पाँ च बरस की मेरी छोटी लड़की मिनी थी, उससे क्षण भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में जन्म लेने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक साल लगाया था। उसके बाद से, जब तक वह जागती रहती है, उस समय का एक भी पल वह खामोश रहकर नष्ट नहीं करती। उसकी माँ कभी-कभी धमकाकर उसका मुँह बंद करा देती, पर फिर भी मैं ऐसा नहीं कर पाता। मिनी अगर खामोश रहे तो वह ऐसी अजीब सी लगती है कि मुझसे उसकी खामोशी ज्यादा देर तक सही नहीं जाती। सही कारण यही है कि उसके साथ मेरी बातचीत कुछ अधिक उत्साह के साथ चलती है

सवेरे मैं अपने उपन्यास का सत्रहवाँ अध्याय लिखने ही जा रहा था कि मिनी ने आकर कहना शुरू कर दिया, “बाबू, रामदयाल दरबान काका को कौवा कह रहा था। वह कुछ नहीं जानता। है न बाबा।”। विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के बारे में मैं उसे कुछ ज्ञान देने वाला ही था कि उसने दूसरी बात छेड़ दी, “सुनो बाबू, भोला कह रहा था कि आसमान से हाथी सूँड़ से पानी बिखेरता है, तभी बारिश होती है। ओ माँ! भोला झूठमूठ ही इतना बोलता है। बस बोलता ही रहता है, दिन-रात बोलता रहता है, बाबू।”। इस बारे में मेरी राय के लिए जरा सा भी इंतजार किए बिना वह चट से पूछ बैठी, “क्यों बाबू, अम्मा तुम्हारी कौन लगती है?”। मैंने मन-ही-मन कहा, ‘साली’ और मुँह से कहा, “मिनी, तू जा, जाकर भोला के साथ खेल। मुझे अभी बहुत काम करना है।”। वह मेरी लिखने की मेज के पास मेरे पैरों के निकट बैठ गई और दोनों घुटने और हाथ हिला-हिलाकर, फुरती से मुँह चलाते हुए रटने लगी, “आगडुम-बगडुम घोड़ा डुम साजे।” उस समय मेरे उपन्यास के सत्रहवें अध्याय में प्रतापसिंह कंचनमाला को लेकर अँधेरी रात में कारागार की ऊँची खिड़की से नीचे नदी के पानी में कूद रहे थे

। मेरा करा सड़क के किनारे था। यकायक मिनी अक्को-बक्को तीन तिलक्को खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़कर गई और जोर से पुकारने लगी, “काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला!”। गंदे से, ढीले से कपड़े पहने, सिर पर पगड़ी बाँधे, कंधे पर झोली लटकाए और हाथ में अंगूर की दो-चार पेटियाँ लिये एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देखकर मेरी बिटिया रानी के मन में कैसे भाव जगे होंगे, यह बताना टेढ़ी खीर है, पर वह जोर-जोर से उसे पुकार रही थी। मैंने सोचा, अभी कंधे पर झोली लटकाए एक आफत मेरे सिर पर आ सवार होगी और मेरा सत्रहवाँ अध्याय खत्म होने से रह जाएगा

लेकिन मिनी की पुकार पर, जैसे ही काबुली ने हँसकर अपना चेहरा घुमाया और मेरे घर की ओर आने लगा, वैसे ही मिनी जान छुड़ाकर अंदर की ओर भागी और गायब हो गई। उसके मन में एक अंधविश्वास सा जम गया था कि झोली ढूँढ़ने पर मिनी जैसे और भी दो-चार जीवित इनसान मिल सकते हैं

काबुली ने आकर हँसते हुए सलाम किया और खड़ा रहा। मैंने सोचा, हालाँकि प्रतापसिंह और कंचनमाला दोनों की दशा बड़ी मुसीबत में है, फिर भी इस आदमी को घर बुलाकर कुछ न खरीदना ठीक नहीं होगा

कुछ चीजें खरीदीं। उसके बाद इधर-उधर की चर्चा भी होने लगी। अब्दुल रहमान से रूस, अंग्रेज, सरहदी रक्षा-नीति पर बातें होती रहीं

