलै में करिकाल की चर्चा मिलती है।
▸ करिकाल ने पटि्टनप्पालै के रचनाकार को 16 लाख सोने की मुद्राएँ प्रदान की थीं।
▸ राज्य के सर्वोच्च न्यायालय को मनरम कहा जाता था। प्रतिनिधि परिषद् को पंचवरम कहते थे।
▸ युद्ध में मारे गए सैनिकों की स्मृति में वीरपट्ट लगाया जाता था।
▸ तोण्डी‚ मुशिरी तथा पुहार प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र थे। यहाँ यूनानी तथा रोमन व्यापारियों की बस्तियों का उल्लेख है।
शिलप्पादिकारम में कोवलन और कण्णगी की कथा नूपूर के चारों ओर घूमती है।
मणिमेखलै की रचना बौद्ध व्यापारी सत्तनार ने की।
▸ जीवक चिन्तामणि की रचना जैन मुनि तिरुत्तक्कदेवर ने की।
उरैयूर सूती वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केन्द्र था।
मुशिरी बन्दरगाह पर यवन लोग सोने से लदा जहाज लाते थे तथा बदले में काली मिर्च ले जाते थे।
▸ चेर‚ चोल‚ पाण्ड्य राजवंशों के राजचिह्न क्रमश: धनुष‚ बाघ तथा मछली थे।
▸ इन्द्र‚ यम‚ वरुण और सोम को चारों दिशाओं क्रमश: पूर्व‚ दक्षिण‚ पश्चिम और उत्तर का संरक्षक बताया गया है।
▸ अरागरिटिक एक प्रकार का मलमल था‚ जिसे निर्यात किया जाता था।

पांड्य वंश

▸ मेगस्थनीज ने पांड्य वंश के शासन की चर्चा की है। उसने पांड्य शासन को हेराक्लीज की पुत्री का शासन बताया है। इसने पाण्डय क्षेत्र को माबर नाम दिया था।
▸ पांड्य शासक मुदुकुडुमी ने यज्ञशालाओं का निर्माण करवाया तथा ‘पलशालै’ (अनेक यज्ञशाला बनाने वाला) की उपाधि ग्रहण की।
▸ ‘मदुरैकांजी’ नाम की रचना में नेंडुजेलियन के कुशल प्रशासन की चर्चा मिलती है।
▸ पांड्यों की राजधानी मदुरै थी तथा कोरकाई तटीय राजधानी थी। इसका प्रतीक चिन्ह कार्प (एक प्रकार की मछली) था।
▸ नेंडुजेलियन प्रसिद्ध पांड्य शासक था‚ जिसने तलैयालंगानम का युद्ध जीता था। पत्तुपात्तु में नेंडुजेलियन के जीवन का विवरण मिलता है।
▸ पत्तुपात्तु में किलार तथा नक्कीरा जैसे तमिल कवियों की कविताएँ संगृहित हैं।
▸ पांड्य शासक नेडियोन ने समुद्र पूजा की प्रथा प्रारम्भ की थी।
▸ नल्लियक्कोडन को अन्तिम संगमकालीन पांड्य शासक माना जाता है।
▸ पेरुनरकिल्लि नामक एक अन्य चोल राजा का भी उल्लेख है। उसने राजसूय यज्ञ किया था।

चेर वंश

▸ चेर वंश का शासन केरल के क्षेत्र पर था। इस वंश का प्रतीक चिह्न धनुष था।
▸ चेरों की राजधानी वंजि या वंजिपुरम् थी‚ जिसे करूर के नाम से भी जाना जाता था।
▸ चेर वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक शेनगुट्टवन था‚ जिसे लाल चेर भी कहा जाता था।
▸ चेरों की राजधानी करूर (वंजि) से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के एवं रोमन सुराहियाँ प्राप्त हुई हैं।
▸ प्रथम चेर शासक उदियनजेरल के कुरुक्षेत्र के युद्ध में शामिल होने का उल्लेख है। उसने महाभारत के युद्ध में भाग लेने वाले वीरों को भोजन करवाया था।
▸ शेनगुट्टवन ने पत्तनी पूजा आरम्भ की। इसे कण्णगी पूजा भी कहा जाता है।
▸ नेदुजेराल अदन ने नौ-सैनिक शक्ति स्थापित की तथा अधिराज की उपाधि ग्रहण की।

महत्वपूर्ण तथ्य

▸ मुरुगन (सुब्रह्मण्यम) तमिलों का सर्वश्रेष्ठ देव था
▸ मरियम्मा (परशुराम की माता) चेचक से सम्बन्धित शीतला माता थी।
▸ किसान लोग मरुदम इन्द्र देव की पूजा करते थे। पुहार के वार्षिक उत्सव में इन्द्र की विशेष प्रकार की पूजा होती थी।
▸ ओवैयर तथा नच्चेलियर संगम युगीन दो प्रसिद्ध कवयित्रियाँ थीं।
▸ संगम साहित्य में कृषि में संलग्न लोगों को बेलालर तथा मजदूर कृषक वर्ग को वेलरि एवं व्यापारी वर्ग को वेनिगर कहा गया है।
▸ वैदिक संस्कृति को आगस्त्य ऋषि ने दक्षिण में पहुँचाया।

गुप्त साम्राज्य

▸ गुप्त साम्राज्य के शासन काल को प्राचीन भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है।
▸ गुप्त वंश के शासन का प्रारम्भ श्री गुप्त द्वारा किया गया था‚ किन्तु इस वंश का वास्तविक शासक चन्द्रगुप्त प्रथम था।

चन्द्रगुप्त I (319-335 ई.)

▸ गुप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम ही गुप्त वंश का प्रथम स्वतन्त्र शासक था। उसने महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की थी।
▸ चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त सम्वत् की स्थापना 319-320 ई. में की थी। गुप्त सम्वत् तथा शक सम्वत् के बीच 241 वर्षों का अन्तर था।
▸ चन्द्रगुप्त प्रथम का लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह हुआ था।
▸ कुमार देवी से विवाह के बाद चन्द्रगुप्त प्रथम को वैशाली का राज्य प्राप्त हुआ।

समुद्रगुप्त (335-375 ई.)

▸ चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। वह लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से उत्पन्न हुआ था। वह स्वयं को लिच्छवी दौहित्र कहने पर गर्व का अनुभव करता था।
▸ समुद्रगुप्त का शासन काल राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है।
हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्त की विजयों की विस्तृत जानकारी मिलती है।
▸ समुद्रगुप्त ने दिग्विजय की योजना बनाई थी। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार इस योजना का ध्येय ‘धरणि-बन्ध’ (भूमण्डल को बाँधना) था।
▸ समुद्रगुप्त ने सैन्य विजय के बाद एक अश्वमेघ यज्ञ भी किया था और अश्वमेघकर्ता की उपाधि धारण की।
▸ समुद्रगुप्त एक उच्च कोटि का कवि भी था। उसने ‘कविराज’ नाम से कई कविताएँ भी लिखीं। एक सिक्के पर उसे वीणा बजाते दिखाया गया है।
▸ श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने बोधगया में एक बौद्ध विहार के निर्माण की अनुमति पाने के लिए‚ अपना राजदूत समुद्रगुप्त के पास भेजा था।
▸ समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के नौ शासकों को पराजित किया। पराजित राजाओं में अच्युत‚ नागसेन तथा गणपतिनाग प्रमुख थे।
विन्सेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है।
▸ समुद्रगुप्त ने महान् बौद्ध भिक्षु वसुबन्धु को संरक्षण दिया था।
▸ इलाहाबाद के स्तम्भ लेख में समुद्रगुप्त की धर्म प्रचार बन्धु उपाधि का उल्लेख है।

चन्द्रगुप्त II (विक्रमादित्य) (375-415 ई.)

