जि जस कमरे के अंदर हम तीनों बचपन के साथी सोते थे, उसके बराबर के कमरे की दीवार पर एक नर-कंकाल टँगा हुआ था। रात को हवा से उसकी हड्डियाँ खड़खड़ाया करती थीं। हमें उन हड्डियों को दिन के वक्त में हिलाना पड़ता था। कारण था, हम लोग तब पंडितजी से ‘मेघनाद-वध’ काव्य तथा कैंबेल स्कूल के एक विद्यार्थी से हड्डियों की विद्या पढ़ा करते थे। हमारे बुजुर्ग चाहते थे कि हम लोग एकाएक सारी विद्याओं को दिमाग में उतार डालें। उनका वह लक्ष्य कहाँ तक पूरा हुआ, यह बात जो हम जानते हैं, उनके सामने प्रकट करना बेकार की बात है, और जो नहीं जानते, उनसे छिपा जाना ही अच्छा है

उसके बाद बहुत समय गुजर चुका था। इस बीच में उस घर से कंकाल और हम लोगों के मस्तिष्क से हड्डियों की विद्या निकलकर न जाने कहाँ चली गई, कुछ पता नहीं लग सका

थोड़े दिन पहले एक रोज रात को, किसी कारण से और कही जगह न मिलने से उसी कमरे में सोना पड़ा, जिसमें किसी जमाने में कंकाल टँगा था। आदत न होने की वजह से मुझे नींद नहीं आई। करवट बदलते-बदलते गिरजा की घड़ी में बड़े-बड़े घंटे लगभग सभी बज गए। इतने में, घर के एक कोने में जो तेल का चिराग जल रहा था, वह भी पाँच-एक मिनट बुत-बुत करके बिलकुल बुझ गया। इसके कुछ पहले हमारे घर में दो-एक मौतें हो चुकी थीं। इसी से इस दीये के बुझते ही मौत की याद आ गई। पता चला, यह जो आधी रात के समय एक दीये की लौ घने अँधेरे में बिला गई, प्रकृति के लिए जैसी यह है वैसी मनुष्य की छोटी-छोटी प्राणशिखाएँ हैं, जो कभी दिन में कभी रात में अचानक बुझकर हमारी याद से हमेशा के लिए मिट जाती हैं