अंत में उठते समय उसने पूछा, “बाबूजी, तुम्हारी लड़की कहाँ गई?”। मिनी के मन से बेकार का डर दूर करने के इरादे से उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे सटकर खड़ी हो गई। संदेह भरी नजरों से वह काबुली का चेहरा और उसकी झोली की ओर देखती रही। काबुली ने झोली से किशमिश और खुबानी निकालकर देना चाहा, पर उसने किसी तरह से नहीं लिया। दुगुने डर से वह मेरे घुटनों से चिपकी रही। पहला परिचय कुछ इसी तरह हुआ

कुछ दिनों के बाद एक सवेरे किसी आवश्यक काम से घर के बाहर निकला तो देखा, मेरी बिटिया दरवाजे के पास बेंच पर बैठी बेहिचक बातें कर रही है। काबुली उसके पैरों के पास मुसकराता हुआ सुन रहा है और बीच-बीच में प्रंग के अनुसार अपनी राय भी खिचड़ी भाषा में जाहिर कर रहा है। मिनी के पाँच साल की उम्र के अनुभव में बाबू के अलावा ऐसा धैर्य रखनेवाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। फिर देखा, उसका छोटा सा आँचल बादाम-किशमिश से भरा हुआ है। मैंने काबुली से कहा, “इसे सब क्यों दिया? ऐसा मत करना।” इतना कहकर जेब से एक अठन्नी निकालकर मैंने उसे दे दी। उसने बेझिझक अठन्नी लेकर झोली में डाल ली

घर लौटकर मैंने देखा, उस अठन्नी को लेकर बड़ा हो-हल्ला शुरू हो चुका था

मिनी की माँ एक सफेद चमचमाता गोलाकार पदार्थ हाथ में लेकर डाँटकर मिनी से पूछ रही थी, “तुझे अठन्नी कहाँ से मिली?”। मिनी ने कहा, “काबुलीवाला ने दी है।”। उसकी माँ बोली, “काबुलीवाला से तूने अठन्नी ली ही क्यों?”। मिनी रुआँसी होकर बोली, “मैंने माँगी नहीं, उसने खुद ही दी।”। मैंने आकर मिनी को उस पास खड़ी मुसीबत से बचाया और बाहर ले आया

पता चला कि काबुली के साथ मिनी की यह दूसरी मुलाकात ही हो, ऐसी बात भी नहीं। इस बीच वह रोज आता रहा और पिस्ता-बादाम की रिश्वत देकर मिनी के मासूम लोभी हृदय पर काफी अधिकार जमा लिया

इन दोनों मित्रों में कुछ बँधी-बँधाई बातें और परिहास होता रहा, जैसे रहमान को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई उससे पूछती, “काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला! तुम्हारी झोली में क्या है?”। रहमान बेमतलब नकियाते हुए जवाब देता, “हाथी।”। यानि उसकी झोली के भीतर हाथी है, यही उनके मजाक का सूक्ष्म सा अर्थ था। अर्थ बहुत ही सूक्ष्म हो, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी इस मजाक में दोनों को बड़ा मजा आता। सर्दियों की भोर में एक सयाने और एक कम-उम्र बच्ची की सरल हँसी मुझे भी बड़ी अच्छी लगती

उन दोनों में एक बात और चल रही थी। रहमान मिनी से कहता, “खोखी, तू कभी ससुराल मत जाना, हाँ!”। बंगाली परिवार की लड़कियाँ बचपन से ही ससुराल शब्द की जानकार हो जाती हैं, लेकिन हम लोगों ने थोड़ा आधुनिक होने के कारण मासूम बच्ची को ससुराल के बारे में सचेत नहीं किया था। इसलिए रहमान की बातों का मतलब वह साफ-साफ नहीं समझ पाती थी, लेकिन बात का कोई जवाब दिए बिना चुप रह जाना उसकी आदत के बिलकुल खिलाफ था। वह पलटकर रहमान से पूछ बैठती, “तुम ससुराल जाओगे?”। रहमान काल्पनिक ससुर के प्रति अपना बहुत बड़ा घूँसा तानकर कहता, “हम ससुर को बहुत मारेगा।”। यह सुनकर मिनी ससुर नाम के किसी अजनबी प्राणी की दुर्दशा की कल्पना कर खूब हँसती