▸ समुद्रगुप्त के बाद सम्भवत: रामगुप्त शासक हुआ‚ किन्तु वह एक दुर्बल शासक था। उसके बाद चन्द्रगुप्त II शासक बना।
▸ चन्द्रगुप्त II ने वैवाहिक सम्बन्धों और विजय दोनों प्रकार से गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया था।
▸ चन्द्रगुप्त II के अन्य नाम देवराज तथा देवगुप्त भी थे। धाव नाम से भी उसका उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है।
▸ चन्द्रगुप्त II के शासनकाल में उसकी प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र और द्वितीय राजधानी उज्जयिनी थी‚ ये दोनों ही नगर गुप्तकालीन शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र थे।
▸ चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल ब्राह्मण धर्म के चरमोत्कर्ष का काल था।
▸ उसका प्रधान सचिव वीरसेन (शैव) तथा सेनापति अम्रकार्दव (बौद्ध) था। पाटलिपुत्र से फाह्यान ने वापसी यात्रा प्रारम्भ की तथा अपनी पूरी यात्रा के विवरण में कहीं भी सम्राट का नामोल्लेख नहीं किया। चन्द्रगुप्त II का काल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।
▸ चन्द्रगुप्त II ने शकों पर विजय के उपलक्ष्य में रजत मुद्राओं (silver coins) का प्रचलन करवाया था तथा शकारि उपाधि धारण की एवं व्याध्र शैली के सिक्के चलाए।

मेहरौली लौह स्तम्भ

दिल्ली में मेहरौली में स्थापित कुतुबमीनार के प्रांगण में स्थित लौह-स्तम्भ पर ‘चन्द्र’ नामक शासक की चर्चा है। ‘चन्द्र’ तथा ‘धाव’ शासक सम्भवत: चन्द्रगुप्त II था‚ जिसकी चर्चा इस अभिलेख में हुई है।
▸ चन्द्रगुप्त II ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन II के साथ किया।
▸ चन्द्रगुप्त II अपने दरबार में विद्वानों एवं कलाकारों को आश्रय देता था। उसके दरबार में नौ रत्न थे— कालिदास‚ धनवन्तरि‚ क्षपणक‚ अमरसिंह‚ शंकु‚ वेताल भट्ट‚ घटकर्पर‚ वराहमिहिर और वररुचि।
▸ चन्द्रगुप्त II के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान (399-414 ई.) भारत यात्रा पर आया था। फाह्यान अपनी पूरी यात्रा विवरण में कहीं भी किसी सम्राट का उल्लेख नहीं करता है।

कुमारगुप्त (415-455 ई.)

▸ चन्द्रगुप्त II विक्रमादित्य के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त I गुप्त साम्राज्य का शासक बना। कुमारगुप्त की माता का नाम ध्रुव देवी था।
▸ गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख कुमारगुप्त के ही प्राप्त हुए हैं। उसके शासन काल में हूणों का आक्रमण हुआ था।
▸ कुमारगुप्त I महेन्द्रादित्य के नाम से भी जाना जाता था।
▸ कुमारगुप्त I स्वयं वैष्णव धर्मानुयायी था‚ किन्तु उसने धर्म-सहिष्णुता की नीति का पालन किया।
▸ कुमारगुप्त I ने अधिकाधिक संख्या में मयूर आकृति की रजत मुद्राएँ प्रचलित की थी तथा अश्वमेघ यज्ञ भी किया था।
▸ कुमारगुप्त I (415-455 ई.) के शासन काल में नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। इस विश्वविद्यालय को ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध कहा जाता है।

स्कन्दगुप्त (455-467 ई.)

▸ स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) गुप्त वंश का अन्तिम प्रतापी शासक था।
▸ स्कन्दगुप्त ने 466 ई. में चीनी सांग सम्राट के दरबार में राजदूत भेजा था।
▸ स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों में बुद्ध गुप्त सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था। वह बौद्ध था।
▸ स्कन्दगुप्त ने मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके पुनरुद्धार का कार्य सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपा था।
▸ 455 ई. में स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित किया। हूणों के आक्रमण से भारत की सुरक्षा करने का श्रेय स्कन्दगुप्त को है। उसने पुष्यमित्रों के विद्रोह को भी समाप्त किया। इसका उल्लेख उसके भीतरी स्तम्भ लेख में हुआ है।
▸ गुप्त वंश के शासक भानुगुप्त के समय सती प्रथा का प्रथम साक्ष्य 510 ई. के एरण लेख में मिलता है।
▸ गुप्त वंश का अन्तिम शासक विष्णुगुप्त था। 570 ई. में गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।

प्रशासन

▸ राजाओं ने ‘परमेश्वर‚’ ‘महाराजाधिराज’‚ ‘परमभट्टारक’ आदि उपाधियाँ धारण की।
▸ ‘कुमारामात्य’ गुप्त प्रशासन के प्रमुख अधिकारी होते थे।
▸ गुप्तकाल से ही विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी।
▸ गरुड़ गुप्त वंश का राजकीय चिह्न था प्रयाग प्रशस्ति से पता चलता है कि गुप्तों की राजाज्ञाएँ गरुड़ मुद्रा में अंकित हुआ करती थीं।
▸ गुप्त साम्राज्य में ग्राम समूह की छोटी इकाई को पेठ कहते थे जिसका उल्लेख संक्षोभ के खोह अभिलेख में मिलता है।
▸ गुप्तों के कार्यकलाप का मुख्य प्रांगण मध्यदेश (उ.प्र. तथा बिहार) की उर्वरा भूमि थी। गुप्तों की आरम्भिक मुद्राएँ उत्तर प्रदेश में ही मिली हैं।
▸ केन्द्र में मुख्य विभाग सैन्य था। सन्धि विग्राहिक सेना का मुख्याधिकारी किया जाता था।
▸ गुप्तवंशी राजाओं ने बड़ी संख्या में सोने के सिक्के जारी किए जिन्हें दीनार के नाम से जाना जाता था।
▸ चन्द्रगुप्त I के सिक्कों पर चन्द्रगुप्त व कुमार देवी का चित्र व नाम अंकित पाया गया है।
▸ राजकार्य में सम्राट को सहायता करने वाले मन्त्री और अमात्य होते थे। कामन्दक नीतिसार में मन्त्रियों और अमात्यों के बीच के अन्तर को स्पष्ट किया गया है।
▸ गुप्तों की शासन व्यवस्था पूर्णतया मौलिक नहीं थी। उसमें मौर्यों‚ सातवाहनों‚ शकों तथा कुषाणों के प्रशासन की विधियों का समावेश था।
▸ पुलिस विभाग के पदाधिकारियों में उपरिक‚ दशापराधिक‚ चौराद्धरणिक‚ दण्डपाशिक‚ अंगरक्षक आदि प्रमुख थे।
▸ पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चाट एवं भाट कहा जाता था। दण्डपाशिक पुलिस विभाग का प्रधान किया जाता था।

गुप्तकालीन अभिलेखों में वर्णित अधिकारी

1 सर्वाध्यक्ष राज्य के सभी केन्द्रीय विभागों के प्रमुख अधिकारी
2 प्रतिहार एवं महाप्रतिहार सम्राट से मिलने की इच्छा रखने वालों को आज्ञापत्र देना इनका मुख्य कार्य था। प्रतिहार अंत:पुर का रक्षक एवं महाप्रतिहार राजमहल के रक्षकों का मुखिया किया जाता था।
3 कुमारामात्य पदाधिकारियों का सर्वश्रेष्ठ वर्ग, इन्हें उच्च से उच्च पद पर नियुक्त किया जाता था।
4 महासेनापति सेना का सर्वोच्च अधिकारी
5 रणभांडागारिक सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला अधिकारी
6 महाबलाधिकृत सैनिक अधिकारी
7 दण्डपाशिक पुलिस-विभाग का प्रधान। इस विभाग के साधारण कर्मचारी चाट-भाट कहलाते थे।
8 महादण्डनायक युद्ध एवं न्याय-विभाग का कार्य देखने वाला।
9 महसंधिविग्रहिक युद्ध-शान्ति या वैदेशिक नीति का प्रधान
10 विनयस्थिति स्थापक शान्ति-व्यवस्था का प्रधान
11 महाभंडाराधिकृत राजकीय कोष का प्रधान
12 महाअक्षपटलिक अभिलेख-विभाग का प्रधान
13 सर्वाध्यक्ष केन्द्रीय सचिवालय का प्रधान
14 ध्रुवाधिकरण कर वसूलने वाले विभाग का प्रधान
15 अग्रहारिक दान-विभाग का प्रधान
16 महापीलुपति गजसेना का अध्यक्ष