क्रमशः उस कंकाल की बात याद आ गई। उसकी जीवित हालत के विषय में कल्पना करते-करते सहसा ऐसा अहसास हुआ जैसे कोई चेतन पदार्थ अँधेरे में घर में दीवार टटोलता हुआ मेरी मसहरी के चारों ओर घूम रहा हो। उसकी गहरी साँस खुद मुझे साफ-साफ सुनाई देने लगी। ऐसा लगा जैसे वह कोई खोई हुई चीज ढूँढ़ रहा हो। मैंने निश्चित समझ लिया कि यह सबकुछ मेरे नींद से दूर गरमाए हुए मस्तिष्क की कल्पना है और मेरे ही माथे में भन्नाता हुआ जो खून दौड़ रहा है, वही पैरों की आहट की आवाज पैदा कर रहा है। किंतु फिर भी, भय के मारे रोंगटे खड़े हो उठे। इस व्यर्थ के डर को जबरदस्ती दूर करने के इरादे से मैं बोल उठा, “कौन है?”। पाँवों की आहट चलती हुई मेरी मसहरी के पास आकर थम गई, और एक जवाब सुनाई पड़ा, “मैं हूँ। मेरा वह कंकाल कहाँ गया, उसे खोजने आई हूँ।”। मैंने सोचा कि अपनी काल्पनिक रचना के आगे डरना-डराना कुछ मायने नहीं रखता और गावतकिये से जोर से चिपटकर मैंने हमेशा के परिचित की तरह सहज स्वर में कहा, “वाह! आधी रात के वक्त काम तो खूब ढूँढ़ निकाला है! अब उस कंकाल से तुम्हें मतलब?”। अँधेरे में मसहरी के बहुत ही निकट आकर उसने कहा, “खूब कहा! अरे, मेरी छाती की हड्डियाँ तो उसी में थीं। मेरा छब्बीस साल का यौवन तो उसी के चारों तरफ फूल की तरह खिला हुआ था। फिर अब उसको एक बार देखने की तबीयत नहीं होती?”। मैंने उसी समय कहा, “हाँ, बात तो ठीक है। तो तुम ढूँढ़ो, जाओ, मैं जरा सोने की कोशिश करूँ।”। उसने कहा, “तुम अकेले ही हो, क्यों? तो जरा बैठ जाऊँ। आज जरा गपशप होने दो। आज से पैंतीस वर्ष पहले मैं भी आदमियों के पास बैठकर आदमियों की तरह की गपशप किया करती थी। ये पैंतीस वर्ष मैंने सिर्फ श्मशान की वीरान हवा में हू-हू करते हुए बिताए हैं। आज तुम्हारे निकट बैठकर और एक बार आदमियों की तरह गपशप कर लूँ।”। मुझे ऐसा लगा जैसे वह मसहरी के समीप आकर बैठ गई, और कोई चारा न देख मैंने जरा उत्साह के साथ ही कहा, “हाँ, यह ठीक है। ऐसा कोई किस्सा छेड़ो, जिससे तबीयत खुश हो जाए।”। उसने कहा, “सबसे बढ़कर मजे का किस्सा सुनना चाहते हो तो मैं अपनी जीवन की कहानी सुनाती हूँ, सुनो।”। गिरजाघर की घंटी में टन-टन दो बजे। वह कहने लगी, “जब मैं इनसान थी और छोटी थी, तब एक व्यक्ति से मैं यम की तरह डरती थी। वे थे मेरे पति। मछली को काँटे में फँसा लेने पर वह जैसे फड़फड़ाती है, मैं भी वैसे ही कुछ तड़पती थी। मुझे तब ऐसा तजुरबा होता जैसे कोई एक बिलकुल अजनबी आदमी स्नेह-जल से भरे मेरे जन्म-जलाशय से मुझे काँटे में फँसाकर खींचे लिये जा रहा हो, अब तो किसी तरह उसके हाथ से छुटकारा नहीं मिलने वाला था। शादी के दो महीने पश्चात् ही मेरे पति की मृत्यु हो गई। घरवालों और नाते-रिश्तेदारों ने मेरी ओर बहुत कुछ शोक-विलाप किया। मेरे ससुर ने बहुत से लक्षण मिलाकर सास से कहा, ‘शात्रों में जिसे विषकन्या कहा गया है, मैं वही हूँ।’ यह बात मुझे अभी तक बिलकुल साफ तौर से याद है। सुनते हो, कहानी कैसी लग रही है?”। मैंने कहा, “अच्छी है, कहानी के प्रारंभ में तो बड़ा मजा आएगा।”। “तो सुनो, आनंद से मायके लौट आई। धीरे-धीरे उम्र बढ़ने लगी। लोग मुझसे छिपते थे, मगर मैं खूब अच्छी तरह जानती थी कि मुझ जैसी खूबसूरत सरलता से नहीं मिलती। क्यों, तुम्हारी क्या राय है?”। “हो सकता है। मगर मैंने तो तुम्हें कभी देखा नहीं।”। । मेरा उत्तर सुनते ही वह ठहाका मारकर हँस पड़ी और फिर कहने लगी, “देखा नहीं! क्यों, मेरा वह कंकाल?” हिः-हिः-हिः-हिः, मैं तुमसे उपहास कर रही हूँ! तुम्हारे सामने मैं कैसे साबित करूँ कि मेरी उस आँखों की खोखली हड्डियों के भीतर कमान सी खिंची हुई, भौंरे सी काली, बड़ी-बड़ी दो आँखें थीं, और उन रंगीन होंठों पर जो मीठी-मीठी मुसकान थी, उसकी अब इन उथरे हुए दाँतों की विकट हँसी के साथ किसी प्रकार बराबरी नहीं हो सकती। मैं कैसे बताऊँ कि इन्हीं इनी-गिनी लंबी-सूखी हड्डियों के ऊपर इतना सुडौलपन था और यौवन की इतनी मुश्किल कोमल, सुघड़पूर्णता खिलती रहती थी कि तुमसे कहने में मुझे हँसी आती है और गुस्सा भी। मेरे उस शरीर के कंकाल से हड्डियों की विद्या सीखी जा सकती है, यह बात उस समय में बड़े-बड़े डॉक्टरों के दिमाग में भी न आती थी। मुझे खूब याद है, एक डॉक्टर ने अपने एक खास दोस्त से मुझे कनकचंपा उपाधि दी थी। उसका अर्थ यह था कि संसार के और सब आदमी हड्डियों की विद्या और जिस्म के तत्त्व के उदाहरण बन सकते हैं, किंतु मैं ही सिर्फ एक ऐसी हूँ कि जिसे खुशबूदार सुंदर फूल के अलावा और कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कनकचंपा के अंदर क्या कोई कंकाल होता है?। मैं जब चलती तो मुझे ऐसा लगता, जैसे हीरे को हिलाने से उसके चारों ओर उजाला चमचमाता है, मेरे जिस्म के जरा से हिलने-डुलने में वैसी ही सौंदर्य की चमक मानो अनेक स्वाभाविक हिलोरों में चारों ओर बिखरी पड़ती हो। कभी-कभी मैं बहुत देर तक अपने हाथ देखा करती। देखती कि दुनिया के सारे उद्यत पौरुष के मुँह में लगाम डालकर मिठास से उन्हें बस में कर सकते थे, ऐसे हाथ थे वे! सुभद्रा जब अर्जुन को लेकर बड़े दर्प के साथ अपने विजय-रथ को चकित तीन लोक के बीच में होकर चला ले गई थीं, तब शायद उनके ऐसी ही दो अस्थूल सुडौल भुजाएँ, गुलाबी हथेलियाँ तथा लावण्य-शिखा के समान उँगलियाँ थीं