। सर्दियों के सुहावने दिन थे। पुराने जमाने में इसी समय राजा लोग दिग्विजय के लिए निकलते थे। मैं कलकत्ता छोड़कर कहीं नहीं गया। शायद इसीलिए मेरा मन दुनिया भर में घूमा करता है, जैसे मैं अपने घर के ही कोने में हमेशा से बसा हुआ हूँ। बाहर की दुनिया के लिए मेरा मन हमेशा बेचैन रहता है। किसी देश का नाम सुनते ही मन वहीं दौड़ पड़ता है। किसी विदेशी को देखते ही मेरा मन फौरन नदी, पहाड़, जंगल के बीच एक कुटिया का दृश्य देख रहा होता है। उल्लास से भरे स्वतंत्र जीवन का एक चित्र कल्पना में जाग उठता है

इधर मैं भी इतना सुस्त प्रकृति यानि कुन्ना किस्म का हूँ कि अपना घर छोड़कर जरा बाहर निकलने में ही कटु अनुभव होने लगता है। इसीलिए सवेरे अपने छोटे कमरे में मेज के सामने बैठकर काबुली से गप्पें लड़ाकर बहुत कुछ सैर-सपाटे का उद्देश्य पूरा कर लिया करता हूँ। दोनों ओर ऊबड़-खाबड़, दुर्गम, जले हुए, लाल-लाल ऊँचे पहाड़ों की माला, बीच में पतले रेगिस्तानी रास्ते और उन पर मुसाफिरों से लदे ऊँटों के काफिले चले जा रहे हैं। किसी के हाथ में बरछी है तो किसी के हाथ में पुराने जमाने की चकमक पत्थर से दागी जाने वाली बंदूक। काबुली अपने बादल-गर्जन से स्वर में, खिचड़ी भाषा में अपने वतन के बारे में सुनाता रहता और यह चित्र मेरी आँखों के सामने काफिलों के समान गुजरता चला जाता

मिनी की माँ बड़ी ही वहमी आदत की है। रास्ते पर कोई आहट होते ही उसे लगता कि दुनिया भर के शराबी मतवाले हमारे ही घर की ओर भागते चले आ रहे हैं। यह दुनिया हर कहीं चोर-डाकू, शराबी, साँप, बाघ, मलेरिया, सुअरों, तिलचट्टों और गोरों से भरी हुई है, यही उसका खयाल है। इतने दिनों से (हालाँकि बहुत ज्यादा दिन नहीं) दुनिया में रहने के बावजूद उसके मन से यह भय दूर नहीं हुआ

खासतौर से रहमान काबुली के बारे में वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी। उस पर खास नजर रखने के लिए वह मुझसे बार-बार प्रार्थना करती थी। मैं उसके संदेह को हँसकर उड़ा देने की कोशिश करता तो वह मुझसे एक-एक कर कई सवाल पूछ बैठती, “क्या कभी किसी का लड़का चुराया नहीं गया? क्या काबुल में गुलामी-प्रथा अभी भी चालू नहीं है? एक लंबे-चौड़े काबुली के लिए, क्या एक छोटे से बच्चे को चुराकर ले जाना बिलकुल मामूली सी बात है?”। । मुझे मानना पड़ा कि यह बात बिलकुल असंभव तो नहीं, पर यकीन योग्य भी नहीं है। विश्वास करने की शक्ति हरेक में समान नहीं होती, इसीलिए मेरी पत्नी के मन में डर बना ही रह गया। लेकिन सिर्फ इसीलिए बिना किसी दोष के रहमान को अपने घर में आने से मैं मना नहीं कर सका