अर्थव्यवस्था

▸ गुप्तकाल में सिंचाई हेतु रहट या घंटी यंत्र का प्रयोग किया जाता था।
▸ गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्रा दीनार तथा चाँदी के सिक्के रूप्यका कहलाता था। सामान्य लोग खरीद बिक्री हेतु कौड़ी का प्रयोग करते थे।
▸ गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। वस्त्र उद्योग इस काल का प्रमुख उद्योग था।
▸ गुप्तकार में सर्वाधिक व्यापार दक्षिण पूर्व एशिया से किया जाता था। ताम्रलिप्ति‚ घंटशाला‚ पलूरा‚ भंडौच‚ कैम्बे आदि प्रमुख बन्दरगाह थे।

भूमि के प्रकार

वास्तु वास करने योग्य भूमि
खिल ऐसी भूमि जो जोतने योग्य नहीं होती थी।
अप्रहत ऐसी भूमि जो जंगली हाेती थी।
चरागाह पशुओं के चारा योग्य भूमि

समाज

▸ स्त्रियों की दशा पहले से निम्न हो गई थी। इसी काल में सती-प्रथा की प्रथम घटना का उल्लेख है।
▸ जातियाँ उपजातियों में विभक्त हो गई थीं।
▸ शूद्रों की दशा में कुछ सुधार हुआ‚ किन्तु छुआछूत की कुप्रथा ने जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं।
▸ याज्ञवल्क्य ने सर्वप्रथम स्त्रियों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों की वकालत की थी।
▸ सर्वाधिक भूमि अनुदान गुप्तकाल में दिया गया।
▸ नारद तथा पराशर स्मृतियों में विधवा विवाह का समर्थन मिलता है। नारद स्मृति में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख है।
▸ गुप्तकाल में बटाई पर खेती करने वाले किसान को त्रयधसीरिन या सीरिन कहते थे।
▸ गंगा और यमुना के मूर्ति रूप गुप्त काल की ही देन है।
▸ वेश्यावृति करने वाली महिला गणिका कहलाती थी।

धर्म

▸ बौद्ध धर्म विभिन्न सम्प्रदायों में विभाजित था। राजकीय संरक्षण नहीं मिलने के कारण प्रचार-प्रसार कमजोर पड़ रहा था।
▸ वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म के स्वरूप का निर्माण इसी युग में हुआ। भगवद्गीता की रचना इसी युग में हुई। गुप्त शासक प्राय: वैष्णव थे।
▸ इस समय मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया था।
▸ चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा समुद्रगुप्त के सिक्कों पर विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा अंकित है।
▸ स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख तथा बुद्धगुप्त का एरण स्तम्भलेख विष्णु की स्तुति से आरम्भ होता है।
▸ स्कन्दगुप्त के बैल के आकार वाले सिक्के उसकी शैव धर्म में आस्था के प्रमाण हैं।
▸ कुमारगुप्त प्रथम के सिक्कों पर मयूर पर आरूढ़ कार्तिकेय (स्कन्द) की प्रतिमा अंकित है।
▸ गुप्तकाल में अनेक प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों; जैसे— आर्यदेव‚ असंग‚ वसुबन्धु‚ मैत्रेयनाथ दिङ्नाग आदि का आविर्भाव हुआ।
▸ योगाचार दर्शन का गुप्तकाल में अत्यधिक विकास हुआ।

गुप्तकालीन प्रसिद्ध मन्दिर

विष्णु मन्दिर तिगवा (जबलपुर‚ मध्य प्रदेश)
शिव मन्दिर भूमरा (नागौद‚ मध्य प्रदेश)
पार्वती मन्दिर नचना कुठार (मध्य प्रदेश)
दशावतार मन्दिर देवगढ़ (ललितपुर‚ उत्तर प्रदेश)
शिव मन्दिर खोह (नागौद‚ मध्य प्रदेश)
भितरगाँव मन्दिर (ईंट से निर्मित) भितरगाँव (कानपुर‚ उत्तर प्रदेश)

कला

▸ गुप्त युग में विभिन्न कलाओं—मूर्तिकला‚ चित्रकला‚ वास्तुकला‚ संगीत तथा नाट्य कला के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई थी।
▸ प्राचीन भारत में स्थापत्य एवं चित्रकला के क्षेत्र में विकास की चरम सीमा गुप्तकाल में ही प्राप्त होती है।
▸ अत्यधिक देवताओं की मूर्तियों का निर्माण हुआ। मूर्तियों में विष्णु‚ शिव‚ पार्वती‚ ब्रह्मा के अतिरिक्त बुद्ध तथा जैन तीर्थंकर की मूर्तियों का निर्माण भी हुआ।
मन्दिर निर्माण कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ। देवगढ़ का दशावतार मन्दिर भारतीय मन्दिर निर्माण में शिखर का सम्भवत: पहला उदाहरण है।
▸ सारनाथ की बुद्धमूर्ति‚ मथुरा की वर्धमान महावीर की मूर्ति‚ विदिशा की वराह अवतार की मूर्ति‚ झाँसी की शेषशायी विष्णु की मूर्ति‚ काशी की गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति आदि इस युग की मूर्तिकला के प्रमुख उदाहरण हैं।
▸ अजन्ता की 16 एवं 17 और 19 गुफा के चित्र एवं बाघ गुफा इसी समय चित्रित किए गए‚ जो चित्रकला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। यह महाराष्ट्र राज्य में अवस्थित हैं।
▸ वास्तुकला के अन्तर्गत विभिन्न मन्दिर‚ गुफा‚ चैत्य‚ विहार‚ स्तूप इत्यादि का निर्माण हुआ। इनके निर्माण में पत्थरों तथा पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया।
▸ सारनाथ का धम्मेख स्तूप तथा राजगृह स्थित जरासंध की बैठक गुप्तकाल की देन है।
▸ गुप्तकार को कला‚ साहित्य व संस्कृति के अधिक विकास के कारण स्वर्ण काल कहा जाता है।

साहित्य

▸ संस्कृत गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी।
▸ गुप्तकाल में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई। काशी‚ मथुरा‚ नासिक‚ पद्मावती‚ उज्जयिनी‚ अवरपुर‚ वल्लभी‚ पाटलिपुत्र तथा काँची आदि गुप्तकाल के प्रमुख शैक्षिक केन्द्र थे।
विष्णु शर्मा द्वारा पंचतन्त्र और नारायण पण्डित द्वारा हितोपदेश की रचना की गई। नारद तथा बृहस्पति पुराण के साथ रामायण तथा महाभारत से धर्मशास्त्र इसी काल में रचे गए।
▸ भारवि ने किरातार्जुनीय‚ अमरसिंह ने अमरकोष‚ कामन्दक ने नीतिसार तथा चन्द्रगोमिन ने चन्द्र व्याकरण’ इसी समय लिखा।
▸ हरिषेण‚ वीरसेन‚ कालिदास तथा विशाखदत्त आदि इस युग के प्रसिद्ध विद्वान् थे। बौद्ध विद्वानों में असंग‚ वसुबन्धु‚ दिङ्नाग तथा धर्मपाल‚ जैन विद्वानों में उपेशवती‚ सिद्धसेन तथा भद्रबाहु II इसी समय हुए थे।

कालिदास की रचनाएँ

गुप्तकालीन नाटक एवं नाटककार

नाटक का नाम नाटककार नाटक का विषय
मालविकाग्निमित्रम् कालिदास अग्निमित्र एवं मालविका की प्रणय-कथा पर आधारित
विक्रमोर्वशीयम् कालिदास सम्राट पुरूरवा एवं उर्वशी अप्सरा की प्रणय-कथा पर आधारित
अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास दुष्यन्त तथा शकुंतला की प्रणय-कथा पर आधारित
मुद्राराक्षस विशाखदत्त इस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त मौर्य के मगध के सिंहासन पर बैठने की कथा का वर्णन मिलता है।
मृच्छकटिकम् शूद्रक इस नाटक में नायक चारूदत्त, नायिका वसंतसेना के अतिरिक्त राजा, ब्राह्मण, जुआरी, व्यापारी, वेश्या, चोर, धूर्त, दास आदि का वर्णन मिलता है।
स्वप्नवासवदत्तम् भास इसमें महाराज उदयन एवं वासवदता की प्रेमकथा का वर्णन मिलता है।
प्रतिायौगंधरायणम् भास इसमें महाराज उदयन किस तरह यौगंधरायण की सहायता से वासवदत्ता को उज्जैयिनी से लेकर भागता है, का वर्णन मिलता है।
चारूदत्तम् भास इस नाटक का नायक चारूदत्त मूलत: भास की कल्पना है।