लेकिन हाय! मेरे उस बेशरम, बे-परदा, निराभरण, हमेशा के बूढ़े कंकाल ने तुम्हारे सामने झूठी गवाही दी है मेरी! तब मैं विवश थी, कुछ बोल न सकती थी, इसलिए सारे संसार में मेरा सबसे अधिक गुस्सा तुम्हीं पर है। ऐसा मन में आता है कि अपने उस सोलह वर्ष के जीवित और यौवन के ताप से तपे हुए ललाईयुक्त रूप को एक बार तुम्हारी आँखों के सामने रख दूँ। बहुत रोज के लिए तुम्हारी आँखों की नींद छुड़ा दूँ, तुम्हारी हड्डयों की विद्या को अस्थिर करके देश-निकाला दे दूँ।”। मैंने कहा, “तुम्हारी देह होती तो मैं तुम्हारी देह छूकर कहता कि उस विद्या का रत्ती भर भी ज्ञान अब मेरे दिमाग में नहीं है। तुम्हारा वह दुनिया को मोह लेने वाले यौवन का रूप-निशीथ रात्रि के इस अँधेरे पट पर चमचमाकर खिल उठा है। बस, अब ज्यादा न कहलाओ।”। वह कहने लगी, “मेरी कोई सखी-सहेली नहीं थी। भैया ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि वे शादी न करेंगे। घर में केवल मैं ही अकेली थी। बगीचे में पेड़ के नीचे बैठी-बैठी मैं सोचा करती, तमाम दुनिया मुझसे ही प्रेम करती है, आकाश के सारे तारे मुझे ही देखा करते हैं, वायु छल से बार-बार गहरी साँस के रूप में मेरी ही बगल से निकल जाया करती है। जिस घास पर पाँव पसारे बैठी हूँ, उसमें अगर चेतना होती तो वह भी मुझे पाकर फिर से अचेतन हो जाती। मुझे पता होता, संसार के सारे युवक उस घास के रूप में दल बाँधकर शांतिपूर्वक निकट खड़े हैं। दिल में बिना कारण न जाने कैसी एक वेदना का अनुभव करती रहती। मेरे भैया के मित्र शशिशेखर जब मेडिकल कॉलेज की आखिरी परीक्षा पास कर चुके तो वे ही हमारे घर के डॉक्टर हुए। पहले मैं उन्हें ओट में से छिपकर कितनी ही बार देख चुकी थी। भैया बड़े अजीब व्यक्ति थे, दुनिया को मानो वे अच्छी प्रकार देख न सकते थे। समझो, दुनिया उनके लिए बहुत खुली हुई न थी, इसलिए हटते-हटते वे बिलकुल उसके एक तट पर जा पहुँचे थे