हर साल माघ के महीने में रहमान अपने देश चला जाता है। इस समय वह अपने रुपयों की वसूली में बुरी तरह फँसा रहता है। घर-घर दौड़ना पड़ता है, फिर भी वह एक बार मिनी से आकर मिल ही जाता है। देखने में लगता है, जैसे दोनों में कोई साजिश चल रही हो। जिस दिन सवेरे नहीं आ पाता, उस दिन देखता हूँ कि वह शाम को जरूर आता है। अँधेरे कमरे के कोने में उस ढीला-ढाला कुरता-पायजामा पहने झोली-झिंगोली वाले लंबे-तड़ंगे आदमी को देखकर सचमुच मन में अचानक एक भय सा लगता है। लेकिन जब मैं देखता हूँ कि मिनी ‘काबुलीवाला, काबुलीवाला’ कहकर हँसते-हँसते दौड़ती चली आती और अलग-अलग उम्र के दो मित्रों में पुराना सहज मजाक चलने लगता है, तो मेरा हृदय खुशी से भर उठता

एक दिन सवेरे मैं अपने छोटे कमरे में बैठा अपनी किताब के प्रूफ देख रहा था। सर्दियों के दिन खत्म होने से पहले, आज दो-तीन दिन से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। चारों ओर सभी दाँत किटकिटा रहे थे। खिड़कियों के रास्ते धूप आकर मेज के नीचे मेरे पैरों पर पड़ रही थी। यह धूप मुझे बड़ी सुहावनी लग रही थी। सुबह के करीब आठ बजे होंगे। गुलबंद लपेटे सवेरे सैर को निकलने वाले लोग अपनी सैर समाप्त कर घर लौट रहे थे। इसी वक्त सड़क पर बड़ा शोरगुल सुनाई पड़ा

देखा, हमारे रहमान को दो सिपाही बाँधे चले आ रहे हैं और उसके पीछे-पीछे तमाशबीन लड़कों का झुंड चला आ रहा है। रहमान के कपड़ों पर खून के दाग हैं और एक सिपाही के हाथ में खून से रँगा हुआ छुरा है। मैंने दरवाजे से बाहर जाकर सिपाहियों से पूछा कि मामला क्या है?। कुछ उस सिपाही से और कुछ रहमान से सुना कि हमारे पड़ोस में एक आदमी ने रहमान से उधार में एक रामपुरी चादर खरीदी थी। कुछ रुपए अब भी उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से वह साफ मुकर गया। इसी पर बहस होते-होते रहमान ने उसे छुरा भोंक दिया

रहमान उस झूठे आदमी के प्रति तरह-तरह की गंदी गालियाँ बक रहा था कि इतने में ‘काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला’ पुकारती हुई मिनी घर से निकल गई

क्षण भर में रहमान का चेहरा उगलती आग को त्यागकर उजली हँसी से खिल उठा। उसके कंधे पर आज झोली नहीं थी, इसलिए झोली के बारे में दोनों मित्रों की पुरानी बहस न छिड़ सकी। मिनी आते ही एकाएक उससे पूछ बैठी, “तुम ससुराल जाओगे?”। रहमान ने हँसकर कहा, “वहीं तो जा रहा हूँ।”। उसे लगा, उसके इस जवाब से मिनी मुसकराई नहीं। तब उसने हाथ दिखाते हुए कहा, “ससुर को मारता, पर करूँ क्या, हाथ बँधे हैं।”। संगीन चोट पहुँचाने के जुर्म में रहमान को कई वर्ष की कैद की सजा हो गई

उसके बारे में मैं धीरे-धीरे भूल ही गया। हम लोग जब अपने-अपने घरों में रोजाना के कामों में लगे हुए आराम से दिन गुजार रहे थे, तब पहाड़ों पर आजाद घूमने वाला आदमी जेल की दीवारों में कैसे साल-पर-साल गुजार रहा होगा, यह बात कभी हमारे मन में नहीं आई

चंचल-हृदयी मिनी का बरताव तो और भी शर्मनाक था, यह बात उसके बाप को भी माननी पड़ी। उसने बड़े ही बेलौस ढंग से अपने पुराने मित्र को भुलाकर पहले तो नबी सईस के साथ दोस्ती कर ली, फिर धीरे-धीरे जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगी, वैसे-वैसे दोस्तों के बदले एक-के-बाद एक सहेलियाँ जुटने लगीं। यहाँ तक कि अब यह अपने बाबू के लिखने के कमरे में भी नहीं दिखलाई देती। मैंने भी एक तरह से उसके साथ कुट्टी कर ली थी