गुप्तकाल के रचनाकार

रचनाकार रचना
विशाखदत्त मुद्राराक्षस‚ देवी चन्द्रगुप्तम
शूद्रक मृच्छकटिकम
दण्डी दशकुमारचरित्
आर्यभट्ट सूर्य सिद्धान्त
वराहमिहिर वृहत्संहिता‚ लघुजातक‚
पंचसिद्धान्तिका
कामन्दक नीतिशास्त्र
विष्णु शर्मा पंचतंत्र

विज्ञान

▸ गुप्तयुग में गणित‚ पदार्थ विज्ञान‚ धातु विज्ञान‚ रसायन विज्ञान‚ ज्योतिष विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान की बहुत उन्नति हुई। दशमलव तथा शून्य का अन्वेषण गुप्तकाल में ही हुआ।
आर्यभट्ट इस युग के प्रख्यात गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इन्होंने आर्यभट्टीयम् नामक ग्रन्थ की रचना की‚ जिसमें अंकगणित‚ बीजगणित तथा रेखागणित की विवेचना की गई है। आर्यभट्ट ने सूर्यसिद्धान्त नामक ग्रन्थ में यह सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।
वराहमिहिर ने वृहतसंहिता एवं पंचसिद्धान्तिका नाम के खगोलशास्त्र के ग्रन्थों की रचना की। ब्रह्मगुप्त का ‘ब्रह्म सिद्धान्त’ भी खगोलशास्त्र का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
▸ भास्कराचार्य ने महाभाष्कर्य‚ लघुभाष्कर्य लिखा।
धनवन्तरि तथा सुश्रुत इस युग के प्रख्यात वैद्य थे। ‘नवनीतकम्’ इस युग की प्रसिद्ध चिकित्सा पुस्तक है। हस्तायुर्वेद पशु चिकित्सा सम्बन्धी रचना है। प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य धनवन्तरि ने ‘रसचिकित्सा’ नामक पुस्तक की रचना की तथा सिद्ध किया कि सोना‚ चाँदी‚ लोहा‚ ताँबा आदि धातुओं में रोग निवारण की शक्ति विद्यमान है।
▸ आर्यभट्ट प्रथम‚ वराहमिहिर‚ भास्कर प्रथम एवं ब्रह्मगुप्त प्रमुख गणितज्ञ थे।

गुप्तकालीन तकनीकी ग्रन्थ

रचनाकार रचना का नाम
चन्द्रगोभिन चन्द्र व्याकरण
अमरसिंह अमरकोष (संस्कृत का प्रामाणिक कोश)
कामन्दक नीतिसार (कौटिल्य के अर्थशास्त्र से प्रभावित)
वात्स्यायन कामसूत्र

वाकाटक राजवंश

▸ गुप्त साम्राज्य के समकालीन वाकाटक राजवंश विदर्भ में प्रभावशाली था।
▸ वाकाटक राजवंश की स्थापना विन्ध्यशक्ति ने 255 ई. में की। इस वंश का प्रसिद्ध शासक प्रवरसेन था। उसने चार अश्वमेघ यज्ञ किए तथा सम्राट की उपाधि ग्रहण की।
▸ वाकाटक शासक रुद्रसेन II का विवाह चन्द्रगुप्त II की पुत्री प्रभावती देवी से हुआ था।
▸ प्रवरसेन II ने ‘सेतुबन्ध’ नामक एक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की।

गुप्तोत्तर काल

गुप्त साम्राज्य के अन्त के बाद उत्तर भारत में कई छोटे शासकीय समुदाय अस्तित्व में आए। जिनमें मौखरि‚ मैत्रक तथा पुष्यभूति वंश प्रमुख थे।

हर्षवर्द्धन (पुष्यभूति वंश) (606-647 ई.)

▸ थानेश्वर पुष्यभूति वंश के अधीन था‚ जबकि कन्नौज पर मौखरि वंश का शासन था। थानेश्वर के पुष्यभूति शासक हर्ष ने अपने सम्बन्धी ग्रहवर्मा की हत्या के बाद कन्नौज से शासन प्रारम्भ किया।
▸ हर्षवर्द्धन के शासन की जानकारी बाणभट्ट की रचना हर्षचरित से मिलती है।
▸ नालन्दा‚ मधुबन तथा बाँसखेड़ा अभिलेख से भी हर्षवर्द्धन के जीवन तथा शासन का पता चलता है।
▸ चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्द्धन के शासनकाल में भारत की यात्रा पर आया था।
▸ पुलकेशिन II के एहोल अभिलेख (633-34 ई.) में हर्षवर्द्धन के नर्मदा तट पर चालुक्य शासक से पराजित होने का उल्लेख है।
▸ हर्षवर्द्धन ने विशाल सेना तैयार की थी‚ जिसमें 60 हजार हाथी तथा एक लाख घुड़सवार थे।

हर्षवर्द्धन की सेना के प्रधान

अवन्ती युद्ध तथा सन्धि वार्ता का मन्त्री सिंहनाद सेनापति कुन्तल घुड़सवार सेना का प्रमुख स्कन्दगुप्त गज (हस्त) सेना का प्रधान
▸ हर्षवर्द्धन ने 641 ई. में चीनी शासक के दरबार में एक राजदूत भेजा था।
▸ राज्य की आय का मुख्य साधन भूमिकर था‚ जिसे भाग कहा जाता था। यह पैदावार का 1/6 भाग किया जाता था।
▸ हर्ष ने प्रयाग (इलाहाबाद) में प्रत्येक पाँच वर्षों पर एक धार्मिक आयोजन (मोक्षपरिषद्) करने की व्यवस्था की। उसके शासनकाल में छ: बार ऐसा उत्सव हुआ।
▸ हर्षवर्द्धन ने रत्नावली‚ प्रियदर्शिका तथा नागानन्द नामक नाटकों की रचना की।
▸ हर्षचरित तथा कादम्बरी के रचनाकार बाणभट्ट के अतिरिक्त मयूर‚ दिवाकर‚ जयसेन जैसे विद्वान् हर्षवर्द्धन के दरबार में रहते थे।
▸ हर्षवर्द्धन के समय नालन्दा विश्वविद्यालय का कुलपति शीलभद्र था।
▸ हर्षवर्द्धन के समय बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कुमारजीव‚ परमार्थ‚ शुमाक तथा धर्मदेव चीन गए।
▸ शान्तरक्षित‚ पद्मसम्भव‚ कमलशील‚ स्थिरमति तथा बुद्धकीर्ति इस समय तिब्बत जाने वाले बौद्ध धर्म प्रचारक थे।
▸ मधुबन तथा बाँसखेड़ा अभिलेखों में हर्षवर्द्धन को परम महेश्वर कहा गया है। कुम्भ मेला का प्रारम्भ हर्ष ने ही किया था।
▸ हर्षवर्द्धन ने 643 ई. में कन्नौज में एक बौद्ध धर्म सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता असम के शासक भास्करवर्मन को सौंपी गई थी।
▸ हर्ष का समकालीन गौड़ नरेश शशांक था‚ जिसने हर्ष के भाई राज्यवर्द्धन की धोखे से हत्या कर दी थी। वह शैव था। ह्वेनसाँग के अनुसार इसने बोधगया के बिहार और बोधिवृक्ष को नष्ट कर दिया।
▸ हर्षवर्द्धन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर यशोवर्मा का शासन हुआ। यशोवर्मा ने वाक्पति नामक प्रसिद्ध कवि को संरक्षण प्रदान किया।
▸ वाक्पति की गौडवाहो रचना में यशोवर्मा की विजयों का वर्णन मिलता है। यह प्राकृत भाषा की रचना है।
▸ यशोवर्मा ने 731 ई. में बुद्ध सेन (पूटासिन) को चीन के शासक के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा।