“उनके दोस्तों में बस एक शशिशेखर ही थे, इसलिए बाहर के युवकों में मैं सिर्फ शशिशेखर को ही हमेशा से देखती आई थी, और जब मैं शाम के वक्त फूलों के पेड़ के नीचे सम्राज्ञी की तरह आसन जमाकर बैठती तब ऐसा लगता जैसे सारे संसार की पुरुष-जाति शशिशेखर की मूर्ति धारण करके मेरे पैरों के पास आकर सहारा लेना चाहती है। सुन रहे हो? कहानी कैसी मालूम देती है?”। मैंने एक लंबी साँस लेकर कहा, “मालूम होता है, मैं अगर शशिशेखर होकर पैदा होता तो अच्छा रहता।”। वह कहती गई, “पहले पूरी कहानी सुन तो लो। एक रोज की बात है, बदली से भरा दिन था, मुझे बुखार चढ़ा। डॉक्टर साहब देखने अंदर आए। यही उसकी और मेरी सर्वप्रथम भेंट थी

“मैं खिड़की की तरफ मुँह किए लेटी थी, जिससे सूरज डूबने की लाल आभा चेहरे पर पड़े और उसका फीकापन जाता रहे। डॉक्टर ने घर में घुसते ही मेरे मुँह की ओर एक बार देखा, और मैंने तो मन-ही-मन अपने को डॉक्टर मानकर कल्पना से अपने मुँह की तरफ देखा। शाम के गुलाबी उजाले में नरम तकिये पर लापरवाही से पड़ा हुआ वह मुख मुझे कुछ मुरझाया हुआ सा कोमल फूल के जैसा महसूस हुआ, बिखरे हुए घुँघराले बाल माथे पर उड़ रहे थे और लज्जा से झुकी हुई बड़ी-बड़ी आँखों के कपोलों पर छाया डाल रहे थे

“डॉक्टर ने नरमी के साथ मुलायम आवाज में भइया को बताया, एक बार नाड़ी देखनी होगी। मैंने रेशमी परदे में से अपना थका हुआ गोल-मटोल गोरा हाथ बाहर निकाल दिया। एक बार हाथ को निहारकर देखा, उसमें अगर नीले रंग की काँच की चूड़ियाँ पहने होती तो वह और भी अधिक अच्छा लगता। रोगी का हाथ थामकर नाड़ी देखने में डॉक्टर की ऐसी शरारत मैंने पहले कभी नहीं देखी, न सुनी थी। उन्होंने छूने से डरती तथा काँपती हुई उँगलियों से मेरी नाड़ी देखी। वे मेरे बुखार की गरमी समझ गए और मैंने उनकी मन की नाड़ी कैसी चल रही है, इसका थोड़ा-थोड़ा अहसास पाया-क्यों, यकीन नहीं होता?”। मैंने कहा, “न विश्वास करने का कोई कारण भी नहीं दिखता। आदमी की नाड़ी हर वक्त एक सी नहीं चलती।”। वह कहने लगी, “हूँ! धीरे-धीरे और भी दो-चार बार मरीज तथा स्वस्थ होने के बाद एक रोज मैंने देखा कि मेरी शाम की मन की सभा में संसार के करोड़ों व्यक्तियों की संख्या घटते-घटते आखिर में वह ‘एक’ पर आकर ठहर गई। मेरी दुनिया करीब-करीब सूनी सी हो गई। दुनिया में केवल एक डॉक्टर और एक रोगी बचा रहा