। काफी साल बीत गए। फिर शरद ऋतु का मौसम आ गया। मेरी मिनी की शादी तय हो गई। दुर्गा पूजा की छुट्टी में ही ब्याह हो जाएगा। कैलाशवासिनी पार्वती के साथ-साथ मेरे घर की आनंदमयी भी पिता का घर अँधेरा कर पति के घर चली जाएगी

बड़े ही मन लुभाने वाले ढंग से आज सवेरे सूर्योदय हुआ है। बरसात के बाद सरदियों की नई धुली हुई धूप ने जैसे सुहागे में गलाए हुए साफ और खरे सोने का रंग अपना लिया है। कलकत्ता के गलियारों में आपस में सटी हुई ईंटों वाली गंदी इमारतों पर भी इस सूर्य की चमक ने एक अनोखी सुंदरता बिखेर दी है

हमारे घर पर सवेरा होने से पहले से ही शहनाई बज रही है। मुझे लग रहा है, जैसे वह शहनाई मेरे हृदय में पसलियों के भीतर रोती हुई बज रही है। उसका करुण भैरवी राग जैसे मेरे सामने खड़ी बिछोह की पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ दुनिया भर में फैलाए दे रहा हो। आज मेरी मिनी का ब्याह है

आज सवेरे से ही बड़ी चहल-पहल और लोगों का आना-जाना शुरू हो गया। आँगन में बाँस बाँधकर शामियाना लगाया रहा है, मकान के कमरों में और बरामदे पर झाड़ लटकाए जाने की टन-टन सुनाई पड़ रही है। हाय-हुल्ला का तो कोई अंत ही नहीं

मैं अपने पढ़ने-लिखने वाले कमरे में बैठा खर्च का हिसाब लिख रहा था कि रहमान आकर सलाम करते हुए खड़ा हो गया

शुरू में तो उसे पहचान ही न सका। उसके पास वह झोली नहीं थी। उसके वे लंबे पट्टेदार बाल नहीं थे और न चेहरे पर चमक थी। आखिर में मैं उसकी मुसकराहट देखकर उसे पहचान गया

“क्यों रहमान, कब आए?” मैंने पूछा

उसने कहा, “कल शाम ही जेल से छूटा हूँ।”। यह बात मेरे कानों में जैसे जोर से टकराई। अब से पहले किसी खूनी को मैंने कभी अपनी आँखों से नहीं देखा था। इसे देखकर मेरा सारा मन विचलित सा हो गया। मेरी इच्छा होने लगी कि आज इस शुभ दिन पर यह व्यक्ति यहाँ से चला जाए तो बहुत अच्छा हो

मैंने उससे कहा, “आज हमारे यहाँ एक जरूरी काम है। मैं उसी में लगा हुआ हूँ, आज तुम जाओ।”। मेरी बात सुनते ही, वह उसी क्षण जाने को तैयार हुआ, लेकिन फिर दरवाजे के पास जा खड़ा हुआ और कुछ संकोच से भरकर बोला, “एक बार खोखी को देख नहीं सकता क्या?”। शायद उसके मन में यही विश्वास था कि मिनी अभी तक वैसी ही बनी हुई है। या उसने सोचा था कि मिनी आज भी वैसे ही पहले की तरह ‘काबुलीवाला, काबुलीवाला’ पुकारती भागती हुई आ जाएगी और उसकी हँसी भरी अनोखी बातों में किसी तरह का कोई फर्क नहीं आएगा। यहाँ तक कि पहले की दोस्ती की याद कर वह एक पेटी अंगूर और कागज के दोने में थोड़ा किशमिश-बादाम शायद किसी अपने वतनी दोस्त से माँग-मूँगकर ले आया था। उसकी पहली वाली झोली उसके पास नहीं थी

। मैंने कहा, “आज घर पर काम है। आज किसी से मुलाकात न हो सकेगी।”। वह कुछ उदास सा हो गया। वह खामोश मेरी ओर एकटक देखता रहा, फिर ‘सलाम बाबू’ कहकर दरवाजे से बाहर निकल गया

मेरे हृदय में एक दर्द की टीस सी उठी। सोच रहा था कि उसे बुला लूँ, फिर देखा, वह खुद ही चला आ रहा है