महाग्हहार

नालन्दा विश्वविद्यालय शिक्षा का एक प्रसिद्ध केन्द्र था जहाँ बौद्ध धर्म के अतिरिक्त वेद‚ वेदांग तथा धर्मशास्त्रों से सम्बन्धित शिक्षा दी जाती थी। कुछ अभिलेखों में शिक्षा के इस विख्यात केन्द्र को ‘महाग्हहार’ कहा गया है।

पूर्व मध्यकाल

कश्मीर के राजवंश

▸ कल्हण की राजतरंगिणी (1150 ई.) में कश्मीर के प्राचीन इतिहास का वर्णन मिलता है।
▸ राजतरंगिणी की रचना महाभारत की शैली के आधार पर हुई है।
▸ दुर्लभवर्द्धन ने 627 ई. में कार्कोट वंश की स्थापना की थी।
▸ 713 ई. में कश्मीर का शासक चन्द्रपीड़ था‚ जिसने अरबों के आक्रमण का सामना किया।
ललितादित्य मुक्तापीड़ (लगभग 724-760 ई.) कार्कोट वंश का प्रसिद्ध शासक था। उसने कम्बोजों तथा तुर्कों को पराजित किया। राजतरंगिणी में ललितादित्य मुक्तापीड़ की विजयों का विवरण है। उसने मार्तण्ड का सूर्य मन्दिर निर्मित करवाया था।
▸ कार्कोट वंश के बाद उत्पलवंश तथा लोहार वंश का शासन कश्मीर पर हुआ।
▸ उत्पल वंश का संस्थापक अवन्तिवर्मन था‚ जबकि लोहार वंश का संस्थापक संग्राम राज था।
▸ अवन्तिवर्मन ने अवन्तिनगर बसाया तथा उसके अधिकारी सुय्य ने सिंचाई के लिए नहरें बनवाईं।
▸ 980 ई. में उत्पल वंश की रानी दिद्दा ने राज्य में शान्ति स्थापित की‚ किन्तु वह एक दुराचारिणी महिला थी। 1003 ई. में उसकी मृत्यु के बाद संग्रामराज शासक हुआ जिसने लोहार वंश की नींव डाली।
▸ इसी वंश में हर्ष राजा हुआ जिसका आश्रित कवि कल्हण था। जिसकी राजतरंगिणी का विवरण इस वंश के अन्तिम शासक जयसिंह (1128-1155 ई.) के साथ समाप्त हो जात है।
▸ 1339 ई. में शाहमीर ने कश्मीर में मुस्लिम शासन की स्थापना की।

बंगाल के वंश

पाल वंश

▸ 8वीं शताब्दी के मध्य (750-770 ई.) में बंगाल में पाल राजवंश की स्थापना बौद्ध धर्म के अनुयायी गोपाल ने की।
▸ मध्य भारत (कन्नौज) पर नियन्त्रण के लिए पाल शासकों का संघर्ष प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट शासकों से हुआ।
▸ धर्मपाल के खालीमपुर अभिलेख के अनुसार बंगाल की जनता ने गोपाल नामक व्यक्ति को शासक बनाया‚ जिसने पाल वंश के शासन की नींव रखी।
▸ गोपाल ने ओदन्तपुरी में विहार बनाया।
▸ धर्मपाल ने प्रतिहार शासक वत्सराज को पराजित किया‚ किन्तु नागभट्ट II से पराजित हुआ।
▸ धर्मपाल ने परमभट्टारकमहाराजाधिराज तथा परमेश्वर जैसी उपाधियाँ ग्रहण कीं।
▸ उसके समय में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई‚ जो बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र था।
देवपाल ने प्रतिहार शासक मिहिरभोज को पराजित किया। उसके शासनकाल में शैलेन्द्रशासक बालपुत्रदेव ने नालन्दा महाविहार को दान देने के लिए पाँच गाँवों की माँग की थी।
▸ अरब यात्री सुलेमान ने पाल वंश को प्रतिहार तथा राष्ट्रकूटों से अधिक शक्तिशाली बताया तथा उसने पाल साम्राज्य को ‘रूहमा’ कहा है।
▸ महिपाल प्रथम 988 ई. में शासक बना। उसके समय चोल शासक राजेन्द्र प्रथम ने बंगाल पर आक्रमण किया तथा इसे पराजित किया।
▸ पाल वंश के अन्तिम शासक रामपाल के शासन काल में कैवर्त जाति के लोगों ने विद्रोह किया था।

सेन वंश

▸ पालवंश की दुर्बलता का लाभ उठाकर सामन्त सेन ने बंगाल में सेन वंश की स्थापना की।
▸ बल्लाल सेन‚ सेन वंश का प्रबुद्ध शासक था। उसने दानसागर एवं अद्भुत सागर (खगोल विज्ञान पर) ग्रन्थ की रचना की।
▸ अद्भुत सागर की रचना को लक्ष्मनसेन ने पूरा किया।
▸ लक्ष्मणसेन (बल्लाल सेन का उत्तराधिकारी) के दरबार में गीतगोविन्द का लेखक जयदेव‚ पवनदूत का लेखक धोयी एवं ब्राह्मण सर्वस्व का रचयिता हलायुद्ध थे। हलायुद्ध लक्ष्मणसेन का न्यायाधीश एवं मुख्यमन्त्री था।
▸ लक्ष्मणसेन एक साम्राज्यवादी शासक था‚ जिसने कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचन्द को पराजित किया।
▸ लक्ष्मणसेन को लेखों में परम भागवत की उपाधि प्रदान की गई है। यह बंगाल का अन्तिम हिन्दू शासक था।
▸ 1202 ई. में बख्तियार खिलजी ने लक्ष्मणसेन के शासनकाल में बंगाल पर आक्रमण किया।

राजपूत काल

अग्निकुल सिद्धान्त के अनुसार चार राजपूत कुलों-परमार‚ प्रतिहार‚ चौहान तथा चालुक्यों का उद्भव आबू पर्वत पर वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ की अग्निकुण्ड से हुआ।

गुर्जर-प्रतिहार वंश

▸ हर्षवर्द्धन की मृत्यु के बाद गुर्जर-प्रतिहारों ने कन्नौज पर नियन्त्रण कर उत्तर भारतीय साम्राज्य की स्थापना की।
हरिश्चन्द्र ने प्रतिहार राजवंश की नींव रखी। नागभट्ट I इस वंश का प्रथम शक्तिशाली व संस्थापक शासक था।
नागभट्ट I के बाद वत्सराज प्रतिहार शासक हुआ‚ जिसके बारे में जैन ग्रन्थ कुवलयमाला तथा हरिवंशपुराण से महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
वत्सराज ने पाल नरेश धर्मपाल को हराया‚ किन्तु राष्ट्रकूट शासक गोविन्द II से हारा।
▸ वत्स राज के पश्चात् उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय शासक हुआ। इसके पश्चात् मिहिर भोज शासक हुआ।
मिहिर भोज (836-885 ई.) ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। मिहिर भोज के बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल I शासक हुआ।
▸ महेन्द्रपाल I के बारे में राजतरंगिणी से भी जानकारियाँ मिलती हैं। इसे लेखों में महाराजधिराज‚ परमेश्वर कहा गया है।
▸ राजशेखर जिसने काव्यमीमांसा लिखी‚ महेन्द्रपाल के दरबार में था। राजशेखर ने कर्पूर मंजरी‚ काव्यमीमांसा विशालभंगिका‚ बालभारत‚ बालरामायण‚ भुवनकोश‚ हरविलास जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की।
▸ यशपाल प्रतिहार वंश का अन्तिम शासक था‚ जिसने महमूद गजनवी के आक्रमण का सामना करने के लिए अपनी सेना कश्मीर भेजी थी। अनंगपाल ने दिल्ली में तोमर वंश की स्थापना की।