“शाम होते ही मैं चुपके से उठकर बसंती रंग की साड़ी पहनती, भली प्रकार से जूड़ा बाँधती, उस पर बेला के पुष्पों की माला लपेटती और फिर एक दर्पण लेकर बगीचे में जा बैठती। क्यों? अपने को देख-देखकर क्या तृप्ति नहीं होती थी? सचमुच नहीं होती थी, क्योंकि मैं स्वयं अपने को नहीं देखती, मैं तब अकेली बैठकर दो हो जाती। मैं तब डॉक्टर बनकर खुद को खूब निहार-निहारकर देखती। देखकर मोहित हो जाती, खूब प्रेम करती, लाड़-प्यार करती, और फिर भी दिल के अंदर गहरी साँस उठ-उठकर शाम को आँधी की भाँति साँय-साँय करके हाहाकार कर उठती

“तब से मैं अकेली नहीं रही, जब चलती तो नीचे को नजर डालकर निहार-निहार के देखती कि पैरों की उँगलियाँ धरती पर कैसे पड़ती हैं, और सोचती, इन पैरों का रखना मेरे नए परीक्षा पास करने वाले डॉक्टर को कैसा लगता होगा! खिड़की के बाहर दोपहरी धाँय-धाँय करती रहती, एक प्रकार का गरम सन्नाटा छा जाता, कहीं भी कोई शोरगुल नहीं, बीच-बीच में एक-आध चील काफी दूर आसमान में चीं-चीं करती हुई उड़ जाती, और हमारे बगीचे की चारदीवारी के बाहर खिलौने वाला गीत के स्वर में ‘चाहिए, खिलौना चाहिए, चूड़ी चाहिए’ बोल जाता। मैं स्वयं तब अपने हाथ से बिछौना करके उस पर एक धुली हुई सफेद बारीक चादर बिछाकर सो जाती, और अपनी एक उघड़ी हुई बाँह को कोमल बिछौने पर अनादर से रखकर सोचती, इस हाथ को इस तरह से रखते हुए मानो किसी ने देख लिया, मानो किसी ने दोनों हाथों से उठा लिया, मानो आहिस्ता-आहिस्ता वह लौटा जा रहा है। सुनते हो, मान लो, यहीं पर कहानी खत्म हो जाए तो कैसा रहे?”। मैंने बताया, “अच्छा ही रहेगा। वैसे अधूरी तो रह जाएगी, पर मन-ही-मन पूरी करने में बाकी की रात मजे से कट जाएगी।”। उसने कहा, “हूँ! किंतु इससे कहानी काफी गंभीर हो जाएगी। इसका मजा फिर कहाँ रहेगा? इसके अंदर का ‘कंकाल’ अपने सारे दाँत किटकिटाता हुआ कहाँ दिखाई देगा?। “हाँ, फिर उसके पश्चात् सुनो। जरा प्रैक्टिस बढ़ते ही डॉक्टर ने हमारे मकान के नीचे एक दवाखाना खोल लिया। तब फिर मैं उनसे हँसी-हँसी में कभी दवा की बात, कभी जहर की बात, कभी व्यक्ति आसानी से कैसे मर सकता है, यही सब ऊटपटाँग बातें पूछती रहती। डॉक्टरी विषयों में डॉक्टर का मुँह खुल जाता। सुनते-सुनते खामोश मानो परिचित घर के व्यक्ति की तरह हो गई। फिर तो मुझे सिर्फ दो ही चीजें दुनिया में मालूम होने लगीं, प्रेम और मौत। सुनो, मेरी कहानी अब करीब-करीब खत्म हो चली है, अब अधिक देर नहीं है।”। मैंने मुलायम स्वर में कहा, “रात भी करीब-करीब खत्म हो आई।”। वह कहने लगी, “हाँ, तो कुछ रोज से देखा कि डॉक्टर साहब बड़े अनमने से रहने लगे हैं, मेरे सम्मुख तो बहुत ही झेंपते हैं। एक दिन देखा कि वे कुछ अधिक ठाठ-बाट से सज-धजकर भैया के निकट आए और उनसे बग्घी माँगने लगे। रात को कहीं जाएँगे आप। मुझसे रहा न गया। भइया के निकट जाकर बातों ही बातों में मैंने पूछा, ‘भैया, डॉक्टर साहब आज बग्घी लेकर कहाँ जा रहे हैं?’ संक्षेप में भइया बोले, ‘मरने।’ मैंने कहा, ‘बताओ न, भैया?’ उन्होंने पहले की बनिस्बत कुछ और खुलासा करके बताया, ‘शादी करने।’ मैंने कहा, ‘वाकई?’ और खूब खिलखिलाकर हँसने लगी