नजदीक आकर उसने कहा, “यह अंगूर, किशमिश और बादाम खोखी के लिए ले आया हूँ, उसको दे दीजिएगा।”। सब लेकर मैंने दाम देना चाहा, तो उसने एकदम मेरा हाथ पकड़ लिया, कहा, “आपकी बड़ी मेहरबानी है बाबू, हमेशा याद रहेगी। इसका मुझे पैसा न दें। बाबू, जैसी तुम्हारी लड़की है, वैसी मेरी भी एक लड़की मेरे देश में है। मैं उसकी याद कर तुम्हारी खोखी के लिए थोड़ा सा मेवा हाथ में लिए चला आता था। मैं यहाँ अब कोई सौदा बेचने नहीं आया।”। इतना कहकर उसने अपने ढीले-ढाले कुरते के अंदर हाथ डालकर एक मैला सा कागज निकाला और बड़े प्यार से उसकी तहें खोलकर दोनों हाथ से उसे मेज पर फैला दिया

मैंने देखा, कागज पर एक नन्हे से हाथ के पंजे की छाप है। फोटो नहीं, तेल चित्र नहीं, सिर्फ हथेली में थोड़ी सी कालिख लगाकर उसी का निशान ले लिया गया है। बेटी की इस नन्ही सी याद को छाती से लगाए रहमान हर साल कलकत्ता की गलियों में मेवा बेचने आता था, जैसे उस नाजुक नन्हे हाथ का स्पर्श उसके विछोह से भरे चौड़े सीने में अमृत घोलता रहता था

देखकर मेरी आँखें भर आईं, फिर मैं यह भूल गया कि वह एक काबुली मेवावाला है और मैं किसी ऊँचे घराने का बंगाली। तब मैं यह अनुभव करने लगा कि जो वह है, वही मैं भी हूँ, वह भी बाप है और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी नन्ही पार्वती के हाथ की निशानी ने ही मेरी मिनी की याद दिला दी। मैंने उसी समय मिनी को बाहर बुलवाया। घर में इस पर कड़ी आपत्ति की गई, पर मैंने एक न सुनी। ब्याह की लाल बनारसी साड़ी पहने, माथे पर चंदन की अल्पना सजाए दुलहन बनी मिनी शरम से भरी मेरे पास आकर खड़ी हो गई

उसे देखकर काबुली पहले तो सकपका सा गया, अपनी पुरानी बातें अबकी बार दोहरा न सका। अंत में हँसकर बोला, “खोखी, तुम ससुराल जाओगी?”। मिनी अब ससुराल शब्द का मतलब अच्छी तरह समझती है। उससे पहले की तरह जवाब देते न बना। रहमान का सवाल सुनकर शरम से लाल हो, मुँह फेरकर खड़ी हो गई। काबुली से मिनी के पहले दिन की मुलाकात मुझे याद आ गई। मन न जाने कैसी वेदना से भर उठा

मिनी के चले जाने के बाद एक लंबी साँस लेकर रहमान वहीं जमीन पर बैठ गया। अचानक उसके मन में एक बात साफ हो गई कि उसकी लड़की भी इस बीच इतनी ही बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे नए ढंग से बातचीत करनी पड़ेगी। वह उसे फिर से पहले वाले रूप में नहीं पाएगा। इन आठ वर्षों में न जाने उसका क्या हुआ होगा। सवेरे के वक्त सर्दियों की सुहावनी कोमल धूप में शहनाई बजने लगी और कलकत्ता की एक गली में बैठा हुआ रहमान अफगानिस्तान के मेरू पर्वतों का दृश्य देखने लगा

मैंने उसे एक बड़ा नोट निकालकर दिया, कहा, “रहमान, तुम अपने देश अपनी बेटी के पास जाओ। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी का कल्याण होगा।”। यह रुपया दान करने के पश्चात् मुझे विवाहोत्सव की दो-चार चीजें कम कर देनी पड़ीं। मन में जैसी इच्छा थी, उस तरह रोशनी नहीं कर सका। किले का अंग्रेजी बैंड भी नहीं मँगा पाया। घर में औरतें बड़ा असंतोष प्रकट करने लगीं, लेकिन मंगल-ज्योति से मेरा यह शुभ समारोह उज्ज्वल हो उठा

।

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