चालुक्य (सोलंकी) वंश

▸ चालुक्य वंश की एक शाखा दक्षिण भारत में थी‚ जबकि दूसरी शाखा गुजरात में स्थित थी। इसकी राजधानी अन्हिलवाड़ में थी।
▸ गुजरात के चालुक्य वंश के शासकों को अग्निकुण्डीय राजपूत माना जाता है।
▸ मूलराज I चालुक्य वंश का पहला प्रतापी शासक था। उसका उत्तराधिकारी चामुण्डराय था।
▸ चालुक्य शासक भीमराज प्रथम के शासनकाल में 1025 ई. में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर को लूटा था।
▸ भीम प्रथम के सामन्त विमलशाह ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मन्दिर बनवाया।
▸ प्रसिद्ध जैन विद्वान् हेमचन्द्र जयसिंह सिद्धराज के दरबार में था। जयसिंह ने सिद्धपुर में रुद्र महाकाल का मन्दिर बनवाया।
▸ कुमारपाल I चालुक्य वंश का महत्त्वपूर्ण शासक था‚ जिसने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया।
▸ कुमारपाल I के उत्तराधिकारी एवं अन्तिम शासक भीम II के समय 1195 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अन्हिलवाड़ पर आक्रमण कर चालुक्य वंश के शासन को समाप्त कर दिया।

गहड़वाल वंश

▸ प्रतिहार वंश के पतन के बाद कन्नौज पर गहड़वालों का नियन्त्रण हुआ।
चन्द्रदेव गहड़वाल वंश का प्रथम शासक था। इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक गोविन्द चन्द्र था।
▸ गोविन्द चन्द्र के बाद विजयचन्द्र शासक हुआ। उसने लाहौर को जीत लिया था।
जयचन्द गहड़वाल वंश का अन्तिम प्रमुख शासक था। उसकी पुत्री संयोगिता थी।
▸ जयचन्द का बंगाल के सेन शासक लक्ष्मण सेन तथा पृथ्वीराज चौहान के साथ संघर्ष हुआ।
▸ 1194 ई. में चन्दावर के युद्ध में मुहम्मद गोरी ने जयचन्द को पराजित किया। इसके साथ ही कन्नौज पर तुर्कों का अधिकार हो गया।
▸ जयचन्द के दरबार में नैषधचरित एवं खण्डनखाद्य का लेखक श्रीहर्ष रहता था।

चौहान वंश

▸ चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था। वह प्रतिहारों का सामन्त था। पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज ने अजमेर नगर की स्थापना की।
▸ पृथ्वीराज III 1178 ई. में चौहान वंश का शासक बना। उसे राय पिथौरा भी कहा जाता था।
▸ पृथ्वीराज ने चन्देल नरेश परमर्दिदेव को हराया।
▸ गुजरात के शासक भीमदेव II तथा कन्नौज के शासक जयचन्द के साथ पृथ्वीराज III ने संघर्ष किया।
▸ 1191 ई. में तराइन की प्रथम लड़ाई में पृथ्वीराज III ने मुहम्मद गोरी को पराजित किया‚ किन्तु 1192 ई. में मुहम्मद गोरी से पराजित होने के बाद उसे बन्दी बना लिया गया।
▸ चन्दबरदाई पृथ्वीराज III का दरबारी कवि था‚ जिसने पृथ्वीराज रासाे की रचना की।
▸ जयनाक ने पृथ्वीराज विजय नामक संस्कृत काव्य की रचना की। 1192 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चौहानों का दमन कर दिल्ली पर अधिकार स्थापित किया।

चन्देल वंश

▸ चन्देलों को 36 राजपूत राजवंशों में से एक माना जाता है। ये प्रारम्भ में प्रतिहारों के सामन्त थे।
▸ 9वीं शताब्दी में नन्नुक ने चन्देल वंश की स्थापना की।
▸ प्रारम्भिक चन्देल शासक जेज या जयशक्ति के नाम पर ही चन्देल क्षेत्र को जेजाकभुक्ति कहा गया।
▸ यशोवर्मन ने खजुराहो के प्रसिद्ध विष्णुमन्दिर (चतुर्भुज मन्दिर) का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त उसने एक विशाल जलाशय का भी निर्माण करवाया था।
▸ यशोवर्मन का पुत्र धंग (950-1008 ई.) ने महमूद गजनवी के विरुद्ध हिन्दुशाही शासक जयपाल की सहायता के लिए सेना भेजी थी।
▸ धंग एक महान् निर्माता था‚ जिसने खजुराहो में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया।
▸ चन्देल शासक धंग ने अपने अन्तिम समय में प्रयाग के संगम पर अपने जीवन का अन्त कर लिया।
▸ गंड धंग का पुत्र था‚ जिसने कन्नौज के शासक राज्यपाल को पराजित करने के लिए विद्याधर को भेजा।
▸ विद्याधर चन्देल शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। मुसलमान लेखक उसका नाम नन्द तथा विदा नाम से करते हैं।
▸ विद्याधर ने महमूद गजनवी का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया तथा गजनवी को युद्ध में परास्त करने के उपलक्ष्य में कंदरिया महादेव मन्दिर का निर्माण करवाया था।
▸ परमार्दिदेव या मदनवर्मा या परमल (1165-1203 ई.) अन्तिम चन्देल शासक था‚ जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक (1203 ई.) ने पराजित कर कालिंजर पर अधिकार किया।
▸ आल्हा-उदल परमार्दिदेव के दरबार में थे।

परमार वंश

▸ परमार वंश का प्रथम स्वतन्त्र एवं शक्तिशाली शासक सीयक अथवा श्री हर्ष था।
▸ 9वीं शताब्दी में उपेन्द्र कृष्णराज ने मालवा में परमार वंश के शासन की स्थापना की और उज्जैन को राजधानी बनाया।
मुंज प्रसिद्ध परमार शासक था‚ जिसने चालुक्य शासक तैलप II को 7 बार हराया तथा पद्मगुप्त‚ धनंजय‚ धनिक तथा हलायुध जैसे विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। पद्मगुप्त ने नवसाहसांक चरित लिखा।
▸ मुंज ने धार के निकट मुंजसागर झील का निर्माण करवाया।
▸ भोज द्वारा लिखित ग्रन्थों में चिकित्सा शास्त्र पर आयुर्वेद सर्वस्व तथा स्थापत्यशास्त्र पर समरांगणसूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
▸ भोज (1000-1055 ई.) परमार वंश का महान् शासक था। वह एक प्रसिद्ध रचनाकार था। इसने धारा को नई राजधानी बनाया और वहाँ सरस्वती मन्दिर बनवाया।
▸ भोज द्वारा लिखित ग्रन्थों में चिकित्सा शास्त्र पर आयुर्वेदसर्वस्व तथा स्थापत्य शास्त्र पर समरांगण सूत्रधार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
▸ भोज ने धारा में एक भोजशाला महाविद्यालय स्थापित किया एवं वागदेवी की प्रतिमा स्थापित की तथा भोजपुर नगर की स्थापना की।
▸ परमार वंश के अन्तिम शासक महलक देव को अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति आईन-उल-मुल्क ने पराजित किया तथा मालवा को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया।

कलचुरि वंश

▸ कोकल्ल I ने 845 ई. में कलचुरि वंश की स्थापना की। इसकी राजधानी त्रिपूरी थी।
▸ गांगेयदेव विक्रमादित्य (1019-1041 ई.) ने लक्ष्मी शैली के सिक्के चलाए। राजपूत राजाओं में सर्वप्रथम उसी ने स्वर्ण सिक्के चलाए। वह शैव था।
▸ इस वंश का महान शासक कर्णदेव था‚ जिसने कंलिग पर विजय पायी तथा त्रिकालिंगाधिपति उपाधि धारण की। इसने कर्णावती नगर की स्थापना किया। प्रसिद्ध कवि राजशेखर इसकी (कलचुरी) राजसभा में थे।

महत्वपूर्ण तथ्य

ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को ‘म्लेच्छों’ का नाशक बताया गया है।
▸ महिपाल के शासन काल में बगदाद निवासी अल मसूदी गुजरात आया था।
राजशेखर को महेन्द्र पाल प्रथम तथा महिपाल दोनों ने संरक्षण प्रदान किया था।
आइने अकबरी के अनुसार भोज की राजसभा में पाँच सौ विद्वान् थे।
▸ परमारों की कल्याणी के चालुक्यों से शत्रुता का उल्लेख भोज चरित में हुआ है।