“धीरे-धीरे पता चला कि इस ब्याह में डॉक्टर को बारह हजार रुपए मिलेंगे। लेकिन मुझसे यह बात छिपाकर मुझे जलील करने का क्या अर्थ है? मैंने क्या उनके पैरों को पकड़कर कहा कि ऐसा कार्य करने में मैं छाती फाड़कर मर जाऊँगी? पुरुषों का विश्वास नहीं। दुनिया में मैंने सिर्फ एक ही मनुष्य देखा है, और एक ही क्षण में उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल कर ली है

“डॉक्टर मरीज को देखकर जब घर लौट आए तो मैंने खिलखिलाकर खूब हँसते-हँसते कहा, ‘क्या डॉक्टर साहब, मैंने सुना है कि आज आपकी शादी होने वाली है?’ मेरी हँसी देखकर डॉक्टर केवल शरमाए ही नहीं, बल्कि उनका चेहरा फक पड़ गया। मैंने पूछा, ‘गाजे-बाजे कुछ नहीं बुलाए क्या?’ सुनकर उन्होंने एक गहरी साँस ली और बोले, ‘शादी क्या इतने मजे की वस्तु है?’ हँसते-हँसते मैं लोट-पोट हो गई। मैंने ऐसी बात तो पहले कभी नहीं सुनी थी। मैंने कहा, ‘सो नहीं होगा, बाजे होने चाहिए, रोशनी होनी चाहिए, पूरा-पूरा ठाठ-बाट तो होना चाहिए।’ उसके बाद भैया को मैंने ऐसा विचलित कर डाला कि भैया उसी वक्त धूमधाम से बारात निकालने की तैयारी में लग गए

“मैं बार-बार एक ही बात छेड़ने लगी कि बहू के घर आने के बाद क्या होगा, मैं क्या करूँगी? डॉक्टर से मैं पूछ बैठी, ‘अच्छा, डॉक्टर साहब, तब भी क्या आप इसी प्रकार रोगियों की नाड़ी मसकते फिरेंगे?’ हिः-हिः-हिः! यद्यपि मनुष्य का और विशेष पुरुष का मन दिखाई नहीं देता, फिर भी मैं पक्के विश्वास से कह सकती हूँ कि मेरी बात डॉक्टर की छाती में शूल की तरह चुभकर रह गई होगी