दक्षिण भारत

▸ 600 से 1200 ई. के बीच दक्षिण भारत में चोल‚ चालुक्य तथा पल्लव शासकों ने राजनीतिक एकता तथा स्थिरता बनाने का प्रयास किया।
▸ इस दौर में दक्षिण भारत की संस्कृति तथा साहित्य को अत्यधिक विकास का मौका मिला।

चालुक्य वंश (बादामी)

▸ दक्षिण भारत में चालुक्य वंश की स्थापना पुलकेशिन I ने 535-567 ई. में की।
▸ इस वंश की राजधानी वातापी या बदामी में थी।
▸ पुलकेशिन II हर्षवर्द्धन का समकालीन था। उसने हर्ष को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया।
▸ ह्वेनसाँग ने पुलकेशिन II के समय बदामी की यात्रा की थी।
▸ इस वंश का अन्तिम शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय था‚ जिसका तख्ता पलट कर दन्तिदुर्ग ने राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की।

पल्लव वंश

सिंह विष्णु को पल्लव वंश का संस्थापक माना जाता है।
पल्लवों की राजधानी काँचीपुरम थी। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहता था। इन्होंने किरातार्जुनियम की रचना का थी।
▸ महेन्द्रवर्मन I एक सांस्कृतिक शासक था। उसने संस्कृत भाषा में मत्तविलास प्रहसन नामक ग्रन्थ की रचना की। उसने चित्रकला को भी प्रोत्साहित किया।
मत्तविलास प्रहसन में महेन्द्रवर्मन प्रथम ने बौद्ध तथा कापालिकों की हँसी उड़ाई है।
▸ नरसिंहवर्मन प्रथम एक साम्राज्यवादी शासक था। उसने महाबलीपुरम् के एकाश्म रथों का निर्माण करवाया। उसके शासनकाल में ह्वेनसाँग काँची आया था। उसने वातापीकोण्ड की उपाधि धारण की।
▸ नरसिंह वर्मन II ने काँची में कैलाशनाथ मन्दिर तथा महाबलीपुरम का शोर मन्दिर बनवाया। उसके दरबार में दण्डिन रहता था‚ जिसने दशकुमार चरित नामक काव्य ग्रन्थ की रचना की।
▸ नन्दिवर्मन II ने काँची के बैकुण्ठ पेरूमल मन्दिर का निर्माण कराया।

राष्ट´कूट वंश

▸ राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक दन्तिदुर्ग था‚ 752 ई. में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की और मान्यखेत को अपनी राजधानी बनाया। उसने हिरण्यगर्भ यज्ञ किया।
कृष्ण I प्रसिद्ध राष्ट्रकूट शासक था‚ जिसने एलोरा में कैलाशनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया।
▸ ध्रुव तथा गोविन्द III प्रसिद्ध साम्राज्यवादी राष्ट्रकूट शासक थे।
▸ अमोघवर्ष एक जैन अनुयायी था‚ जिसने जैन विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। इसके दरबार में आदिपुराण के लेखक जिनसेन‚ गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य एवं स्वयंभू थे।
▸ अमोघवर्ष ने कविराज मार्ग की रचना कन्नड़ भाषा में की। उसकी एक अन्य रचना प्रश्नोत्तर मल्लिका है।
▸ इन्द्र III प्रसिद्ध राष्ट्रकूट शासक था‚ जिसके शासनकाल में अरबी यात्री अल मसूदी भारत आया। उसने इन्द्र III को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।
▸ कृष्ण III ने चोल शासक को पराजित कर सुदूर दक्षिण भारत पर नियन्त्रण किया।

चोल वंश

▸ 9वीं शताब्दी में चोल शक्ति का पुनरुत्थान विजयालय ने किया। उसने तंजौर को अपनी राजधानी बनाया और नरकेसरी उपाधि धारण की।
▸ चोल शासक परान्तक प्रथम ने श्रीलंका पर हमला किया तथा श्रीलंका के उत्तर-पूर्वी भाग पर आधिपत्य स्थापित किया।
▸ परान्तक प्रथम के उत्तर-मेरुर लेख से चोलों के स्थानीय स्वशासन की जानकारी मिलती है।
▸ चोल शक्ति को प्रतिष्ठित करने का श्रेय राजराज I तथा राजेन्द्र प्रथम को है।
▸ राजराज प्रथम ने श्रीलंका का अभियान किया। उसने तंजौर में राजराजेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया। यह शैव मन्दिर था।
▸ राजराज प्रथम ने शैलेन्द्र शासक श्रीमार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टम में ‘चूड़ामणि’ बौद्ध विहार बनाने की अनुमति दी।
▸ राजेन्द्र प्रथम ने सम्पूर्ण श्रीलंका को जीता तथा अनुराधापुर को श्रीलंका की राजधानी बनाया।
▸ राजेन्द्र प्रथम ने उत्तर भारत का अभियान कर पाल शासक महीपाल को पराजित किया। इस विजय की स्मृति में उसने चोलगंगम झील का निर्माण किया एवं गंगैकोण्डचोलम उपाधि धारण की तथा गंगईकोण्डचोलपुरम नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
▸ चोलवंश का अन्तिम राजा राजेन्द्र III था।
▸ चोल शासकों ने श्रेष्ठ नौ-सेना का निर्माण किया था।
▸ चोलों के प्रशासन की सबसे प्रमुख विशेषता स्थानीय स्वशासन थी। प्रत्येक गाँव 30 वार्डों में बँटा किया जाता था।
▸ चोल साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयाँ क्रमश: राज्य‚ मण्डल‚ बलनाडु‚ नाडु‚ कुर्रम या कोट्टम में विभक्त थी।
▸ अधिकारियों का उच्च वर्ग पेरुन्दनम् एवं निम्न वर्ग सेरुन्दम कहलाता था।
▸ साधारण गाँव ‘उर’ था। ब्रह्मदेव या अग्रहार कर मुक्त गाँव थे‚ जो ब्राह्मणों को दिए जाते थे।
▸ राज्य की आय का मुख्य स्त्रोत भूमि कर था‚ जिसे ग्राम सभा द्वारा वसूला जाता था। भूमि माप की इकाई वेलि थी।
▸ चोल कालीन समाज ब्राह्मण एवं गैर ब्राह्मण में विभक्त था।
▸ चोल शासनकाल में तमिल साहित्य का अत्यधिक विकास हुआ। वेंकट माधव ने ऋग्वेद की टीका लिखी। पुगलेन्दि चोल काल के प्रसिद्ध विद्वान् थे।
▸ चोल काल में काशु या कलंजु सोने के सिक्के थे।
▸ पंप‚ पोन्न एवं रल कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न इसी समय हुए।
▸ कुलोतुंग प्रथम के दरबार में तमिल लेखक जयन्गोदार ने कलिंगतुपर्णि‚ कम्बन ने तमिल रामायण‚ शेक्किलार ने पेरियापुराणम लिखा।
▸ विष्णु के उपासक आलवार एवं शिव के उपासक नयनार कहलाते थे।

चोल मन्दिर

मन्दिर स्थान निर्माता
कोरंगनाथ मन्दिर श्री निवासनल्लूर परान्तक घ्
वृहदेश्वर मन्दिर तंजौर राजराज घ्
गंगैकोण्डचोलपुरम गंगैकोण्डचोलपुरम राजेन्द्र घ्
ऐरावतेश्वर मन्दिर दारासुरम् राजराज घ्घ्
कम्पहरेश्वर मन्दिर त्रिभुवनम् कुलोत्तुंग घ्घ्घ्

चालुक्य वंश (कल्याणी)

▸ कल्याणी के चालुक्यों का इतिहास तैलप II से प्रारम्भ होता है। उसने परमार नरेश मुंज को पराजित किया।
सोमेश्वर I (1043-1068 ई.) ने राजधानी मान्यखेत से कल्याणी स्थानान्तरित की।
▸ सोमेश्वर ने चोलों से निरन्तर पराजय के कारण 1068 ई. में तुंगभद्रा नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली।
▸ विक्रमादित्य VI (1076-1126 ई.) इस वंश का महान् शासक था। उसने वर्ष 1976 में चालुक्य-विक्रम सम्वत् का प्रचलन किया। विक्रमांकदेवचरित का लेखक विल्हण एवं याज्ञवल्क्य स्मृति पर (मिताक्षरा) टीका लिखने वाले विज्ञानेश्वर उसके दरबार में थे।
▸ सोमेश्वर III ने मानसोल्लास नामक शिल्पशास्त्र की रचना की थी।
▸ इस वंश का अंतिम शासक तैल तृतीय का पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ था।

गंग वंश (उड़ीसा)

▸ उड़ीसा में 7वीं-8वीं शताब्दी में गंग राजवंश की स्थापना हुई। इसे ‘चोड गंग’ भी कहा जाता है।
▸ गंग राजवंश के प्रसिद्ध शासक नरसिंह देव वर्मन ने प्रसिद्ध कोणार्क के सूर्य मन्दिर निर्माण करवाया।
▸ अनन्तवर्मन अन्य प्रसिद्ध गंग शासक था‚ जिसने पुरी में जगन्नाथ मन्दिर निर्मित करवाया।
▸ गंग शासकों के बाद उड़ीसा में केसरी वंश का शासन आरम्भ हुआ। भुवनेश्वर का प्रसिद्ध लिंगराज मन्दिर केसरी शासकों द्वारा निर्मित कराया गया था।

होयसल वंश (द्वारसमुद्र)

▸ द्वारसमुद्र के होयसल वंश की स्थापना विष्णुवर्द्धन ने की। उसने बेलूर में चेन्नाकेशव मन्दिर का निर्माण कराया। यह यादव वंश की एक शाखा थी।
▸ होयसल वंश का अन्तिम शासक वीर बल्लाल III था‚ जिसे मलिक काफूर ने हराया था।

यादव वंश (देवगिरि)

▸ देवगिरि के यादव वंश की स्थापना भिल्लम पंचम (1187-1191 ई.) ने की। इसकी राजधानी देवगिरि थी। इस वंश का प्रतापी राजा सिंहण था।
▸ इस वंश का अन्तिम शासक रामचन्द्र था‚ जिसे मलिक काफूर (अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति) ने हराकर दक्षिण में सल्तनत का विस्तार किया।

अन्य राजवंश और शासक

वंश राजधानी संस्थापक प्रसिद्ध शासक अन्य सुविधाओं
पलास (पूर्वी भारत) पाटलिपुत्र, गौर गोपाल धर्म पाल ने नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित किया और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसने भोज (प्रतिहार) अमोघवर्ष (राष्ट्रकूट) को हराया और कन्नौज जीता। देवपाल ने उड़ीसा और असम जीता। राजेन्द्र चोल ने महिकला को हराया। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ कारोबार किया और बंगाल में सेना द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
गुर्जर प्रतिहार (SW राजस्थान) (733-1019 ई।) 1. जोधपुर
2. मालवा
हरिचंद्र मिहिर भोज उन्होंने भगवान विष्णु की पूजा की और आदि वराह की उपाधि धारण की । इनकी उत्पत्ति राजस्थान के गीतां क्षेत्र में हुई।
वाकाटक (दक्कन और मध्य भारत) वत्सगुमाला, पौनार विंध्यशक्ति प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञ किए । चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी बेटी प्रभाती का विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन से किया।
का पूर्वी गंगा ओडिशा कलिंगनगर, कटक अनंतवर्मन चोडगाँव देवा नरसीमा देव प्रथम ने कोणार्क में सूर्य मंदिर का निर्माण कराया । अनंतवर्मन ने पुरी में जगन्नाथ मंदिर बनवाया।
पश्चिमी गंगा (ईस्वी सन् 350-999) कोलार, तलाकल कोंगनिवर्मन माधव दुनवतीता श्रवणबेलगोला में जैन स्मारकों का निर्माण किया।
बंगाल का सेनस विक्रमपुरा, विजयपुरा विजयसेन बैलसेना लक्ष्मणसेन उन्हें देव वंश द्वारा उखाड़ फेंका गया।
होयसला द्वारसमुद्र विष्णु वर्धन वीरा बल्लाल ने चालुक्य शासक सोमेश्वर चतुर्थ को हराया। होयसला कला और वास्तुकला उच्च स्तर का था। होयसला मंदिर की मिनट नक्काशी उनकी सबसे आकर्षक विशेषता है।
राष्ट्रकूट (750-1142 ई।) मानकीत या मलखेड दन्तिदुर्ग (पहले बादामी के चालुक्य थे) अमोघवर्ष की तुलना विक्रमादित्य से की जाती है, जो वर्णों के पुरुषों को संरक्षण देते हैं। उन्होंने इस्ट कन्नड पोएट्री, कवि राजमर्ग लिखी और प्रंशोतार मल्लिका भी लिखी। कृष्ण द्वितीय ने द्रविड़ियन सीट में एलोरा में कैलाश मंदिर का निर्माण किया। कृष्ण तृतीय ने विजय का स्तंभ और रामेश्वरम में एक मंदिर स्थापित किया। राष्ट्रकूट को एलीफेंटा के गुफा मंदिर के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। यह महेश और (त्रिमूर्ति) को भारत की सबसे भव्य कला कृतियों में गिना जाता है।
पल्लव (टोंडनाडू की (560-903 ईस्वी सन्) कांची सिमविष्णु नरसिंहवर्मन-प्रथम (६३०-६६ayan ई।) ने वटापी में चालुक्यन की राजधानी पर कब्जा कर लिया और वतापीकोंडा की उपाधि धारण की। वे रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी हिंदू थे। चालुक्य और पल्लव दोनों ने कृष्ण और तुंगभद्रा के बीच भूमि पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की।
का चालुक्य बादामी वतापी (बादामी) पुलकेशिन प्रथम पुलकेशिन- II वह हर्ष का समकालीन था और दक्खन को जीतने में हर्ष की जाँच करने में सक्षम था, लेकिन पल्लव शासक नरसिंहवर्मन-प्रथम द्वारा पराजित और मारा गया। चीनी तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग ने अपने राज्य का दौरा किया। चालुक्य कला के दौरान अजंता और एलोरा की गुफाओं की कई पेंटिंग और मूर्तियां डेक्कन या वेसारा शैली में विकसित की गईं। उन्होंने पत्थर के निर्माण की कला को सिद्ध किया, वह पत्थर है जो अंत में मोर्टार के बिना जुड़ जाता है।
का चालुक्य कल्याणी कल्याणी तिलाप II (परमार राजा मुंज को हराया) कोईवारा प्रथम (1043-1068 ई।) उन्होंने राजधानी को मान्याखेत से कल्याणी में स्थानांतरित कर दिया। विक्रमादित्य IV (1070-1126 ई।) उन्होंने चालुक्य- विक्रम युग की शुरुआत की। याज्ञवल्क्य स्मृति में विक्रमदेवचरित और मिताक्षरा के लेखक बिल्हण ने विक्रमादित्य चतुर्थ के दरबार को सुशोभित किया।
यादवों देवगिरी भिल्लाना रामचंद्र रामचंद्र को मलिक काफूर ने हराया था।

प्राचीन भारत के कुछ महत्वपूर्ण मंदिर

जगन्नाथ मंदिर, पुरी नरसिंहदेव गंगा
कोणार्क का सूर्य मंदिर यशो वर्मन गंगा
कंदरिया और महादेव मंदिर, खजुराहो कृष्णा- I चंदेल
एलोरा का कैलाश मंदिर कृष्णा- I राष्ट्रकुट
एलीफेंटा नरसिंह वर्मन- I राष्ट्रकुट
मामल्लपुरम मंदिर नरसिंह वर्मन- II पल्लव
कांची का कैलाशनाथ मंदिर नरसिंह वर्मन- II पल्लव
कांची का बैकुंठ पेरुमल मंदिर नरसिंह वर्मन- II पल्लव
दिलवाड़ा का जैन मंदिर विमला सोलंकी शासक के मंत्री

Leave a comment