“बहुत रात बीते लग्न था। शाम के वक्त डॉक्टर छत पर बैठे भैया के साथ दो-एक गिलास शराब पी रहे थे। दोनों आदमी इस काम के थोड़े-थोड़े आदी थे। धीरे-धीरे आसमान में चाँद उगने लगा। मैं हँसती हुई ऊपर पहुँची, बोली, ‘डॉक्टर साहब, भूल गए क्या? चलने का वक्त हो गया है।’। “एक बात मैं कहना भूल गई। इस मध्य मैं छिपकर दवाखाने में जाकर थोड़ा सा सफेद चूरा ले आई थी। छत पर पहुँचते ही दोनों की नजर बचाकर मैंने उसे डॉक्टर के गिलास में मिला दिया। सफेद चूरे के खाने से व्यक्ति मर जाता है, मैंने डॉक्टर से ही जान लिया था

“डॉक्टर ने एक साँस में पूरा गिलास खाली करके मेरे मुँह की तरफ दिल को छू लेने वाली दृष्टि डालकर भीगे हुए गद्गद गले से कहा, ‘अच्छा तो अब मैं चलता हूँ।’। “शहनाई बजने लगी। नीचे उतरकर मैंने एक बनारसी साड़ी पहनी तथा जितने भी गहने मेरे संदूक में बंद रखे थे, सब-के-सब निकालकर पहन लिये। माँग में काफी अच्छी तरह सिंदूर भर लिया और फिर अपने उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे बिछौना बिछाकर लेट गई। काफी सुहानी रात थी। सफेद चाँदनी चारों तरफ छिटक रही थी। सोती हुई दुनिया की थकावट दूर करती दक्षिणी पवन चल रही थी। मौलसिरी और बेला की खुशबू से सारा बगीचा महक रहा था

“शहनाई की धुन धीरे-धीरे जब दूर होती चली गई, चाँदनी जब अँधेरे का रूप धारण करने लगी, मेरा वह मौलसिरी का पेड़, बगीचा, ऊपर का आसमान, नीचे का मेरा वह आजन्मकाल का घर-द्वार सबकुछ को लेकर जगत् जब मेरे चारों ओर माया की तरह बिछाने लगी, जब मैं आँखें मूँदकर हँसने लगी। इच्छा थी, जब लोग मुझे आकर देखें तो मेरी वह हँसी रंगीन नशे की तरह मेरे होंठों पर ज्यों-की-त्यों लगी रहे। बस यही इच्छा थी, अपनी उस हँसी को यहाँ से मैं अपने साथ लेती जाऊँ तथा वहाँ जब मैं अपने मिलन के सुहाग-कक्ष में आहिस्ता-आहिस्ता से प्रवेश करूँ, तब तक वह ऐसी-की-ऐसी बनी रहे

“पर कहाँ गया मेरा वह सुहाग-कक्ष! कहाँ गया मेरा वह मिलन का रंगीन खूबसूरत वेश! अपने अंतर्भय से एक खट-खट की आवाज सुनकर मैं जाग गई। देखा तो, मुझे लेकर लड़के हड्डियों की विद्या सीख रहे हैं। वक्ष के अंदर जहाँ सुख-दुख धुक-धुक करता रहता था और एक-एक करके हर दिन जहाँ यौवन की कलियाँ मुसकराती हुई खिला करती थीं, वहाँ बेंत दिखा-दिखाकर किसी हड्डी का क्या नाम है, यह सीखा जा रहा है

“सुनो, मैंने जो अपने सारे हृदय को निचोड़कर अपने उन होंठों पर आखिरी हँसी खिलाई थी, उसका कोई निशान तुम्हें दिखाई दिया था क्या? कहानी कैसी लगी?”। मैंने कहा, “बड़े मजे की है।”। इतने में कौआ बोल पड़ा

मैंने पूछा, “अभी उपस्थित हो क्या?”। कोई उत्तर नहीं मिला

घर में सुबह की सुहानी रोशनी चमक उठी

।

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